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मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल मच गई है। लंबे समय से सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस को प्रदेश में पुनर्जीवित करने की दिशा में अब एक बड़ा कदम उठता दिख रहा है। “लिमटी की लालटेन” के 741वें संस्करण में वरिष्ठ पत्रकार लिमटी खरे ने जो संकेत साझा किए हैं, उनके अनुसार दिग्विजय सिंह ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे राज्यसभा की सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर अब पूरी ऊर्जा मध्य प्रदेश संगठन को मजबूत करने में लगाने जा रहे हैं।
दस साल की राजनीतिक तपस्या, रणनीतिक चुप्पी और एक-एक मोर्चे पर सधे हुए कदमों के बाद एक बार फिर वे प्रदेश की राजनीति के केंद्र में लौटते दिख रहे हैं।
✦ पृष्ठभूमि: दशकों की राजनीतिक समझ और अनुभव
दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सफर किसी कहानी से कम नहीं रहा।
✔ दो बार के मुख्यमंत्री
✔ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
✔ नर्मदा परिक्रमा जैसी विशाल जनयात्रा
✔ संगठनात्मक समझ
✔ बूथ स्तर पर पकड़
मध्य प्रदेश कांग्रेस में आज भी उनकी पहचान एक रणनीतिकार और प्रभावशाली नेता के रूप में की जाती है। 2003 में सत्ता से बाहर होने के बाद से वे सीधे सत्ता की राजनीति में लौटे नहीं, लेकिन परदे के पीछे उनकी रणनीति हमेशा निर्णायक सिद्ध होती रही है।
उनके समर्थकों का कहना है कि दिग्विजय सिंह
“नेता से ज्यादा एक विचार और संगठन चलाने की कला” हैं।
✦ वर्तमान स्थिति और बड़ा संकेत: राज्यसभा से दूरी
“लिमटी की लालटेन” में खुलासा किया गया कि दिग्विजय सिंह ने उच्च स्तर पर यह संकेत दिया है कि वे अगला राज्यसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे।
उनका कार्यकाल 9अप्रैल 2026 को समाप्त हो रहा है और वे अब केंद्र नहीं जाना चाहते।
इस निर्णय के कई राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं—
- वे अब प्रदेश में संगठन की कमान मजबूत करना चाहते हैं।
- मिशन 2028की रणनीति में केंद्रीय भूमिका निभाना चाहते हैं।
- दस वर्षों के संकल्प को पूरा करने के बाद जमीन स्तर की राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं।
अंदरूनी सूत्रों के अनुसार उन्होंने शीर्ष नेतृत्व को साफ बताया है कि आगामी चुनावों के लिए उन्हें प्रदेश में ही रहना है और कांग्रेस को पुनर्जीवित करना है।
✦ कांग्रेस के अंदरखाने में हलचल – किंगमेकर की भूमिका की तैयारी?
कांग्रेस में लंबे समय से नेतृत्व की कमी महसूस की जा रही थी।
प्रदेश में:
- अनुभवी नेताओं का अभाव,
- संगठन का कमजोर ढांचा,
- बूथ स्तर पर निष्क्रियता,
- युवा कार्यकर्ताओं का भ्रम,
- तथा लगातार हार से मनोबल में गिरावट—
ऐसे समय में दिग्विजय सिंह की सक्रियता कांग्रेस के लिए नई उम्मीद ला रही है।
सूत्र बताते हैं कि वे अब
✔ बड़ी रैलियों के बजाय छोटी, प्रभावी बैठकें
✔ बूथ स्तर की रणनीति
✔ ब्लॉक और सेक्टर स्तर की टीमों का पुनर्गठन
✔ दोपहिया यात्राएँ
✔ सीधा जनसंवाद
✔ दलित एजेंडा को पुनर्जीवित करना
जैसी गतिविधियाँ तेज करने वाले हैं।
यह संकेत है कि वे किंगमेकर की नई भूमिका निभाने की तैयारी कर रहे हैं।
✦ दलित एजेंडा की वापसी – बड़ा राजनीतिक दांव?
लिमटी की रिपोर्ट के अनुसार, दिग्विजय सिंह अब अपने पुराने दलित एजेंडे को आगे बढ़ाने में जुट गए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि उनके स्थान पर किसी दलित नेता को राज्यसभा भेजा जाता है, तो यह साफ संकेत होगा कि—
दिग्विजय सिंह अपना संगठनात्मक साम्राज्य मजबूत कर रहे हैं।
यह कदम कांग्रेस को नए सामाजिक समीकरणों के साथ प्रदेश में मजबूत कर सकता है।
✦ भाजपा की एंटी-इंकंबेंसी – कांग्रेस के लिए अवसर?
लिमटी खरे के अनुसार, भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों में एंटी-इंकंबेंसी तेज हो रही है।
कारण:
- जनता मुफ्त योजनाओं के भार से परेशान
- सरकारी जमीनों की बिक्री
- युवाओं में रोजगार संकट
- पेंशन व्यवस्था में असंतोष
- महंगाई का दबाव
- निजीकरण को लेकर असहमति
इन मुद्दों पर कांग्रेस अभी तक मजबूत रणनीति नहीं बना पाई थी।
इस स्थिति में दिग्विजय सिंह की सक्रियता कांग्रेस को एक नई दिशा दे सकती है।
✦ जयवर्धन सिंह की भूमिका: राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की तैयारी?
सियासी हलकों में चर्चा है कि दिग्विजय सिंह अपने पुत्र जयवर्धन सिंह को प्रदेश की राजनीति में स्थापित करने के लिए संगठन को मजबूत आधार देना चाहते हैं।
उनकी सक्रियता अगले कुछ वर्षों में कांग्रेस की युवा टीम तैयार करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
✦ संगठनात्मक मजबूती: दिग्विजय सिंह की सबसे बड़ी ताकत
प्रदेश का एक-एक गाँव, ब्लॉक, जिला—
हर क्षेत्र की भौगोलिक और राजनीतिक समझ दिग्विजय सिंह के पास है।
यह समझ कांग्रेस को फिर खड़ा करने में निर्णायक साबित हो सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि—
“दिग्विजय सिंह अगर संगठन में उतर आए,तो कांग्रेस का ढांचा पूरी तरह बदला हुआ दिखाई दे सकता है।”
✦ जनता की प्रतिक्रिया: क्या MP कांग्रेस फिर खड़ी हो सकेगी?
जनता में आम चर्चा है कि दिग्विजय सिंह के पास अनुभव, समझ और रणनीति है।
यदि वे वाकई मिशन 2028 को लेकर मैदान में उतरते हैं, तो कांग्रेस में नई ऊर्जा आ सकती है।
युवाओं के बीच
✔ रोजगार
✔ शिक्षा
✔ सामाजिक सुरक्षा
✔ अवसरों की कमी
जैसे मुद्दे कांग्रेस को मजबूती दे सकते हैं यदि दिग्विजय सिंह नेतृत्व करते हैं।
✦ भविष्य की संभावनाएँ
आने वाले महीनों में ये प्रमुख घटनाएँ देखी जा सकती हैं—
- राज्यसभा सीट पर नया चेहरा
- कांग्रेस में संगठनात्मक फेरबदल
- दिग्विजय सिंह की सक्रिय धरातलीय यात्राएँ
- बूथ-स्तर पर पुनर्गठन
- दलित एजेंडा को नई दिशा
- मिशन 2028 की औपचारिक शुरुआत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिग्विजय सिंह की सक्रियता से कांग्रेस को वह धार मिल सकती है जो वर्षों से गायब थी।
8️⃣ निष्कर्ष
“लिमटी की लालटेन 741” में जो विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, वह मध्य प्रदेश की राजनीति के महत्वपूर्ण मोड़ को रेखांकित करता है। दिग्विजय सिंह ने अपने लंबे अनुभव और रणनीतिक दृष्टि से यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले वर्षों में वे प्रदेश कांग्रेस के सबसे प्रमुख चेहरे होंगे। यदि वे सचमुच मिशन 2028 के लिए पूर्ण शक्ति के साथ सक्रिय होते हैं, तो मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
लिमटी की लालटेन 741
. . . मतलब हृदय प्रदेश में अब किंगमेकर की भूमिका निभाने की तैयारी में हैं कांग्रेस के वर्तमान चाणक्य!
दस साल के राजनैतिक वनवास का वचन अक्षरशः निभाया, फिर भी बने रहे सैदव चर्चाओं में . . .
(लिमटी खरे)
लगभग तेईस बरस से सत्ता से दूर रहने वाली मध्य प्रदेश की सूबाई कांग्रेस में जान फूंकने राजा दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर कमर कस ली है। इस बार वे राज्य सभा के रास्ते केंद्र में नहीं जा रहे। लगता है वे अगले विधान सभा चुनावों अर्थात मिशन 2028 की तैयारियों में खुद को झोंकने का मानस बना चुके हैं। हाल ही में उनके द्वारा एक नीतिगत फैसला लेते हुए स्पष्ट संकेत दिए हैं कि राज्य सभा की सक्रिय राजनीति से खुद को दूर रखेंगे, उनका कार्यकाल इस साल 09 अप्रैल को समाप्त हो रहा है।
कांग्रेस के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो दिग्विजय सिंह ने आला नेताओं को साफ कर दिया है कि आने वाले समय में वे अपनी उर्जा को मध्य प्रदेश की कांग्रेस को पुर्नजीवित करने में लगाना चाहते हैं। दिग्विजय सिंह के हर कदम, बयान आदि के अनेक निहितार्थ भी लगाए जाते हैं। वे कहां चाल चलकर कहां पहुंचना चाहते हैं इस बात का अंदाजा अच्छे अच्छे सियासी जानकार भी लगाने में असमर्थ ही रहते आए हैं।
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान कहा कि दिग्विजय सिंह के द्वारा दिए गए इस तरह के संकेत दिए हैं कि अब वे केंद्र के बजाए अपने आप को प्रदेश तक ही सीमित रखने के इच्छुक हैं। मध्य प्रदेश में 2028 में विधान सभा चुनाव होने हैं और तब तक कांग्रेस को प्रदेश की सत्ता से बाहर हुए 25 बरस हो जाएंगे, मतलब साफ है कि जिस युवा पीढ़ी ने 2003 के बाद होश संभाला होगा, वह तो यह जानती ही नहीं होगी कि 2018 की कमल नाथ सरकार को छोड़कर कांग्रेस भी कभी मध्य प्रदेश की सत्ता पर काबिज रही है। दिग्विजय सिंह नपे तुले, सधे कदमों से आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। हो सकता है कि वे बड़ी रेलियों के बजाए छोटी और प्रभावी बैठकें करें, बूथ स्तर पर जाकर कार्यकर्ताओं को चार्ज करें एवं ब्लाक स्तर पर पदयात्रा या दो पहिया वाहन से यात्रा कर जनता से सीधे संवाद स्थापित करने का प्रयास करें जो अब तक टूट चुका प्रतीत होता है।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस के स्थापित चेहरों में अब दिग्विजय सिंह ही इकलौते ऐसे बचे हैं जो आज भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने राज्य सभा से न जाने की बात इशारों इशारों में कर दी है, इससे अब उनके मुख्यमंत्रित्व काल के दलित एजेंडे को आगे बढ़ाने हेतु वे लालायित दिख रहे हैं, और उनके स्थान पर किसी दलित नेता को राज्य सभा से अगर भेजा जाता है तो समझ लीजिए कि दिग्विजय सिंह की अगली रणनीति क्या हो सकती है। दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे हैं और 10 साल तक मुख्यमंत्री भी, इस लिहाज से उन्हें संयुक्त मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ विहीन मध्य प्रदेश के एक एक जिले, तहसील, ब्लाक आदि की भौगोलिक और राजनैतिक जानकारी बहुत अच्छे से है।
वहीं, केंद्रीय स्तर के एक अन्य बड़े नेता ने इशारों ही इशारों में समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार का एंटी इंकंबेंसी फेक्टर अब तेज होने लगा है। चूंकि केंद्र में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी 11 सालों से अधिक समय से है, इसलिए अब लोग नए चेहरों को देखना चाहते हैं। इसके अलावा सब कुछ निशुल्क वाली कयावद से कर दाता बहुत नाराज नजर आ रहा है, क्योंकि सरकार सब कुछ निशुल्क के चक्कर में दोनों हाथों से खजाना खाली करती जा रही है। जिलों में सरकारी जमीनें बिकना आरंभ हो चुकी हैं। युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हुआ है। 2003 के बाद भर्ती सरकारी कर्मचारियों को पैंशन नहीं मिलने का नियम है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार कमोबेश हर तरफ ही निजिकरण की बयार बहती दिख रही है। पैंशनर्स दवाओं को मोहताज हैं। मंहगाई चरम पर है। ऐसे में जनता की दुखती रग को थामने के लिए कांग्रेस आगे आती नहीं दिख रही है, यही कारण है कि अब कांग्रेस को इस ओर बढ़ाने के लिए दिग्विजय सिंह संजीदा नजर आ रहे हैं।
वैसे सियासी जानकार यह बात भी कहते नजर आ रहे हैं कि राजा दिग्विजय सिंह अब अपने पुत्र जयवर्धन सिंह को स्थापित करने के लिए एड़ी चोटी एक कर रहे हैं। संभवतः यही कारण है कि वे केंद्र की सियासत छोड़कर प्रदेश की स्थितियों को भांपकर मध्य प्रदेश की ओर रूख करना चाह रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने दलित एजेंडे को हवा देना आरंभ कर दिया है। तीन माह बाद होने वाले राज्य सभा चुनावों में यह एजेंडा उनके लिए मुफीद इसलिए भी साबित हो सकता है क्योंकि इसके जरिए वे अपने द्वारा रिक्त की गई राज्य सभा सीट पर किसी स्थापित नाम या चेहरे के बजाए नए चेहरे को राज्य सभा के जरिए केंद्र में भेजने के मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं, इससे मध्य प्रदेश में उनका एकछत्र साम्राज्य बरकरार रह सकता है। इसके साथ ही कांग्रेस के प्रदेश के अन्य क्षत्रप राज्य सभा के जरिए मध्य प्रदेश में रहकर केंद्र की सियासत के जरिए उनके पैरों के नीचे की जमीन को खिसकाने में अपने आप को अक्षम ही पाएंगे।
वैसे कहा जाता है कि दिग्विजय सिंह जो ठान लेते हैं, उसे अमली जामा पहनाकर ही रहते हैं। उनकी याददाश्त के सब कायल हैं। मध्च प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री स्व. कर्नल अजय नारायण मुशरान से विधान सभा सत्र के दौरान हमसे चर्चा के बीच साफ तौर पर कहा था कि मध्य प्रदेश में दो ही नेता ऐसे हैं जो कार्यकर्ता से एक बार मिल लें तो दूसरी बार उसे नाम से ही पुकारते हैं। उन्होंने कहा था कि पहले थे उस समय के मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह और दूसरे थे उस समय के प्रदेश के गृह मंत्री स्व. हरवंश सिंह ठाकुर। दिग्विजय सिंह पैदल नर्मदा यात्रा भी कर चुके हैं। अब अगर दिग्विजय सिंह प्रदेश में कांग्रेस को एक बार फिर जागृत करने का प्रयास कर रहे हों तो आने वाले समय में कांग्रेस संगठन पूरी तरह चाक चौबंद नजर आने लगे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए . . .
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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

43 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. दिल्ली, मुंबई, नागपुर, सिवनी, भोपाल, रायपुर, इंदौर, जबलपुर, रीवा आदि विभिन्न शहरों में विभिन्न मीडिया संस्थानों में लम्बे समय तक काम करने का अनुभव, वर्तमान में 2008 से लगातार “समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया” के ‘संस्थापक संपादक’ हैं. 2002 से लगातार ही अधिमान्य पत्रकार (Accredited Journalist) हैं एवं नई दिल्ली में लगभग एक दशक से अधिक समय तक पत्रकारिता के दौरान भी अधिमान्य पत्रकार रहे हैं.
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