पत्रकार-पहचान का संकट: पप्पू सिंह की हत्या और उसके बाद उठने वाले सवाल
(वीरेन्द्र पाठक)
प्रयागराज में ब्रहस्पतिवार शाम शहर के सिविल लाइंस इलाके में होटल के पास अचानक उस समय खौफनाक दृश्य देखने को मिला जब 54 वर्षीय पत्रकार लक्ष्मी नारायण सिंह उर्फ पप्पू की धाराओं से छाँटे गए वारों के बाद इलाज के दौरान मौत हो गई।
पुलिस ने कहना है कि वार के कुछ दिन पहले मृतक तथा संदिग्धों में विवाद हुआ था और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर घटना की समीक्षा जारी है।
लेकिन इस घटना ने सिर्फ एक हत्या का मामला नहीं बल्कि दलदल की तरह फैले उस प्रश्न को फिर से उजागर कर दिया है — “पत्रकार कौन है?”
- घटना का विवरण
- ब्रहस्पतिवार की शाम लगभग 10:30 बजे सिविल लाइंस इलाके में स्थित एक होटल के बाहर लक्ष्मी नारायण सिंह उर्फ पप्पू पर चाकू जैसे धारदार हथियार से हमला किया गया।
- उन्हें तुरंत स्वारूप रानी नेहरू अस्पताल ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
- अतिरिक्त आयुक्त (सेल) ने बताया कि मुख्य आरोपी ‘विषाल’ नामक व्यक्ति को घायल अवस्था में पकड़ा गया, उसने घटना से पहले मछली बाजार से चाकू खरीदा था।
- पुलिस का कहना है कि दो अन्य साथी अभी भी तलाश में हैं।
- पहचान विवाद : पत्रकार या नहीं?
हत्या के तुरंत बाद मीडिया व सोशल मीडिया में यह बहस शुरू हो गई कि पप्पू पत्रकार थे या नहीं। कुछ तर्क यह दिए जा रहे हैं कि उनके नाम के आगे “पत्रकार” नहीं लगाया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने किसी अग्रणी मीडिया समूह से संबद्धता नहीं रखी।
लेकिन इस पर वक्ता (वरिष्ठ पत्रकार) का कहना है कि पत्रकारिता का मतलब सिर्फ प्रतिष्ठित मीडिया समूह में काम करना नहीं है — जो व्यक्ति सामाजिक सरोकार से जुड़ा लेख-वीडियो, रिपोर्टिंग करता है, उसे भी पत्रकार माना जाना चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार का जमीन-स्तर का अनुभव
“कम योग्यता, द्वेष और ईर्ष्या इस पेशे के अधिकतर लोगों में कूट-कूट कर भरी है। … मैं इनका समर्थन नहीं करता। लेकिन … सामाजिक सरोकारों से भरपूर ऐसे उत्साही लोग … जो घटना स्थल पर भी पहुंच जाते हैं … मेरे नजर में पत्रकार है।”
यह उद्धरण वरिष्ठ पत्रकार व ब्यूरो चीफ वारेन्द्र पाठक द्वारा दिया गया दृष्टिकोण है।
इसलिए पहचान विवाद केवल पप्पू के मामले तक सीमित नहीं बल्कि पूरे पत्रकारिता-पेशे के मूल उद्देश्य, स्थिति और समाजिक मान्यता पर सवाल उठा रहा है।
- पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ
- भारत में पत्रकारों पर हमले एक चिंताजनक प्रवृत्ति बन चुके हैं।
- स्थानीय पत्रकारों की सुरक्षा, उनके खिलाफ दबाव और पहचान-संदेशों का अभाव अक्सर उनके काम को जोखिम में डाल देता है।
- साथ ही सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने “मीडिया कर्मी” व “पत्रकार” की परिभाषाओं में मिश्रित स्थिति उत्पन्न कर दी है।
- पप्पू सिंह की पृष्ठभूमि और उनकी पत्रकारिता
पप्पू की पत्रकारिता मुख्यधारा में शायद स्थापित नहीं थी लेकिन उन्होंने छोटे-छोटे मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़कर फुटेज उपलब्ध कराई, सोशल मीडिया कवरेज की, स्थानीय घटनाओं पर काम किया।
लेखक व पत्रकार वारेन्द्र पाठक इस दृष्टिकोण से, “गाँव का छोटा से छोटा पत्रकार भी पत्रकार है” यह माना करते हैं।
यह मामला हमें यह दिखाता है कि “पत्रकारिता” केवल कार्यालय या बड़े अखबार-चैनल से जुड़ी नहीं बल्कि सामाजिक सरोकार, घटना-स्थिति पर पहुँच और सूचना-वितरण से जुड़ी है।
- कौन-कौन से पहलू जांच में हैं?
- पुलिस सीसीटीवी फुटेज-साक्ष्य की पुष्टि कर रही है।
- विवाद की शुरुआत किस घटना से हुई, किसने चाकू खरीदा, किन लोगों का नाम है—इनकी जांच जारी है।
- साथ ही पत्रकार सुरक्षा, पहचानों की स्पष्टता व मीडिया-समर्थन प्रणालियों पर भी चर्चा तेज हो रही है।
- सामाजिक व राजनीतिक प्रभाव
यह घटना सिर्फ एक निजी अपराध नहीं बल्कि मीडिया-स्वतंत्रता, पत्रकार-रक्षा और पत्रकार-पहचान के बड़े मुद्दे को सामने ला रही है।
- यदि किसी को काम मीडिया से जुड़ा हुआ था, लेकिन उसे पत्रकार नहीं माना गया तो अपने समर्थक, समाज द्वारा उसे क्या सुरक्षा मिलेगी?
- पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सरकार-प्रशासन का क्या दृष्टिकोण है?
- पहचान-वर्गीकरण से मीडियावर्ग में विभाजन व असुरक्षा की भावना कहाँ तक बढ़ सकती है?
इन सवालों पर राजनीतिक दल, प्रेस संगठन व नागरिक समाज को विचार करना होगा।
- “पत्रकार कौन?”—यह सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?
- पत्रकार ही चौथे स्तंभ हैं। उनकी भूमिका सूचना-वितरण, सरकार-लोकप्रशासन की पारदर्शिता, सामाजिक न्याय में अहम है।
- यदि पहचान अस्पष्ट होगी, तो मीडिया कर्मियों की स्थिति कमजोर हो सकती है और खतरों के आगे उनका बचाव कम हो सकता है।
- यह बहस इस लिए भी जीवंत है क्योंकि छोटे-स्थानीय पत्रकार जहाँ घटना स्थल पर पहुंचते हैं, अक्सर बड़े मीडिया समूह नहीं होते। उनकी आवाज़ दब सकती है।
- बेहतर व्यवस्था के लिए सुझाव
- स्पष्ट मापदंड स्थापित हों कि किसे “पत्रकार” माना जाए और किसे “मीडिया कर्मी” की श्रेणी में रखा जाए—यह पहचान सिर्फ पद, संस्थान से नहीं बल्कि काम-क्वालिटी, सामाजिक मूल्य से भी जोड़ी जाए।
- स्थानीय पत्रकारों व स्वतंत्र मीडिया कर्मियों के लिए सुरक्षा व बीमा-प्रणालियाँ हों।
- मीडिया संस्थाओं को छोटे-स्थानीय पत्रकारों के काम को मान्यता देना चाहिए—उनका फुटेज, रिपोर्टिंग प्रयोग हो, उन्हें सहारा मिले।
- प्रशासन-पुलिस को पत्रकारों के खिलाफ अपराधों में जल्द कार्रवाई करनी चाहिए व मृतकों-पीड़ितों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
- समाज में यह जागरूकता हो कि सूचना-वितरण का काम सिर्फ बड़े चैनल से नहीं बल्कि स्थानीय स्तर से भी होता है—लोकल रिपोर्टर भी अहम हैं।
निष्कर्ष (Conclusion):
पप्पू सिंह की हत्या ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सिर्फ घटना-विवरण खत्म नहीं हुई बल्कि पत्रकार-पहचान, मीडिया-स्वतंत्रता व सुरक्षा जैसे गहरे सवाल उठ खड़े हुए हैं। उनके पीछे “मीडिया कर्मी” की श्रेणी में शामिल एक छोटी-सी आवाज़ नहीं बल्कि एक जुझारू मन था जिसने सूचना पहुँचाने को अपना धर्म बनाया था। इस विवादित मुद्दे पर यह कहना उचित होगा कि पत्रकारिता केवल बड़े संगठनों से जुड़े लोगों का अधिकार नहीं; बल्कि हर उस व्यक्ति का अधिकार है जो ईमानदारी-सचाई-सोशल-सरोकार के साथ सूचना साझा करता है।
अगर हम पत्रकार को सिर्फ टाइटल के आधार पर परिभाषित करें, तो बहुत-से काम करने वाले बेनाम रहेंगे, असुरक्षित रहेंगे। सुरक्षित होगा वही जो पहचान पायेगा। आज हमें यह तय करना है कि पत्रकार कौन होगा और लोकतंत्र में उसकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी।
(लेखक उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
(साई फीचर्स)

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