ईमानदारी और निर्भयता से जीना क्या इतना कष्टप्रद हो रहा?
(अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस विशेष – 9 दिसंबर 2025)
(डॉ. प्रितम भि. गेडाम)
9 दिसंबर 2025, अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस दुनिया को यह याद दिलाने का दिन है कि ईमानदारी, नैतिकता और पारदर्शिता से समझौता किसी भी समाज को गहरे अंधकार में धकेल देता है। वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार को एक ऐसी महामारी माना जाता है जो राष्ट्रों की आर्थिक संरचना, विकास प्रक्रिया और जनजीवन को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाती है।
भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में यह चुनौती और बड़ी दिखाई देती है—क्योंकि यहां प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक तंत्र, सामाजिक मानसिकता और व्यक्तिगत चरित्र—सब पर इसका दूरगामी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखने लगा है।
समाज में बढ़ती विचलित सोच: क्या हम मूल्यहीनता की ओर बढ़ रहे हैं?
पिछले एक दशक में समाज की सोच में तेज़ी से बदलाव आया है।
जहाँ पहले ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिकता को सम्मान मिलता था, वहीं अब कई लोग अनुचित तरीकों से संपत्ति और शक्ति हासिल करने को “व्यावहारिकता” का नाम देने लगे हैं।
लोगों की मानसिकता धीरे-धीरे ऐसी बनती जा रही है कि—
- अपराध करके भी यदि व्यक्ति पैसा कमा ले
- समाज में दिखावा कर ले
- महंगी गाड़ियों, बंगले और प्रतिष्ठा का चश्मा पहन ले
तो उसके अपराध गौण हो जाते हैं, और धन ही सम्मान का पैमाना बन जाता है।
यह बदलाव अत्यंत खतरनाक संकेत है क्योंकि यह सोच एक पूरे देश की कानून व्यवस्था,सामाजिक नियंत्रण,नैतिकता और भविष्य की पीढ़ियों को प्रभावित करती है।
भ्रष्टाचार: सिर्फ अपराध नहीं,किसी और का हक छीनना है
जब कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार करता है, वह केवल अपना स्वार्थ सिद्ध नहीं कर रहा होता।
वह—
- किसी दूसरे की मेहनत छीन रहा होता है
- किसी जरूरतमंद के अधिकार को रोक रहा होता है
- देश के विकास को धीमा कर रहा होता है
- व्यवस्था के स्तंभों को खोखला कर रहा होता है
- समाज में अपराध और अन्याय को मजबूत कर रहा होता है
भ्रष्टाचार का असर सीधे-सीधे पूरे राष्ट्र पर पड़ता है।
कई बार एक गलत निर्णय या एक भ्रष्ट अधिकारी की गतिविधि से—
- करोड़ों रुपये की परियोजनाएँ बर्बाद हो जाती हैं
- आम जनता की जान जोखिम में पड़ जाती है
- दशकों तक चलने वाला आर्थिक नुकसान होता है
यह सिर्फ अपराध नहीं—एक सामूहिक सामाजिक हत्या है।
सरकारी व्यवस्था में एक भ्रष्ट व्यक्ति कैसे बनता है नासूर?
सरकार की व्यवस्थाएँ—कानून, प्रशासन, योजनाएँ, बजट, विकास कार्य—ये सभी मिलकर जनता तक लाभ पहुंचाने का ढांचा बनाते हैं।
लेकिन जब इस ढांचे के किसी एक स्तंभ में भ्रष्टाचार की दरार पड़ती है, तो वह पूरा सिस्टम कमजोर होने लगता है।
- एक भ्रष्ट कर्मचारी पूरा विभाग खोखला कर देता है
- गलत निर्णय, गलत अनुशंसा और गलत रिपोर्टें व्यवस्था को दूषित करती हैं
- बजट का दुरुपयोग बढ़ता है
- जनता में विश्वास घटता है
- सुशासन की नींव कमजोर होती है
सबसे भयावह बात यह है कि कई बार छोटे से पद पर बैठे कुछ अप्रत्याशित कर्मचारी भी करोड़ों की हेरफेर में पकड़े जाते हैं।
ऐसे मामले यह दर्शाते हैं कि कमजोर नैतिकता, लालच और स्वार्थ का प्रभाव कितनी गहरी पकड़ बनाए हुए है।
पैसा ही भगवान?समाज की खतरनाक सोच का विस्तार
कुछ समय पहले की एक मुलाकात में किसी व्यक्ति ने यह विचलित करने वाला विचार प्रकट किया कि—
“पैसा ही भगवान है, चाहे किसी भी तरीके से आए। लोग अपराध भूल जाते हैं, पर पैसा नहीं भूलते।”
यह दृष्टिकोण वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या है।
ऐसी सोच—
- अपराध को महिमामंडित करती है
- ईमानदारी को कमज़ोर बनाती है
- सामाजिक क्षरण को बढ़ाती है
- जंगलराज की मानसिकता को जन्म देती है
चिंता की बात यह है कि यह मानसिकता अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के बड़े हिस्से में फैल चुकी है।
चुनावों में कई बार गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी उम्मीदवार जीत जाते हैं, जबकि ईमानदार समाजसेवी हार जाते हैं।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए गहरी पीड़ा और खतरे का संकेत है।
जब बुराई को समर्थन मिलता है,तब भ्रष्टाचार मजबूत होता है
हमारे समाज में आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग—
- बुराई का विरोध नहीं करते
- भ्रष्टाचार को सामान्य मानने लगे हैं
- अपराधियों के प्रति सहानुभूति दिखाते हैं
- अनुचित को उचित ठहराने के तरीके खोज लेते हैं
इसके कुछ कारण—
- भय
- स्वार्थ
- उदासीनता
- सामूहिक जिम्मेदारी का अभाव
लेकिन इसका परिणाम गंभीर होता है।
जब समाज अपराधी को समर्थन देता है, तब भ्रष्टाचार एक संस्कृति बन जाता है।
प्रणालीगत भ्रष्टाचार और जनहानि की घटनाएं
हम अक्सर सुनते हैं कि—
- पहली बारिश में सड़कें टूट गईं
- पुल या इमारत ढह गई
- सरकारी योजना समय पर पूरी नहीं हुई
- बजट बढ़ गया
- सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हुआ
ये सभी घटनाएँ “अक्षमता” नहीं, बल्कि “भ्रष्टाचार” के गहरे परिणाम हैं।
जब अधिकारी, ठेकेदार और सिस्टम मिलकर स्वार्थ साधते हैं तो उसका भुगतान आम जनता—अपनी जान देकर करती है।
आर्थिक असमानता क्यों बढ़ रही है?
भ्रष्टाचार आर्थिक असमानता का सबसे बड़ा कारण है।
क्योंकि—
- भ्रष्ट लोग अमीर होते जाते हैं
- ईमानदार लोग संघर्ष करते रहते हैं
- कमजोर और गरीब वर्ग हाशिये पर चला जाता है
किसान आत्महत्या करते हैं, लेकिन घोटालेबाज नेता मजे से जीवन बिताते हैं।
यह अंतर भ्रष्टाचार के कारण बनी असमान मानसिकता और व्यवस्था को दर्शाता है।
क्या ईमानदारी से जीना वास्तव में कठिन हो गया है?
सवाल बहुत बड़ा है।
ईमानदार लोग छोटी सी गलती पर भी पछताते हैं।
पर भ्रष्ट लोग—
- बिना शर्म
- बिना पछतावे
- बिना पश्चाताप
- और बिना नैतिक भार
सामान्य जीवन बिताते हैं।
क्यों?
क्योंकि समाज, सिस्टम और राजनीति—तीनों जगह भ्रष्टाचार का प्रभाव बहुत गहरा हो चुका है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ईमानदारी अप्रासंगिक है।
वास्तविक शांति, सुकून, आत्मसम्मान और संतुष्टि ईमानदार जीवन में ही मिलती है।
अनुचित कमाई केवल भ्रम पैदा करती है, स्थायी आनंद नहीं।
भ्रष्टाचार मिटेगा कैसे?समाधान क्या है?
समाधान सरकार या कानून के पास ही नहीं है।
समाधान जनता के पास है।
1.अवैध लाभ देना बंद करें
यदि जनता रिश्वत न दे, तो भ्रष्ट व्यक्ति मांग नहीं सकता।
2.अपने अधिकार जानें
भ्रष्टाचार वहीं पनपता है जहाँ लोग अनजान होते हैं।
3.गलत का विरोध करें
यदि आवाज़ नहीं उठेगी, तो व्यवस्था और गिरती जाएगी।
4.पारदर्शिता बढ़ाएँ
सभी प्रक्रियाओं में खुलापन भ्रष्टाचार को कम करता है।
5.शिकायत तंत्र का उपयोग करें
सरकारी हेल्पलाइन, ईमेल, मोबाइल नंबर, शिकायत पोर्टल—ये सब नागरिकों की सुरक्षा के लिए बने हैं।
6.अगली पीढ़ी को नैतिकता सिखाएँ
अच्छी पीढ़ी, अच्छा समाज बनाती है।
Conclusion /निष्कर्ष
अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि चेतावनी है कि यदि समाज का नैतिक पतन जारी रहा, तो विकास, विश्वास, सुरक्षा और न्याय—सभी कमजोर हो जाएंगे।
ईमानदारी कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं।
भ्रष्टाचार से लड़ाई अकेली व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
जब नागरिक जागरूक होंगे, गलत को गलत कहेंगे और अपने अधिकारों का उपयोग करेंगे, तभी एक भ्रष्टाचार-मुक्त, न्यायपूर्ण और समृद्ध भारत की नींव मजबूत होगी।
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(साई फीचर्स)

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