भारतीय रेलवे में अवैध वेंडर्स और महंगा खानपान: बढ़ती शिकायतों के बीच जवाबदेही पर सवाल

भारतीय रेलवे में अवैध वेंडर्स, महंगे और खराब भोजन को लेकर शिकायतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्षों में खानपान से जुड़ी हजारों शिकायतें सामने आईं। निगरानी तंत्र होने के बावजूद व्यवस्था में सुधार नहीं दिख रहा। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर रेलवे की कैटरिंग व्यवस्था में जवाबदेही कब तय होगी और यात्रियों को गुणवत्तापूर्ण भोजन कब मिलेगा।

लिमटी की लालटेन 759

अनाधिकृत वेंडर्स, पेंट्री में मंहगाई की मार, आखिर कैसे सुधरेगा रेलवे में खान पान… #indianrailways

चलती रेलगाड़ी में अवैध वैंडर्स, पेंट्री ठेकेदार पर लगाम लगाने में दिलचस्पी क्यों नहीं लेते माननीय . . .

(लिमटी खरे)

देश की जीवनरेखा मानी जाने वाली भारतीय रेलवे में सुविधाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के दावे वर्षों से किए जाते रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयान करती है। रेल यात्रियों के लिए सबसे बुनियादी सुविधा—साफ-सुथरा और पौष्टिक भोजन—आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

चलती ट्रेनों में अवैध वेंडर्स की मौजूदगी, पेंट्री कार में गुणवत्ता की कमी और तय कीमत से अधिक वसूली जैसे मुद्दे लगातार सुर्खियों में हैं। आधिकारिक आंकड़े भी इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित करते हैं।

शिकायतों के आंकड़े क्या कहते हैं

रेलवे द्वारा संसद में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान खानपान की गुणवत्ता को लेकर 6,645 शिकायतें दर्ज की गईं। वर्ष 2021 से लेकर चार वर्षों में कुल 19,174 शिकायतें खानपान से संबंधित सामने आईं।

औसतन प्रतिदिन 35 से अधिक यात्री खराब भोजन की शिकायत दर्ज करा रहे हैं।

शिकायतों की प्रकृति चिंताजनक है:

  • भोजन में कीड़े या तिलचट्टे मिलना
  • बदबूदार या बासी खाना
  • तय कीमत से अधिक वसूली
  • कम मात्रा में भोजन देना
  • शिकायत करने पर अभद्र व्यवहार

ये आंकड़े केवल दर्ज शिकायतों के हैं, जबकि बड़ी संख्या में यात्री औपचारिक शिकायत दर्ज ही नहीं कराते।

राजधानी से वंदे भारत तक: बदलती छवि, वही समस्या

एक समय राजधानी एक्सप्रेस को प्रीमियम सेवा का प्रतीक माना जाता था, जहां टिकट में भोजन शामिल होता था और अवैध वेंडर्स की कोई गुंजाइश नहीं थी।

आज अत्याधुनिक वंदे भारत एक्सप्रेस के दौर में भी कई ट्रेनों में कोच के अंदर चाय, समोसे और नमकीन बेचते अवैध वेंडर्स नजर आ जाते हैं।

प्रीमियम श्रेणी की ट्रेनों में भी भोजन की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठना, रेलवे की निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

निगरानी तंत्र: दावा बनाम वास्तविकता

रेलवे का खानपान प्रबंधन मुख्य रूप से आईआरसीटीसी के तहत संचालित होता है।

दावा किया जाता है कि:

  • आधुनिक बेस किचन में भोजन तैयार होता है
  • सीसीटीवी निगरानी की व्यवस्था है
  • खाद्य सुरक्षा पर्यवेक्षक तैनात हैं
  • नियमित सैंपलिंग होती है

यदि यह ढांचा प्रभावी है तो फिर शिकायतों का अंबार क्यों लग रहा है?

रेलवे अधिकारियों के अनुसार शिकायत मिलने पर जुर्माना, चेतावनी और काउंसलिंग जैसी कार्रवाई की जाती है। परंतु ये कदम स्थायी समाधान के बजाय अस्थायी राहत जैसे साबित हो रहे हैं।

अवैध वेंडर्स: जिम्मेदारी किसकी?

चलती ट्रेन में अवैध वेंडर्स का प्रवेश केवल सुरक्षा का ही नहीं, बल्कि राजस्व और स्वास्थ्य का भी मुद्दा है।

सवाल उठते हैं:

  • क्या टिकट जांचकर्ता और सुरक्षा बल इन्हें रोकने में विफल हैं?
  • क्या निगरानी में ढील है?
  • क्या ठेकेदारों और स्थानीय नेटवर्क की मिलीभगत की आशंका है?

रेलवे सुरक्षा बल की जिम्मेदारी है कि अनधिकृत विक्रेताओं को रोका जाए। लेकिन जमीनी स्तर पर यह नियंत्रण कमजोर दिखाई देता है।

यात्रियों के अधिकार और शिकायत प्रक्रिया

यात्रियों के लिए शिकायत दर्ज करने के कई विकल्प उपलब्ध हैं।

1. रेल मदद ऐप

  • 24×7 उपलब्ध प्लेटफॉर्म
  • फोटो अपलोड की सुविधा
  • फूड क्वालिटी, ओवरचार्जिंग, व्यवहार जैसी श्रेणियां
  • शिकायत के बाद रेफरेंस नंबर

2. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X

  • रेलवे मंत्रालय, संबंधित जोन या आईआरसीटीसी को टैग कर शिकायत
  • पीएनआर, ट्रेन नंबर, कोच व बर्थ विवरण देना आवश्यक

3. हेल्पलाइन नंबर 139

  • इंटरनेट न होने पर कॉल के माध्यम से शिकायत दर्ज

शिकायत दर्ज होने पर संबंधित स्टेशन के खानपान निरीक्षक को सूचना जाती है। दोषी पाए जाने पर 5,000 से 1 लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। बार-बार उल्लंघन पर ठेका रद्द करने की प्रक्रिया भी संभव है।

प्रशासनिक और नीतिगत प्रभाव

रेलवे केंद्र सरकार के अधीन है, इसलिए इसकी जवाबदेही संसद और रेलवे बोर्ड के स्तर पर तय होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • ठेके आवंटन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़े
  • खराब प्रदर्शन पर तत्काल ठेका निरस्तीकरण
  • रेट लिस्ट का कोच में अनिवार्य प्रदर्शन
  • तीसरे पक्ष द्वारा नियमित ऑडिट

नीतिगत सख्ती के बिना सुधार संभव नहीं है।

सामाजिक और स्वास्थ्य प्रभाव

खराब भोजन केवल सेवा की कमी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न भी है।

  • फूड पॉइजनिंग की आशंका
  • लंबी दूरी के यात्रियों पर दुष्प्रभाव
  • वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों के लिए जोखिम

रेल यात्रा आम और मध्यम वर्ग का प्रमुख साधन है। ऐसे में भोजन की गुणवत्ता पर समझौता सामाजिक असमानता को और गहरा करता है।

क्या समाधान संभव है?

विशेषज्ञों के सुझाव:

  • निजी क्षेत्र की प्रतिष्ठित कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा
  • लाइव फीडबैक सिस्टम
  • डिजिटल भुगतान और बिल अनिवार्य
  • रेट कार्ड का QR कोड
  • नियमित हेल्थ ऑडिट

रेलवे यदि तकनीकी और प्रशासनिक सुधारों को समान प्राथमिकता दे, तो स्थिति में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

जनमत और बढ़ती जागरूकता

सोशल मीडिया और डिजिटल शिकायत प्लेटफॉर्म के कारण यात्रियों की आवाज अब पहले से अधिक प्रभावी हुई है।

कई मामलों में शिकायत के दस मिनट के भीतर कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं।

हालांकि, स्थायी सुधार के लिए केवल शिकायत तंत्र पर्याप्त नहीं, बल्कि संरचनात्मक बदलाव जरूरी हैं।

निष्कर्ष

भारतीय रेलवे में खानपान व्यवस्था को लेकर उठते सवाल केवल सेवा गुणवत्ता का मुद्दा नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा भी हैं। अवैध वेंडर्स पर नियंत्रण, भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना और तय दरों का पालन कराना प्रशासनिक प्राथमिकता बनना चाहिए।

डिजिटल शिकायत तंत्र ने यात्रियों को आवाज दी है, लेकिन स्थायी समाधान तभी संभव है जब निगरानी सख्त हो और दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो।

रेलवे देश की जीवनरेखा है। यात्रियों का भरोसा बनाए रखने के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और किफायती खानपान व्यवस्था सुनिश्चित करना समय की मांग है।

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बचपन से यही सुनते आ रहे हैं जिसमें भारतीय रेलवे के द्वारा समय समय पर यह दावा किया जाता रहा है कि भारतीय रेल के संचालन और सुविधाओं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बनाया जाएगा, लेकिन बचपन से आज तक जबसे होश संभाला तब से लगभग पांच दशकों से यही देख रहे हैं कि रेलवे में हादसे दर हादसे, समय की पाबंदी का अभाव, रेल के अंदर दी जाने वाली बुनियादी सुविधाओं जिसमें साफ सफाई और खानपान विशेष रूप से उल्लेखित है, की स्थिति बहुत ज्यादा दयनीय ही नजर आती है।
एक समय था जब राजधानी एक्सप्रेस ही सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी। इस रेलगाड़ी के टिकिट में खाना, नाश्ता, चाय आदि सब कुछ का समावेश होता था। इसें वेंडर्स सामान बेचते नजर नहीं आते थे। आज अत्याधुनिक वंदे भारत के युग में राजधानी एक्सप्रेस में वेंडर्स चाय, नमकीन, समोसे, भजिए बेचते नजर आ रहे हैं। इतना ही नहीं जिन रेलगाड़ियों को विशेष सुविधा या प्रीमियम वाला बताया जाता है, उनमें भोजन की गुणवत्ता अक्सर स्वास्थ्य के मानकों पर खरी नहीं उतरती। एक यात्री के न केवल स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होता नजर आता है, वरन उसकी जेब तराशी भी जमकर ही होती दिखती है।
रेलवे के आंकड़ों पर ही अगर आप गौर करें तो स्थिति की गंभीरता आईने के मानिंद ही साफ नजर आती है। पिछले कुछ वर्षों में रेलवे खानपान की शिकायतों में भारी इजाफा हुआ है। इसमें औसतन हर रोज 35 से ज्यादा यात्री खराब खाने को लेकर औपचारिक शिकायत दर्ज कराते हैं। सरकार ने राज्यसभा में खुद स्वीकार किया था कि वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान खाने-पीने की गुणवत्ता को लेकर 6,645 शिकायतें प्राप्त हुईं। वर्ष 2021 से लेकर अगले चार वर्षों में रेलवे को कुल 19,174 शिकायतें खानपान से संबंधित मिलीं।
इसमें की गई शिकायतों की प्रकृति डराने वाली है। भोजन में तिलचट्टे , कीड़े या अन्य अखाद्य वस्तुओं का मिलना अब एक आम खबर बन चुकी है। इसके अलावा, यात्रियों से तय कीमत से अधिक राशि वसूलना और भोजन की कम मात्रा देना भी एक बड़ी समस्या है। दुखद पहलू यह है कि जब कोई जागरूक यात्री खराब भोजन पर आपत्ति जताता है, तो कई बार रेल कर्मियों या वेंडर्स द्वारा उनके साथ अभद्र व्यवहार और धक्का-मुक्की की खबरें भी सामने आती हैं।
कहने को तो रेलवे के पास एक विस्तृत निगरानी ढांचा है। आईआरसीटीसी के तहत आधुनिक बेस किचन से खाना बनवाने का दावा किया जाता है। भोजन तैयार करने की प्रक्रिया पर सीसीटीवी से निगरानी की बात कही जाती है। इतना ही नहीं इसके लिए खाद्य सुरक्षा पर्यवेक्षकों की तैनाती के दावे भी किए जाते हैं। अगर यह सब कुछ कागजों तक ही सीमित नहीं है तो फिर शिकायतों का अंबार क्यों!
रेलवे बोर्ड के एक अधिकारी ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान कहा कि जब शिकायतें आती हैं, तो रेलवे जुर्माने लगाने, चेतावनी देने या काउंसलिंग जैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई भी करता है। लेकिन ये उपाय इस मर्ज की दवा के बजाय केवल मलहम की तरह काम कर रहे हैं। जुर्माना भरने के कुछ समय बाद ठेकेदार फिर से वही ढर्रा अपना लेते हैं।
अब यक्ष प्रश्न यही खड़ा हुआ है कि रेलवे अपने मौजूदा केटरिंग मेकेनिज्म तंत्र के जरिए यात्रियों को स्वच्छ और पौष्टिक भोजन देने में विफल है, तो वह वैकल्पिक रास्तों पर विचार क्यों नहीं करता? इसके लिए क्या ट्रेनों में भोजन की आपूर्ति के लिए निजी क्षेत्र की नामी कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं होनी चाहिए? क्या खराब भोजन पर ठेका रद्द करने जैसी कठोर कार्रवाई स्थाई रूप से लागू नहीं की जा सकती?
सवाल यही है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे! रेलवे चूंकि केंद्र का मसला है इसलिए यहां सुनवाई सिर्फ और सिर्फ चुने हुए सांसदों की ही होती है, आम जनता की आवाज तो नक्कारखाने में तूती के मानिंद ही साबित होती है। आपने कभी सुना है कि किसी सांसद ने सदन में रेलवे की लेट लतीफी, जनता को मिलने वाली सुविधाओं को कागजों पर होना, बुजुर्गों को मिलने वाली रियायत आरंभ करने, रेलवे के स्तरहीन खान पान और साफ सफाई का मसला संसद में उठाया हो!
हां आम आदमी पार्टी के सांसद राजीव चढ्ढ़ा ने सदन में एयर पोर्ट पर 100 रूपए का पानी, 250 की चाय और 350 के समोसे का मामला उठाया तब जाकर इस मसले पर सुनवाई हो पाई। विमानतल पर अगर रेट कम हो सकते हैं तो रेलवे में अवैध वेण्डर्स को क्या रोका नहीं जा सकता! क्या टीटीई उनको देखकर कुछ नहीं कहते, क्या रेलवे सुरक्षा बल उनसे चौथ लेता है! क्या रेलवे की साफ सफाई और खानपान के स्तर को सुधारने की बात सांसद नहीं कर सकते!
आईए अब हम आपको बताते हैं कि अगर रेल में आपको कोई शिकायत हो तो आप क्या करें। रेलवे रेलवे की खराब खानपान व्यवस्था और शिकायतों के समाधान के लिए रेल मदद ऐप और अन्य डिजिटल माध्यम एक गेम-चेंजर साबित हुए हैं। आप इसमें कैसे अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं यह बताते हैं। रेल मदद पोर्टल और ऐप है, आप इसे डाऊनलोड कर सकते हैं। यह रेलवे का एक ऐसा मंच है जो चौबीसों घंटे काम करता है। यदि आपको ट्रेन में खराब खाना (जैसे कीड़ा मिलना या बदबू आना) मिला है, तो आप ऐप पर तुरंत फोटो अपलोड कर सकते हैं। आप इसके केटरिंग सेक्शन में जाकर फुड क्वालिटी, ओवर चार्जिंग, अनप्रोफेशनल बिहेवियर चुन सकते हैं। शिकायत दर्ज होन के बाद आपको एक रिफरेंस नंबर मिलेगा, जिसके जरिए आप देख सकते हैं कि आपकी शिकायत पर क्या कार्यवाही की गई है।
इसके अलावा आप ट्विटर या एक्स के जरिए भी कार्यवाही करवा सकते हैं। सोशल मीडिया का यह प्लेटफार्म फिलहाल जवाबदेही तय करने के लिए सबसे गतिवाला माना जा रहा है। आप एक्स पर जाकर रेल मिनिस्टर इंडिया, आईआरसीटीसी ऑफिशियल या संबंधित रेलवे जोन को सर्च करिए, आपको उनके एकाऊॅट मिलेंगे, जिसमें आप अपनी समस्या के साथ अपना पीएनआर, ट्रेन का नंबर, कोच व बर्थ लिखकर भेज दीजिए। अक्सर आपकी शिकायत के दस मिनिट के अंदर ही कोई न कोई आपसे संपर्क करता है और अगले स्टेशन पर जहां भी रेलगाड़ी रूकेगी कोई न कोई अधिकारी आकर आपकी समस्या का समाधान करने का प्रयास करेगा।
इसके बाद नंबर आता है हेल्पलाईन नंबर 139 का। अगर आपके पास इंटरनेट नहीं है, तो आप सीधे 139 डायल कर इस पर कॉल करके अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसमें कैटेरिंग सेवाओं के लिए विशेष विकल्प होता है। यह नंबर बहुत उपयोगी साबित हो रहा है रेलवे में।
अब जानिए कि आपकी शिकायत के बाद क्या होता है? जब आप डिजिटल माध्यम से शिकायत करते हैं, तो प्रक्रिया कुछ इस तरह चलती है। संबंधित स्टेशन के मुख्य खानपान निरीक्षक को तुरंत मैसेज जाता है। अगले बड़े स्टेशन पर वेंडर से सैंपल लिया जा सकता है या मौके पर मौजूद खाने की जांच की जाती है। यदि शिकायत सही पाई जाती है, तो वेंडर पर पांच हजार रूपए से लेकर 1 लाख रूपए तक का जुर्माना लगाया जाता है। बार-बार गलती होने पर ठेका रद्द करने की प्रक्रिया शुरू होती है।
अमूमन आप यात्री को या तो यह सब पता नहीं होता है या वह झंझट में पड़ना नहीं चाहता। यह आपका अधिकार है, अगर आप साु सफाई या खानपान में कमी पाते तो आप इसकी शिकायत जरूर करें। सांसदों को चाहिए कि वे रेलवे को इसके लिए पाबंद कराएं कि हर कोच के अंदर यह सब जानकारी चस्पा रहे। वहां रेट लिस्ट टंगी रहे ताकि वेंडर ज्यादा राशि न वसूल कर सके।
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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)