लिमटी की लालटेन749
सुनैत्रा पवार : राजनैतिक अनुकंपा नियुक्ति,संवैधानिक उत्तराधिकार अथवा राजनैतिक असंवेदनशीलता
हड़बड़ी में सुनेत्रा पवार की ताजपोशी से कहीं संदेश गलत न चला जाए सियासी हलकों में . . .
(लिमटी खरे)
महाराष्ट्र की राजनीति अपने नाटकीय मोड़ों और अप्रत्याशित निर्णयों के लिए जानी जाती है, लेकिन पूर्व उप मुख्यमंत्री अजीत पवार के निधन के बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने राजनीति की सीमाओं को सामाजिक संवेदना और नैतिकता से टकरा दिया। अजीत पवार के देवलोकगमन के मात्र चार दिन बाद उनकी पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार का महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना न केवल एक राजनीतिक निर्णय है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों, वंशवाद और सत्ता संस्कृति पर व्यापक बहस का कारण बन गया है।
यह निर्णय किसी के लिए प्रशासनिक अनिवार्यता है, तो किसी के लिए सत्ता की असंवेदनशीलता। सवाल यह नहीं कि यह फैसला कानूनी था या नहीं, बल्कि यह है कि क्या राजनीति को शोक,समयबोध और नैतिक मर्यादाओं से पूरी तरह अलग किया जा सकता है?
पृष्ठभूमि: अजीत पवार की राजनीतिक हैसियत और रिक्तता
अजीत पवार महाराष्ट्र की राजनीति के उन नेताओं में रहे, जिनकी पकड़ संगठन, प्रशासन और विधायकों पर समान रूप से मजबूत मानी जाती थी। वे केवल एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि एनसीपी (अजीत गुट) की धुरी थे। उनके नेतृत्व में पार्टी महायुति सरकार का अहम स्तंभ बनी रही।
28 जनवरी को बारामती में हुई विमान दुर्घटना में उनके निधन से न केवल उनका परिवार, बल्कि पूरा राज्य शोकाकुल हो गया। राजनीतिक दृष्टि से यह एक ऐसी रिक्तता थी, जिसने सत्ता संतुलन, गठबंधन की मजबूती और पार्टी के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिए।
वर्तमान घटनाक्रम: चार दिन में शपथ और उठते सवाल
शोक की लहर अभी थमी भी नहीं थी कि सत्ता के गलियारों में नेतृत्व को लेकर मंथन शुरू हो गया। महज 96 घंटों के भीतर सुनेत्रा पवार को उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। यह तेजी अपने आप में असाधारण थी।
राज्यसभा सांसद रहते हुए भी सुनेत्रा पवार पार्टी और संसदीय जिम्मेदारियां निभा सकती थीं, लेकिन उप मुख्यमंत्री पद स्वीकार करने के साथ यह लगभग तय हो गया कि वे राज्यसभा से त्यागपत्र देंगी और भविष्य में विधानसभा की राजनीति में प्रवेश करेंगी। इस क्रम ने यह आशंका भी जन्म दी कि आगे चलकर परिवार के अन्य सदस्यों के लिए राजनीतिक रास्ता खोला जाएगा।
पक्ष में दिए जा रहे तर्क: क्यों बताया जा रहा है यह निर्णय सही?
समर्थकों का पहला और प्रमुख तर्क प्रशासनिक निरंतरता का है। उनका कहना है कि:
- उप मुख्यमंत्री जैसे संवेदनशील पद को लंबे समय तक रिक्त नहीं रखा जा सकता
- महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में नेतृत्व शून्यता से प्रशासनिक अस्थिरता पैदा होती
- गठबंधन सरकार में देरी से सत्ता संतुलन बिगड़ सकता था
दूसरा तर्क सुनेत्रा पवार की योग्यता से जुड़ा है। समर्थकों के अनुसार वे केवल किसी नेता की पत्नी नहीं, बल्कि वर्षों से सामाजिक, सहकारी और संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़ी रही हैं। राजनीति को उन्होंने बहुत नज़दीक से देखा और समझा है।
तीसरा पक्ष राजनीतिक स्थिरता और रणनीति का है। अजीत पवार के बिना पार्टी में टूट की आशंका थी। विधायकों के शरद पवार गुट में लौटने का खतरा मंडरा रहा था। सुनेत्रा पवार की ताजपोशी से यह स्पष्ट संदेश गया कि नेतृत्व परिवार और गुट के भीतर सुरक्षित है, जिससे संभावित भगदड़ पर लगाम लगी।
इसके अतिरिक्त, समर्थक इसे ऐतिहासिक उपलब्धि भी बता रहे हैं, क्योंकि सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की पहली महिला उप मुख्यमंत्री बनी हैं। इससे महिला सशक्तिकरण का प्रतीकात्मक संदेश भी सामने आया है।
सहानुभूति और चुनावी गणित
भारतीय राजनीति में भावनाओं की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। अजीत पवार के निधन के बाद सहानुभूति की एक लहर पश्चिमी महाराष्ट्र, विशेषकर बारामती क्षेत्र में स्पष्ट दिखी। आगामी स्थानीय निकाय और भविष्य के विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह माना जा रहा है कि सुनेत्रा पवार उस भावनात्मक जुड़ाव को राजनीतिक समर्थन में बदलने का माध्यम बन सकती हैं।
विपक्ष के तर्क: क्यों कहा जा रहा है यह फैसला असंवेदनशील?
विपक्ष का सबसे मजबूत तर्क शोक की मर्यादा और समयबोध को लेकर है। भारतीय सामाजिक परंपरा में शोक की एक निश्चित अवधि मानी जाती है। पति के निधन के चार दिन बाद शपथ लेना कई लोगों को असंवेदनशील लगा।
दूसरा बड़ा आरोप वंशवादी राजनीति का है। आलोचकों का कहना है कि सत्ता बिना किसी आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सीधे परिवार में स्थानांतरित हो गई। दशकों से सक्रिय वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर यह संदेश गया कि शीर्ष पद परिवार के लिए आरक्षित हैं।
तीसरा सवाल प्रशासनिक अनुभव को लेकर उठाया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि राज्यसभा सांसद होना और विशाल राज्य के प्रशासन को संभालना दो अलग-अलग बातें हैं। क्या सुनेत्रा पवार नौकरशाही पर वही नियंत्रण स्थापित कर पाएंगी, जो अजीत पवार की पहचान थी, या वे केवल नाममात्र की उप मुख्यमंत्री बनकर रह जाएंगी?
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
इस घटनाक्रम का असर केवल सत्ता तक सीमित नहीं रहा। समाज में राजनीति के प्रति अविश्वास और गहराया। युवा वर्ग में यह धारणा बनी कि मेहनत और योग्यता के बजाय रिश्ते सत्ता तक पहुंच का माध्यम बनते जा रहे हैं।
राजनीतिक स्तर पर यह मुद्दा आने वाले समय में विपक्ष के लिए बड़ा हथियार बन सकता है, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन को लगातार यह साबित करना होगा कि यह निर्णय केवल भावनात्मक या पारिवारिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक रूप से भी सही है।
विशेषज्ञ दृष्टिकोण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला रणनीतिक रूप से समझने योग्य, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से जोखिम भरा है। लोकतंत्र में केवल कानून नहीं, बल्कि संवेदनशीलता भी नेतृत्व की ताकत होती है। समय का चयन कई बार निर्णय से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
भविष्य की संभावनाएं
अब सबकी निगाहें सुनेत्रा पवार की कार्यशैली पर होंगी। यदि वे:
- स्वतंत्र निर्णय क्षमता दिखाती हैं
- प्रशासनिक दक्षता स्थापित करती हैं
- पार्टी और गठबंधन को स्थिर रखती हैं
तो शुरुआती विवाद धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है। लेकिन यदि वे केवल विरासत की छाया में सीमित रहीं, तो यह फैसला लंबे समय तक आलोचना का विषय बना रहेगा।
🏁 निष्कर्ष
अजीत पवार के निधन के मात्र चार दिन बाद सुनेत्रा पवार का उप मुख्यमंत्री बनना भारतीय लोकतंत्र की जटिल वास्तविकताओं को उजागर करता है। यह एक साथ संवैधानिक रूप से वैध, राजनीतिक रूप से रणनीतिक और नैतिक रूप से विवादास्पद निर्णय है।
यह घटनाक्रम यह याद दिलाता है कि राजनीति केवल सत्ता संचालन नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी होती है। आने वाला समय तय करेगा कि सुनेत्रा पवार इस ताजपोशी को एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान में बदल पाती हैं या यह फैसला इतिहास में वंशवादी राजनीति और असंवेदनशील सत्ता संस्कृति के उदाहरण के रूप में दर्ज होता है।
महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी कोई बड़ा घटनाक्रम घटित होता है,उसका प्रभाव केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहता,बल्कि उसकी गूंज समाज,संवेदना और लोकतांत्रिक मर्यादाओं तक रहती है। वैसे भी महाराष्ट्र की सियासत नाटकीय घटनाक्रमों और अप्रत्याशित कदमों के लिए पहचानी जाने लगी है। महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री रहे अजीत पवार के निधन के मात्र चार दिन बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार द्वारा महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना ऐसा ही एक घटनाक्रम है,जिसने पूरे देश में तीखी बहस को जन्म दिया है।
यह निर्णय जहां एक ओर राजनीतिक स्थिरता,संवैधानिक प्रक्रिया और नेतृत्व की निरंतरता का प्रतीक बताया जा रहा है,वहीं दूसरी ओर इसे संवेदनहीनता,राजनीतिक अवसरवाद और वंशवादी राजनीति का चरम उदाहरण भी कहा जा रहा है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि शपथ लेना सही था या गलत,बल्कि यह है कि क्या राजनीति को मानवीय शोक,नैतिकता और समयबोध से पूरी तरह विलग किया जा सकता है?
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के जमीन से जुड़े जनाधार वाले नेता और सूबे के उप मुख्यमंत्री अजीत पवार का28 जनवरी को बारामती में विमान दुर्घटना में देवलोकगमन से समूचा सूबा न केवल स्तब्ध था वरन शोक र्में डूबा हुआ था। इससे सत्ता के गलियारों में एक रिक्तता महसूस की जाने लगी थी। शोक की लहर अभी जारी ही थी कि इसी शून्य की भरपाई के लिए उनके निधन से महज04 दिन बाद ही उनकी अर्धांग्नि एवं राज्य सभा सांसद सुनेत्रा पवार के द्वारा उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली गई। क्या राज्य सभा सांसद रहते हुए सुनेत्रा पवार पार्टी के दायित्वों का निर्वहन नहीं कर सकतीं थीं। अब उन्होंने राज्य के उप मुख्यमंत्री की शपथ ले ली है तो जाहिर है वे राज्य सभा से त्यागपत्र देंगी ही,और उनके स्थान पर उनके पुत्र पार्थ पवार को राज्यसभा भेज दिया जाएगा।
राजनीति की खासियत है कि परिवारवाद का विरोध हर किसी दल के द्वारा किया जाता है,पर परिवारवाद को उपजाऊ माहौल,खाद बीज भी सियासी दल के द्वारा ही दिए जाते हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी वरिष्ठ नेता का निधन हुआ है तब तब उनके वारिसान को ही उनकी कुर्सी थमाई जाती है। जिस तरह सरकारी नौकरी में अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान है उससे एक कदम आगे सियासत में राजनैतिक अनुकंपा नियुक्ति दिखाई देती है। यक्ष प्रश्न तो यही खड़ा हुआ है कि देश की सियासी व्यवस्था में क्या कोई पद अनुकंपा नियुक्ति या उत्तराधिकारी के लिए निर्मित किया गया है! राजनैतिक दल क्या किसी तरह का प्रतिष्ठान या पीठ है जो कुछ दिनों के लिए रिक्त नहीं रह सकती!
कहा जा रहा है कि अजीत पवार के निधन के उपरांत राज्य सरकार और गठबंधन में नेतृत्व को लेकर मंथन आरंभ हुआ,सत्ता में संतुलन बनाए रखने के लिए तत्काल ही उपमुख्यमंत्री के लिए नाम पर चर्चा आरंभ हो गई। गठबंधन के सहयोगियों के दबाव के चलते राजनैतिक गणनाएं आरंभ हुईं। सुनेत्रा पवार को आगे इसलिए किया गया ताकि सहानुभूति के चलते सियासी मारकाट पर लगाम लगाई जा सके। इस पूरे घटनाक्रम के पक्ष और विपक्ष दोनों में ही तर्क दिए जा रहे हैं। आईए हम सबसे पहले पक्ष में दिए जा रहे तर्कों को समझते हैं।
एनसीपी समर्थकों का कहना है कि सरकार के कामकाज को भावनाओं के आधार पर नहीं रोका जा सकता है। उप मुख्यमंत्री का पद रिक्त रहना प्रशासनिक अस्थिरता पैदा कर सकता था,ऐसे समय में त्वरित निर्णय आवश्यक था एवं राज्य जैसे बड़े प्रशासनिक ढांचे में नेतृत्व शून्यता को लंबे समय तक स्वीकार नहीं किया जा सकता। वहीं सुनेत्रा पवार के बारे में कहा जा रहा है कि वे सिर्फ अजीत पवार की अर्धांग्नि ही नहीं थीं,वे वर्षों से सामाजिक,सहकारी और संगठनात्मक कार्यों से जुड़ी रही हैं। राजनीति को नज़दीक से समझने का अनुभव उनके पास है। वे सत्ता संचालन की बारीकियों से परिचित हैं।
वहीं जानकार यह भी कहा रहे हैं कि राजनीतिक स्थिरता और गठबंधन की मजबूरी के चलते ऐसा कदम उठाया गया है,क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति गठबंधनों पर आधारित है। ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन में देरी से सरकार गिरने का खतरा था। सहयोगी दलों का विश्वास बनाए रखना जरूरी था। विपक्ष को अवसर न मिले,यह भी एक रणनीतिक आवश्यकता थी। यह निर्णय समर्थकों के अनुसार भावनात्मक नहीं,बल्कि रणनीतिक था।
वहीं,पार्टी को को बिखरने से बचाने की रणनीति के चलते यह किया गया है,क्योंकि अजीत पवार एनसीपी (अजीत गुट) के केवल नेता नहीं थे,बल्कि वे पार्टी की धुरी थे। उनकी प्रशासनिक पकड़ और विधायकों पर नियंत्रण ही महायुति सरकार में पार्टी की ताकत का आधार था। उनके जाने से पार्टी में एक नेतृत्व का संकट पैदा हो गया था। आशंका थी कि अजीत दादा के बिना विधायक असहाय महसूस करेंगे और शायद शरद पवार गुट की ओर वापस लौट जाएं। अब सुनेत्रा पवार के शपथ लेते ही यह संदेश प्रसारित हो गया है कि पार्टी का नेतृत्व अजीत पवार के परिवार के पास ही है। इस कदम को संभावित भगदड़ को रोकने की दिशा में एक सर्जिकल स्ट्राईक भी माना जा रहा है। इसके अलावा वे महाराष्ट्र की पहली महिला उप मुख्यमंत्री बनीं हैं,इससे महिला सशक्तिकरण का जबर्दस्त संदेश भी प्रसारित हुआ है।
सहानुभूति की लहर और चुनावी समीकरण भारतीय राजनीति में भावनाओं का गहरा स्थान है। अजीत पवार की मृत्यु एक त्रासदी थी,और जनता के बीच उनके लिए सहानुभूति की एक बड़ी लहर है। आगामी जिला परिषद और भविष्य के विधानसभा चुनावों को देखते हुए,एनसीपी और महायुति गठबंधन (भाजपा,शिवसेना-शिंदे) को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो इस सहानुभूति को वोटों में बदल सके। सुनेत्रा पवार उस इमोशनल कनेक्ट का चेहरा हैं। उनकी ताजपोशी से बारामती और पश्चिमी महाराष्ट्र में भावनात्मक समर्थन को एकजुट करने में मदद मिलेगी,जो गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।
अब बात की जाए उनके उप मुख्यमंत्री बनने की शपथ लेने के विपक्ष के तर्कों की तो विपक्ष का मानना है कि इसमें शोक की मर्यादा और समयबोध का अभाव जैसी स्थिति निर्मित हुई है। पति के निधन के केवल चार दिन बाद शपथ लेना सामाजिक रूप से असंवेदनशील है। भारतीय संस्कृति में शोक की एक परंपरा और समयसीमा होती है। सत्ता की जल्दबाज़ी ने मानवीय संवेदना को पीछे छोड़ दिया गया और यह प्रश्न उठता है कि क्या सत्ता इतनी अनिवार्य थी कि शोक को स्थगित करना पड़ा?माना जाता है कि जिसके घर शोक या सूतक होता है वह कम से कम10 या13 दिन तक तो शोक या वैराग्य में समय व्यतीत करता है। सोशल मीडिया पर इसे सत्ता की भूख भी निरूपित करने से नहीं चूक रहे हैं कुछ लोग।
इसके अलावा वंशवाद की सियासत पर मुहर लगती दिख रही है। आलोचकों का कहना है कि यह घटना वंशवादी राजनीति का खुला उदाहरण है। सत्ता एक परिवार से दूसरे हाथों में बिना लोकतांत्रिक संघर्ष के चली गई। आम कार्यकर्ताओं और नेताओं के अवसर सीमित हो गए जिससे यह संदेश जाता है कि राजनीति में अवसर योग्यता से नहीं,रिश्तों से मिलते हैं। पार्टी में छगन भुजबल,प्रफुल्ल पटेल अथवा सुनील पठकरे जैसे नेता दशकों से सक्रिय हैं,इसके बाद भी सुनेत्रा पवार जो कि राज्य सभा सांसद हैं,को अब वहां से त्यागपत्र दिलाया जाकर विधायक का चुनाव लड़वाया जाएगा,और फिलहाल उन्हें उप मुख्यमंत्री बना दिया गया है। कुछ लोग तो यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि कार्यकर्ता चाहे जितनी भी मेहनत कर लें,पर शीर्ष पद तो परिवार के लिए ही आरक्षित होते हैं।
वहीं,प्रशासनिक चुनौतियों पर यह कहा जा रहा है कि सुनेत्रा पंवार भले ही राज्य सभा सांसद हों,लेकिन उनके पास राज्य प्रशासन चलाने,कैबिनेट बैठकों में निर्णय लेने,या जटिल गठबंधन राजनीति को संभालने का सीधा अनुभव नहीं है। विपक्ष का कहना है कि महाराष्ट्र जैसे विशाल और जटिल राज्य का उपमुख्यमंत्री पद सीखने की जगह नहीं हो सकता। क्या वे नौकरशाही पर अजीत दादा जैसा नियंत्रण रख पाएंगी?या वे केवल एक रबर स्टैम्प बनकर रह जाएंगी और वास्तविक सत्ता किसी और (संभवतः भाजपा) के हाथ में होगी?
विपक्ष (महाविकास अघाड़ी) का आरोप है कि भाजपा और महायुति,अजीत पवार की मृत्यु का राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। इतनी जल्दी शपथ दिलाना यह दिखाता है कि उन्हें डर था कि अगर समय बीत गया तो सहानुभूति की लहर कम हो जाएगी। यह लाशों पर राजनीति करने जैसा है। विपक्ष का तर्क है कि अजीत पवार के प्रति असली श्रद्धांजलि उनके विचारों को आगे बढ़ाना होती,न कि उनकी पत्नी को ढाल बनाकर चुनाव की तैयारी करना।
देखा जाए तो अजीत पवार के निधन के मात्र96 घंटों के अंदर ही सुनेत्रा पवार का उपमुख्यमंत्री बनना भारतीय लोकतंत्र की विडंबना और वास्तविकता दोनों को दर्शाता है। पक्ष में देखा जाए तो यह एक व्यावहारिक निर्णय है,पार्टी को बचाने,सरकार को स्थिर रखने और विरासत को संभालने का एक प्रयास। यह एक महिला को राज्य के सर्वाेच्च पदों में से एक पर पहुँचाने का ऐतिहासिक क्षण भी है। विपक्ष में देखा जाए तो यह नैतिकता के पतन,परिवारवाद की जकड़न और सत्ता की निरंकुश भूख का परिचायक है।
अंततः,यह समय ही बताएगा कि सुनेत्रा पवार केवल अजीत पवार की पत्नी बनकर रह जाती हैं,या वे अपनी खुद की एक अलग राजनीतिक पहचान और प्रशासनिक छाप छोड़ने में सफल होती हैं। फिलहाल,महाराष्ट्र की जनता इस शपथ ग्रहण को आंसुओं और आशंकाओं,दोनों के धुंधले चश्मे से देख रही है। राजनीति में भावनाएं क्षणिक होती हैं,लेकिन प्रदर्शन स्थायी होता है,सुनेत्रा पवार की असली परीक्षा अब शुरू हुई है।
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