(हेमेन्द्र क्षीरसागर)
शून्य से शिखर तक: राष्ट्रवाद को समर्पित विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल का उदय भारत के राजनीतिक इतिहास में 6 अप्रैल का दिन महज एक तारीख नहीं, बल्कि एक वैचारिक क्रांति का प्रतीक है। देश को एक समर्थ, सुरक्षित और स्वाभिमानी राष्ट्र बनाने की मीमांसा के साथ भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थापना 6 अप्रैल, 1980 को नई दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में आयोजित एक विशाल कार्यकर्ता अधिवेशन में की गई थी। इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में भारतीय राजनीति के अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी निर्वाचित हुए थे। प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन 28, 29 और 30 दिसंबर 1980 को सपनों की नगरी मुंबई में आयोजित किया गया था।
अपनी स्थापना के पहले दिन से ही भाजपा ने राष्ट्रीय एवं लोकहित के विषयों पर मुखर रहते हुए भारतीय लोकतंत्र में अपनी सशक्त और निर्भीक भागीदारी दर्ज की है। महज दो लोकसभा सीटों से शुरू हुआ यह सफर आज पूर्ण बहुमत की लगातार तीसरी बार बनी केंद्र सरकार तक पहुंच चुका है। देश में विकास आधारित राजनीति की ठोस नींव भी भाजपा ने विभिन्न राज्यों में सत्ता में आने के बाद तथा पूरे देश में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) शासन के दौरान रखी। आज यह पार्टी केवल सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि 14 करोड़ से अधिक सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन चुकी है।
नेहरू का अधिनायकवाद और तुष्टिकरण की राजनीति का प्रतिकार भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक बीज स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक बाद ही बो दिए गए थे। महात्मा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के बाद, तत्कालीन सत्ताधारियों ने एक नया राजनीतिक षड्यंत्र रचते हुए राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगा दिया। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के देहावसान के पश्चात् कांग्रेस के भीतर पंडित जवाहरलाल नेहरू का अधिनायकवाद और एकाधिकार प्रबल होने लगा।
गांधी और पटेल दोनों के ही नहीं रहने के कारण कांग्रेस पूरी तरह से नेहरूवाद की चपेट में आ गई। इस दौर में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, भ्रष्ट लाइसेंस-परमिट-कोटा राज, और राष्ट्रीय सुरक्षा पर घोर लापरवाही जैसे मुद्दे सामने आने लगे। राष्ट्रीय मसलों, विशेषकर कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर घुटनाटेक नीति और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारतीय हितों की अनदेखी ने देश के राष्ट्रवादी नागरिकों को भीतर तक उद्विग्न कर दिया। नेहरूवाद तथा तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हो रहे निर्मम अत्याचारों पर भारत सरकार की रहस्यमयी चुप्पी से क्षुब्ध होकर प्रखर राष्ट्रवादी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरु मंत्रिमंडल से अपना ऐतिहासिक त्यागपत्र दे दिया।
भारतीय जनसंघ की स्थापना और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सर्वोच्च बलिदान संघ पर लगे प्रतिबंध और सत्ता के निरंकुश रवैये ने एक बात स्पष्ट कर दी थी कि देश में एक वैकल्पिक राष्ट्रवादी राजनीतिक शक्ति की तत्काल आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई विचारकों ने महसूस किया कि राजनीतिक क्षेत्र से सिद्धांततः दूरी बनाये रखने के कारण राष्ट्रवादी विचारों को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा है।
इसी शून्यता को भरने और एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल की आवश्यकता को मूर्त रूप देने के लिए 21 अक्टूबर, 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में दिल्ली के राघोमल आर्य कन्या उच्च विद्यालय में ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की गई। जनसंघ का स्पष्ट मत था कि भारत एक राष्ट्र है और इसका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही इसकी असली पहचान है।
नेहरू सरकार के तुष्टिकरण और अनुच्छेद 370 जैसी अलगाववादी नीतियों के खिलाफ डॉ. मुखर्जी ने ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान- नहीं चलेंगे’ का सिंहनाद किया। अपने इसी संकल्प को पूरा करने के लिए वे बिना परमिट कश्मीर में प्रवेश कर गए। नेहरू के अधिनायकवादी रवैये के फलस्वरूप डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को कश्मीर की जेल में डाल दिया गया, जहां 23 जून 1953 को रहस्यपूर्ण परिस्थितियों में उनका स्वर्गवास हो गया। यह भारतीय राजनीति का एक ऐसा काला अध्याय था जिसने जनसंघ के कार्यकर्ताओं के भीतर राष्ट्रवाद की ज्वाला को और धधका दिया।
कांग्रेस का एकाधिकार टूटना और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का युग डॉ. मुखर्जी के बलिदान के बाद एक नई पार्टी को सशक्त बनाने का पूरा उत्तरदायित्व प्रखर चिंतक और संगठनकर्ता पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मजबूत कंधों पर आ गया। उन्होंने जनसंघ को गांव-गांव तक पहुंचाया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भी भारतीय जनसंघ ने देशहित में महत्वपूर्ण और रचनात्मक भूमिका निभाई।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कुशल नेतृत्व और जमीनी रणनीति का ही परिणाम था कि 1967 में पहली बार भारतीय राजनीति पर लम्बे समय से बरकरार कांग्रेस का एकाधिकार टूटा। कई उत्तर भारतीय राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को करारी पराजय का सामना करना पड़ा और संविद सरकारों के रूप में जनसंघ एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बनकर उभरा।
आपातकाल का काला दौर, कार्यकर्ताओं की मीसाबंदी और लोकतंत्र की रक्षा सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार पूरी तरह निरंकुश होती जा रही थी। भ्रष्टाचार और कुशासन के विरूद्ध पूरे देश में व्यापक जन-असंतोष उभरने लगा। गुजरात और बिहार के जनान्दोलनों से घबराकर इंदिरा गांधी की सरकार ने जनता की लोकतांत्रिक आवाज को दमनचक्र से कुचलने का क्रूर प्रयास किया।
परिणामत: 25 जून, 1975 की मध्यरात्रि को देश पर ‘आपातकाल’ थोप दिया गया। देश के सभी बड़े विपक्षी नेताओं—अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई—को या तो नजरबंद कर दिया गया अथवा रातों-रात जेलों में ठूंस दिया गया। समाचार पत्रों की स्वतंत्रता छीन ली गई और उन पर सख्त सेंसरशिप लगा दी गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अनेक राष्ट्रवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
लोकतंत्र को बचाने के इस महायज्ञ में हजारों कार्यकर्ताओं को मीसा (MISA) और डीआईआर (DIR) जैसे काले कानूनों के तहत गिरफ्तार कर अमानवीय यातनाएं दी गईं। अंततः जनता के अभूतपूर्व संघर्ष के दबाव में इंदिरा गांधी को 18 जनवरी, 1977 को लोकसभा भंग कर चुनाव की घोषणा करनी पड़ी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर लोकतंत्र की बहाली के लिए एक नये राष्ट्रीय दल ‘जनता पार्टी’ का गठन किया गया। आम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई और जनता पार्टी भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए, पूर्व घोषणा के अनुसार 1 मई, 1977 को भारतीय जनसंघ ने अपना संपूर्ण विलय जनता पार्टी में कर दिया।
दोहरी सदस्यता का विवाद और 6 अप्रैल 1980 को ‘कमल’ का खिलना जनता पार्टी का प्रयोग बहुत लंबे समय तक नहीं चल सका। आपसी महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक मतभेदों के चलते सरकार गिर गई। इसी दौरान जनसंघ से आए नेताओं पर ‘दोहरी सदस्यता’ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनता पार्टी दोनों का सदस्य होने) का झूठा आरोप लगाकर उन्हें बाहर करने का षड्यंत्र रचा गया। राष्ट्रवाद और संघ के संस्कारों से समझौता न करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में जनसंघ धड़े ने खुद को जनता पार्टी से अलग कर लिया।
इसी पृष्ठभूमि में 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ। प्रथम अध्यक्ष के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने जो ऐतिहासिक भाषण दिया था, उसके शब्द आज भी गूंजते हैं— “अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा।” यह सिर्फ एक राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के लिए एक भविष्यवाणाी थी जो दशकों बाद सच साबित हुई।
भाजपा की ‘पंचनिष्ठा’ और एकात्म मानववाद का वैचारिक दर्शन भारतीय जनता पार्टी कोई साधारण दल नहीं है, बल्कि यह एक सुदृढ़ विचारधारा पर आधारित है। भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘एकात्म-मानवदर्शन’ (Integral Humanism) को अपने आधारभूत वैचारिक दर्शन के रूप में अपनाया है। पार्टी ने अपनी कार्यप्रणाली के लिए पांच प्रमुख सिद्धांत या ‘पंचनिष्ठा’ तय किए:
- राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय अखंडता
- लोकतंत्र
- सर्व धर्म समभाव (सकारात्मक पंथनिरपेक्षता)
- गांधीवादी समाजवाद (शोषणविहीन समाज की स्थापना)
- मूल्य आधारित राजनीति
इन्हीं निष्ठाओं के बल पर भाजपा ने समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति (अंत्योदय) के उत्थान को अपनी नीतियों का केंद्र बिंदु बनाया है।
अटल से लेकर मोदी तक: सुशासन, विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का युग 1984 के लोकसभा चुनावों में मात्र 2 सीटें जीतने वाली पार्टी ने अपने दृढ़ संकल्प से 1996 में पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाई। यद्यपि वह सरकार 13 दिन ही चली, लेकिन उसने देश को गठबंधन धर्म और विकास की राजनीति का एक नया विकल्प दिया। बाद में 1998 और 1999 में वाजपेयी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने पोखरण परमाणु परीक्षण, करगिल विजय, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और दूरसंचार क्रांति जैसे ऐतिहासिक कदम उठाए।
स्तुत्य है कि आज भाजपा देश में एक प्रमुख और अजेय राष्ट्रवादी शक्ति के रूप में स्थापित हो चुकी है। देश के सुशासन, बुनियादी ढांचे के विकास, एकता एवं अखंडता के लिए पार्टी कृतसंकल्प है। वर्तमान परिदृश्य में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के यशस्वी नेतृत्व में देश में पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी दल ने लगातार तीन बार (2014, 2019, 2024) पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का ऐतिहासिक कीर्तिमान रचा है।
अतुल्य और निरंतर तीसरी बार आज ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ की उद्घोषणा के साथ यह सरकार एक गौरव सम्पन्न और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का पुनर्निर्माण कर रही है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति, भव्य राम मंदिर का निर्माण, और तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं का अंत भाजपा के वैचारिक संकल्पों की सिद्धि के सबसे बड़े प्रमाण हैं। अतिरेक, देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा या एनडीए सहयोगी दलों की ‘डबल इंजन’ सरकारें चतुर्दिक विकास के पथ पर अग्रसर हैं।
वंशवाद और परिवारवाद से दूर: कार्यकर्ताओं के समर्पण की मिसाल अभिभूत करने वाली बात यह है कि लगभग 45 वर्षों की इस राजनीतिक यात्रा में भाजपा आज 14 करोड़ से अधिक सदस्यों वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बन गई है। यह एक ऐसा दल है जहां साधारण कार्यकर्ता से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष (जैसे वर्तमान में जे.पी. नड्डा) और प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पर कोई भी कर्मठ व्यक्ति पहुंच सकता है।
भाजपा अन्य दलों से पूर्णतया विशिष्ट है। यह केवल एक चुनाव लड़ने वाली मशीन या राजनीतिक दल नहीं, बल्कि विचारधारा, राष्ट्र-प्रथम के सिद्धांत और जनसेवा की एक जीवंत परंपरा है। यह एक ऐसा संगठन है जो सत्ता को अपना अंतिम लक्ष्य या भोग का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा और समाज कल्याण का पवित्र माध्यम मानता है।
यहां हर कार्यकर्ता राजनीति में सत्ता की चाह से नहीं, बल्कि जनसेवा के अटल संकल्प के साथ उतरता है। यह वह अद्वितीय संगठन है जहां व्यक्ति नहीं विचार, और परिवार नहीं कार्यकर्ता ही पार्टी की असली पहचान होता है। कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह यहां चाटुकारिता या जन्म के आधार पर नेतृत्व तय नहीं होता। जहां सिफारिश नहीं, बल्कि पसीना और समर्पण आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। यही लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक विशेषता भारतीय जनता पार्टी को देश के अन्य सभी राजनीतिक दलों से अलग, पवित्र और विशिष्ट बनाती है।
निष्कर्ष
छह अप्रैल का दिन भारतीय राजनीति में उस संघर्ष और संकल्प का स्मरण कराता है जो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे महापुरुषों ने देखा था। 1980 में बोया गया वह छोटा सा बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है, जिसकी छांव में पूरा देश प्रगति कर रहा है। ‘राष्ट्र प्रथम, पार्टी द्वितीय और व्यक्ति अंतिम’ के मंत्र पर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी ने सिद्ध कर दिया है कि यदि राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया जाए, तो जनता का अटूट आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। आने वाले समय में, ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को साधने में भी भाजपा के इसी वैचारिक अधिष्ठान और करोड़ों कार्यकर्ताओं की निस्वार्थ तपस्या की सबसे बड़ी और निर्णायक भूमिका होगी।
(साई फीचर्स)

मौसम विभाग पर जमकर पकड़, लगभग दो दशकों से मौसम का सटीक पूर्वानुमान जारी करने के लिए पहचाने जाते हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 20 वर्षों से ज्यादा समय से सक्रिय महेश रावलानी वर्तमान में समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के ब्यूरो के रूप में कार्यरत हैं .
समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया देश की पहली डिजीटल न्यूज एजेंसी है. इसका शुभारंभ 18 दिसंबर 2008 को किया गया था. समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया में देश विदेश, स्थानीय, व्यापार, स्वास्थ्य आदि की खबरों के साथ ही साथ धार्मिक, राशिफल, मौसम के अपडेट, पंचाग आदि का प्रसारण प्राथमिकता के आधार पर किया जाता है. इसके वीडियो सेक्शन में भी खबरों का प्रसारण किया जाता है. यह पहली ऐसी डिजीटल न्यूज एजेंसी है, जिसका सर्वाधिकार असुरक्षित है, अर्थात आप इसमें प्रसारित सामग्री का उपयोग कर सकते हैं.
अगर आप समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को खबरें भेजना चाहते हैं तो व्हाट्सएप नंबर 9425011234 या ईमेल samacharagency@gmail.com पर खबरें भेज सकते हैं. खबरें अगर प्रसारण योग्य होंगी तो उन्हें स्थान अवश्य दिया जाएगा.





