(युगल पाण्डेय)
नई दिल्ली। महानगरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में अक्सर इंसान अपनी जड़ों और अपनी मिट्टी की महक से दूर हो जाता है, लेकिन कुछ समुदाय ऐसे होते हैं जो इस दूरी को पाटने का काम करते हैं। दिल्ली के हृदय स्थल कनॉट प्लेस स्थित ’38 बैरक्स’ (38 Barracks) रेस्टोरेंट में बीते दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। अवसर था ‘इलाहाबादी ग्लोबल कनेक्ट’ (AGC) के छठे स्थापना दिवस का, जहां दिल्ली-एनसीआर के लगभग 90 सदस्यों ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों का उत्सव मनाया। यह आयोजन केवल एक सामाजिक मेल-जोल नहीं था, बल्कि उस सामूहिक गौरव और रचनात्मकता का प्रदर्शन था, जिसने प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) के हजारों लोगों को एक मंच पर ला खड़ा किया है।

साहित्य और बौद्धिक विमर्श से हुई शुरुआत
आज के दौर में जहां सोशल मीडिया ग्रुप्स अक्सर केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित रह जाते हैं, वहीं एजीसी (AGC) ने इसे भावनात्मक रूप से समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक बनाया है। कार्यक्रम का शुभारंभ बेहद गरिमामय रहा। मुख्य अतिथि और सेवानिवृत्त आईआरएस (IRS) अधिकारी श्रीमती शिखा दरबारी ने दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन किया।
इनमें आशीष बेरी की पुस्तक ‘आवर माइंडस्टेशन’ (Our Mindstation) और अनुज अनहद की ‘शब्दों की वैक्सीन’ (Shabdon Ki Vaccine) शामिल रहीं। पुस्तकों का यह विमोचन इस बात का प्रमाण है कि यह समुदाय न केवल लोगों को जोड़ रहा है, बल्कि अपने सदस्यों के भीतर छिपी साहित्यिक प्रतिभा और रचनात्मक अभिव्यक्ति को भी प्रोत्साहित कर रहा है।
परिचय से गहराते रिश्तों की नींव
कार्यक्रम के दौरान एक विशेष परिचय सत्र का आयोजन किया गया। इसमें शामिल प्रोफेशनल्स, कलाकार, उद्यमी और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने कार्यक्षेत्र और विशेषज्ञता को साझा किया। यह सत्र केवल नेटवर्किंग का जरिया नहीं था, बल्कि इसने एक समावेशी माहौल तैयार किया, जहां अलग-अलग क्षेत्रों के लोग एक साझा सांस्कृतिक पहचान के नीचे एकजुट नजर आए। उपस्थित लोगों के बीच की गर्मजोशी और अपनेपन ने यह अहसास कराया कि यह कोई औपचारिक सभा नहीं, बल्कि एक बड़ा परिवार है।
संगीत और संस्कृति का संगम: ‘नाकाबंदी’ ने जीता दिल
सांस्कृतिक संध्या का आकर्षण संगीत रहा, जिसने कार्यक्रम में नई ऊर्जा भर दी। बॉलीवुड गायिका अनुजा सिन्हा की शानदार प्रस्तुति ने समां बांध दिया। वहीं, अर्चना सिंह, विप्लव मिश्रा और डॉ. अनंत तिवारी के सुरों ने माहौल को और भी जीवंत बना दिया। एजीसी की सबसे बड़ी विशेषता इसका सहभागी मॉडल (Participatory Model) है, जहां सदस्य केवल दर्शक नहीं होते, बल्कि अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर आयोजन का हिस्सा बनते हैं।
शाम का सबसे भावुक और ऊर्जावान क्षण वह था, जब सभी सदस्यों ने मिलकर प्रसिद्ध ‘इलाहाबादी एंथम’ यानी “नाकाबंदी सॉन्ग” (Nakabandi Song) गाया। यह गीत केवल धुन नहीं, बल्कि उन यादों का प्रतीक है जो हर प्रयागराज वासी के दिल में बसी होती हैं, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में रह रहा हो।
महामारी के दौर से वैश्विक पहचान तक का सफर
एजीसी के इस छठे स्थापना दिवस के महत्व को समझने के लिए इसके इतिहास में झांकना जरूरी है। इस समुदाय की स्थापना 5 अप्रैल 2020 को कोविड-19 महामारी के दौरान हुई थी। वह दौर अनिश्चितता, अलगाव और सामाजिक दूरी का था। जब लोग अपने घरों में कैद थे, तब सौरभ अस्थाना ने एक डिजिटल प्लेटफॉर्म की परिकल्पना की ताकि प्रयागराज के लोगों को जोड़ा जा सके।
शुरुआत एक साधारण फेसबुक ग्रुप से हुई थी, लेकिन देखते ही देखते यह एक सपोर्ट सिस्टम और सांस्कृतिक केंद्र बन गया। आज 6 वर्षों के भीतर, एजीसी 20,000 से अधिक सदस्यों का एक जीवंत वैश्विक परिवार बन चुका है, जिसके भारत के पांच प्रमुख शहरों में सक्रिय चैप्टर हैं।

शहरी भारत में ‘निश कम्युनिटी’ का महत्व
एजीसी की सफलता केवल एक सोशल मीडिया ग्रुप की सफलता नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक बदलाव का संकेत है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे मेट्रो शहरों में पलायन के कारण लोग अक्सर अपनी पारंपरिक सहायता प्रणालियों से दूर हो जाते हैं। ऐसे में एजीसी जैसे समुदाय उस खाई को पाटते हैं। यह सदस्यों को एक ऐसा स्थान प्रदान करते हैं जहां भाषा, हास्य, मूल्य और यादें तुरंत परिचित महसूस होती हैं।
एजीसी की विशिष्टता के मुख्य कारण:
- मजबूत क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचान: यह अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ा है।
- ऑनलाइन और ऑफलाइन तालमेल: डिजिटल चर्चाओं को वास्तविक मुलाकातों में बदलना।
- प्रतिभा को प्रोत्साहन: साहित्यिक और बौद्धिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।
- सपोर्ट नेटवर्क: विभिन्न आयु वर्ग और व्यवसायों के बीच एक सेतु का निर्माण।
कुशल नेतृत्व और समर्पित टीम का योगदान
किसी भी समुदाय की रीढ़ उसका नेतृत्व होता है। सौरभ अस्थाना की दूरदर्शिता को अमिताभ लालोरिया और विनीत खरे के अनुभवों ने मजबूती दी। इसके साथ ही, मॉडरेटर्स की एक समर्पित टीम—नीलम श्रीवास्तव, विनोद स्वरूप, सुनीता पात्रो, निधि श्रीवास्तव और पंकज सेठ—ने इस संगठन को समावेशी और सक्रिय बनाए रखने में स्तंभ की भूमिका निभाई है। डिजिटल समुदायों में मॉडरेटर्स ही भरोसे के वास्तुकार होते हैं, जो संवाद की गरिमा और सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करते हैं।
भविष्य की राह और सामाजिक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे ‘माइक्रो-कम्युनिटी’ प्लेटफॉर्म्स की प्रासंगिकता और बढ़ेगी। एजीसी का भविष्य अब केवल सोशल नेटवर्किंग तक सीमित नहीं है। आने वाले वर्षों में यह समुदाय बड़े अंतर-शहरी मिलन, साहित्यिक उत्सवों, मेंटरशिप कार्यक्रमों और सामाजिक कल्याण के कार्यों में अपनी भूमिका विस्तार कर सकता है।
यह मॉडल अन्य क्षेत्रीय समुदायों के लिए भी एक मानक (Benchmark) बन सकता है, जो दिखाता है कि कैसे पुरानी यादों (Nostalgia) और आधुनिक तकनीक के बीच संतुलन बनाकर एक सशक्त सामाजिक विरासत खड़ी की जा सकती है।
दिल्ली में आयोजित इलाहाबादी ग्लोबल कनेक्ट का छठा स्थापना दिवस केवल एक वर्षगांठ नहीं, बल्कि इस बात का उत्सव था कि आधुनिक युग में सार्थक समुदाय कैसे बनाए जाते हैं। पुस्तक विमोचन से लेकर सांस्कृतिक प्रदर्शनों तक, इस आयोजन ने स्पष्ट कर दिया कि तकनीक का सही उपयोग रिश्तों को मजबूत करने और अपनी संस्कृति को सहेजने के लिए किया जा सकता है। महामारी की अनिश्चितता से उपजा यह ‘परिवार’ आज 20,000 दिलों की धड़कन बन चुका है। यह आयोजन एक कड़ा संदेश देता है: जब लोग अपनी पहचान और एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं, तो वे केवल एक नेटवर्क नहीं, बल्कि एक अटूट सामाजिक विरासत का निर्माण करते हैं।

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