सिवनी-कटंगी रेल परियोजना पर बड़ा झटका: 40 किमी की जगह 92 किमी लाइन को रेलवे ने बताया असंभव

सिवनी से कटंगी के बीच प्रस्तावित रेल लाइन को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है, जहां 40 किमी की लाइन को 92 किमी तक बढ़ाने के प्रस्ताव को रेलवे ने सर्वे के बाद असंभव बताया। यह मामला पूर्व सांसद की सिफारिश से जुड़ा हुआ है। इस निर्णय का असर क्षेत्रीय विकास, रेल कनेक्टिविटी और स्थानीय राजनीति पर पड़ सकता है।

लिमटी की लालटेन 753
सिर्फ 40 किलोमीटर की रेल लाईन को 92 किलोमीटर लंबा करने पर रेलवे ने सर्वे के बाद इसे बताया असंभव
पूर्व सांसद डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने की थी 92 किलोमीटर लंबी रेल लाईन की वकालत
(लिमटी खरे)

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सिवनी रेल कनेक्टिविटी का मुद्दा फिर चर्चा में

मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में रेल कनेक्टिविटी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। लंबे समय से सिवनी से कटंगी के बीच रेल लाइन निर्माण की मांग उठती रही है। लेकिन हाल ही में सामने आई जानकारी के अनुसार, रेलवे द्वारा किए गए सर्वे में 92 किलोमीटर लंबे प्रस्तावित रेल मार्ग को नॉन फिजिबल बताया गया है।

इस निर्णय ने न केवल स्थानीय लोगों बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। रेल परियोजनाएं आमतौर पर विकास, रोजगार और कनेक्टिविटी का बड़ा आधार मानी जाती हैं, इसलिए इस फैसले का असर व्यापक स्तर पर देखने को मिल सकता है।

पृष्ठभूमि: कैसे शुरू हुआ रेल लाइन विस्तार का मामला

सिवनी से कटंगी के बीच मूल रूप से लगभग 40 किलोमीटर लंबी रेल लाइन का प्रस्ताव था। यह मार्ग तकनीकी और आर्थिक रूप से व्यवहारिक माना जा रहा था।

लेकिन बाद में पूर्व सांसद द्वारा सिवनी से बरघाट, धपारा, सकाटा होते हुए कटंगी तक लगभग 92 किलोमीटर लंबा रेल मार्ग प्रस्तावित किया गया।

इस बदलाव ने पूरे प्रोजेक्ट की लागत, भूमि अधिग्रहण और तकनीकी जटिलताओं को कई गुना बढ़ा दिया।

रेलवे सूत्रों के अनुसार:

  • 40 किमी मार्ग – अपेक्षाकृत कम लागत
  • 92 किमी मार्ग – अत्यधिक लागत और जमीन अधिग्रहण चुनौती
  • परियोजना का आर्थिक संतुलन बिगड़ गया

वर्तमान स्थिति: रेलवे सर्वे में क्या सामने आया

रेलवे द्वारा किए गए विस्तृत सर्वे में पाया गया कि:

  • परियोजना लागत लगभग 4000 करोड़ रुपये तक जा सकती थी
  • करीब 275–300 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण की जरूरत
  • भूमि मुआवजा ही लगभग 2000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता था
  • यातायात और यात्री घनत्व के आधार पर निवेश का औचित्य कमजोर पाया गया

इन कारणों से रेलवे ने इसे नॉन फिजिबल घोषित कर दिया।

रेलवे नेटवर्क विस्तार का बड़ा संदर्भ

यह मुद्दा केवल एक रेल लाइन का नहीं बल्कि मध्य भारत के रेलवे नेटवर्क विस्तार से भी जुड़ा हुआ है।

2015 में इटारसी जंक्शन में लगी आग के बाद रेलवे ने वैकल्पिक मार्गों पर गंभीरता से विचार शुरू किया था।

उसके बाद कई बड़े निर्णय लिए गए:

  • नैरोगेज से ब्रॉडगेज में बदलाव
  • नैनपुर, सिवनी, गोंदिया, छिंदवाड़ा मार्ग सुधार
  • नागपुर कनेक्टिविटी मजबूत करने की योजना

इसी रणनीति के तहत सिवनी-कटंगी रेल लाइन पर भी विचार शुरू हुआ था।

प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव

रेल परियोजनाएं हमेशा प्रशासन और राजनीति के बीच संतुलन का विषय रही हैं।

इस मामले में भी कुछ अहम राजनीतिक पहलू सामने आए हैं:

  • सांसद की सिफारिशों का रेलवे निर्णयों पर प्रभाव
  • क्षेत्रीय विकास बनाम आर्थिक व्यवहार्यता
  • भविष्य की परियोजनाओं में तकनीकी मूल्यांकन की अहमियत

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि शुरुआती 40 किमी परियोजना पर ही ध्यान दिया जाता तो आज यह रेल लाइन बन चुकी होती।

क्षेत्रीय विकास पर संभावित असर

रेल लाइन न बनने का असर कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है:

आर्थिक असर

  • औद्योगिक निवेश प्रभावित
  • लॉजिस्टिक लागत बढ़ेगी
  • छोटे व्यापारियों को नुकसान

सामाजिक असर

  • ग्रामीण क्षेत्रों की कनेक्टिविटी कमजोर
  • शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित

रोजगार असर

  • निर्माण आधारित रोजगार अवसर कम
  • भविष्य के उद्योग विकास की गति धीमी

वैकल्पिक संभावनाएं क्या हो सकती हैं

रेलवे सूत्रों के अनुसार कुछ वैकल्पिक विकल्प संभव हैं:

  • सिवनी से बालाघाट सीधा रेल मार्ग
  • कम दूरी और कम लागत विकल्प
  • औद्योगिक क्षेत्रों के पास स्टेशन विकास

भुरकलखापा क्षेत्र के पास स्टेशन बनाने का विचार भी चर्चा में रहा है।

जनता की प्रतिक्रिया

स्थानीय लोगों में इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

कुछ लोगों का मानना है कि:

  • पहले छोटी दूरी का प्रोजेक्ट पूरा करना चाहिए
  • चरणबद्ध विकास बेहतर विकल्प है

जबकि कुछ लोग इसे क्षेत्रीय उपेक्षा मान रहे हैं।

विशेषज्ञों की राय

रेलवे और इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • परियोजना चयन में आर्थिक व्यवहार्यता जरूरी
  • चरणबद्ध रेल नेटवर्क विस्तार ज्यादा प्रभावी
  • भूमि अधिग्रहण लागत आज सबसे बड़ी चुनौती

भविष्य की दिशा क्या हो सकती है

आने वाले समय में यदि राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर समन्वय बनता है तो:

  • नई सर्वे प्रक्रिया शुरू हो सकती है
  • छोटा लेकिन प्रभावी रेल प्रोजेक्ट संभव
  • सिवनी को बड़ा जंक्शन बनाने की संभावना

रेल कनेक्टिविटी का मुद्दा भविष्य की विकास योजनाओं का अहम हिस्सा बना रहेगा।

क्षेत्रीय रणनीतिक महत्व

सिवनी भौगोलिक रूप से मध्य भारत के महत्वपूर्ण हिस्से में स्थित है।

यदि यहां मजबूत रेल नेटवर्क विकसित होता है तो:

  • नागपुर, जबलपुर, भोपाल कनेक्टिविटी मजबूत
  • माल परिवहन आसान
  • पर्यटन विकास को बढ़ावा

🔹 8️⃣ निष्कर्ष

सिवनी-कटंगी रेल परियोजना का मामला यह दिखाता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में केवल राजनीतिक इच्छा नहीं बल्कि तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

रेलवे द्वारा 92 किलोमीटर परियोजना को नॉन फिजिबल बताना एक बड़ा फैसला जरूर है, लेकिन इससे भविष्य के लिए बेहतर और व्यवहारिक विकल्प तलाशने का रास्ता भी खुलता है।

यदि स्थानीय जनप्रतिनिधि, प्रशासन और रेलवे मिलकर चरणबद्ध रणनीति अपनाते हैं तो सिवनी क्षेत्र आने वाले वर्षों में रेलवे मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकता है।

बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सिवनी जिले के हिस्से में रेल परियोजनाएं बहुत ही मंथर गति से चल रही हैं। सिवनी से कटंगी के बीच महज 40 किलोमीटर लंबी रेल लाईन को बनाने में रेलवे दिलचस्पी ले पाता इसके पहले ही पूर्व सांसद डॉ. ढाल सिंह बिसेन के द्वारा सिवनी से बरघाट, धपारा, सकाटा (कुरई) होते हुए कटंगी तक रेल पटरी बिछाने की मांग कर दी, जो 40 के बजाए 92 किलोमीटर लंबा रास्ता था। इसमें जितनी राशि रेल लाईन बिछाने में खर्च होने की संभावना थी, उतनी ही राशि जमीन अधिग्रहण के मुआवजे के रूप में दिया जाना प्रस्तावित था। यही कारण है कि इसे नान फिजिबल करार दे दिया गया है।
उक्ताशय की बात रेलवे बोर्ड के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान कही। सूत्रों का कहना था कि रेलवे चूंकि केंद्र का मामला है इसलिए इस विषय पर सांसदों की राय और अनुशंसा बहुत मायने रखती है। 18 जून 2015 को इटारसी जंग्शन के रूट रिले इंटरलाकिंग कंट्रोल रूम में आग लग जाने से रेलवे यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ था। इस दौरान लगभग एक सप्ताह से अधिक समय तक दिल्ली, इलहाबाद, मुंबई, चेन्नई आदि की ओर जाने वाली रेलगाड़ियों का रूट डायवर्ट कर इन्हें चलाया जा रहा था। इस दौरान 150 से अधिक रेलगाड़ियां प्रभावित हुई थीं। इसके बाद से रेलवे के द्वारा भोपाल, इटारसी नागपुर के वैकल्पिक मार्ग को खोजा जा रहा था।
सूत्रों ने बताया कि इसके उपरांत भोपाल से बीना, सागर, दमोह के रास्ते जबलपुर और उसके उपरांत नैनपुर, सिवनी, कटंगी तिरोड़ी के रास्ते नागपुर के लिए वैकल्पिक रेल खण्ड पर चर्चा तेज हुई। यही कारण है कि जबलपुर से नैनपुर के बीच नेरोगेज को ब्राडगेज में तब्दील करने का प्रस्ताव आया, इसी के चलते नैनपुर से गोंदिया, नैनपुर से सिवनी, छिंदवाड़ा होकर नागपुर को भी ब्राडगेज में तब्दील किया गया। इसी बीच सिवनी से कटंगी के बीच भी सर्वे कराने का प्रस्ताव आया, वहीं दूसरी ओर कटंगी से तिरोड़ी को भी जोड़ने की बात सामने आई। सूत्रों की मानें तो इसके पहले की सिवनी से कटंगी के बीच 40 किलोमीटर की दूरी में रेल पटरियां बिछाने की कवायद की जाती, उसके पहले ही तत्कालीन सांसद डॉ. ढाल सिंह बिसेन के द्वारा सिवनी से बरघाट, सकाटा होकर कटंगी की मांग करते हुए एक पत्र लिखकर इस पर दबाव बनाना आरंभ कर दिया गया।
सूत्रों ने यह भी बताया कि अगर डॉ. बिसेन के द्वारा सिर्फ 40 किलोमीटर की दूरी के लिए दबाव बनाया जाता तो आज सिवनी से कटंगी सीधे जुड़ चुका होता, पर उनके पत्र आदि के कारण यह मामला उलझकर रह गया। इस मामले में वर्तमान सांसद भारती पारधी अगर प्रयास कर लें तो बात कुछ हद तक बन सकती है। तत्कालीन भाजपा सांसद ने 92 किलोमीटर लंबी दूरी की मांग कर दी थी, चूंकि सरकार भी भाजपा की थी, इसलिए उनका मान रखते हुए रेलवे ने इसके सर्वे की अनुमति दे दी, पर सभी जानते थे कि यह नान फिजिबल ही है।
रेलवे बोर्ड के एक अधिकारी ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान यह भी कहा कि 92 किलोमीटर के बजाए तो सिवनी से बालाघाट को सीधे जोड़कर महज 85 किलोमीटर लंबा रेलखण्ड तैयार किया जा सकता था। इसके लिए सिवनी में औद्योगिक क्षेत्र भुरकलखापा के पास जमीन भी देख ली गई थी, जहां पर नया रेलवे स्टेशन प्रस्तावित किया जाना था। वहीं, सिवनी से बरास्ता बरघाट, सकाटा, कटंगी के 92 किलोमीटर लंबे रेलखण्ड के लिए चार हजार करोड़ की भारी भरकम राशि का खर्च उठाने से रेलवे ने असमर्थता जता दी, जिसमें लगभग पौने तीन सौ हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण भी किया जाना था, जिसके लिए दो हजार करोड़ रूपए से ज्यादा की राशि बतौर मुआवजा बांटना प्रस्तावित था।
रेलवे बोर्ड के उक्त अधिकारी ने आगे कहा कि सिवनी को केंद्र की सौगातें दिलाने वाली अंतिम सांसद सुश्री विमला वर्मा ही रहीं हैं, उनके उपरांत जितने भी सांसद सिवनी का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं, उस दौरान जो भी केंद्रीय इमदाद सिवनी को मिली है वह नीतिगत मामलों के चलते ही मिला है। सिवनी की वर्तमान सांसद भारती पारधी अगर सिवनी से कटंगी तक सीधी बिना घुमावदार पटरियों को बिछाने की हिमायत अगर करती हैं तो आने वाले समय में भारतीय रेल के मानचित्र पर सिवनी बहुत बड़ा स्टेशन बनकर उभर सकता है, पर इसके लिए प्रयास पूरी ईमानदारी किए जाने की आवश्यकता है।
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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)