छात्रों के सर्वांगीण विकास में शिक्षक की भूमिका

“जब तक शिक्षक खुद को समाज सुधारक की भूमिका में नहीं देखेंगे, तब तक राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य पर सवाल उठते रहेंगे।” भारतीय परंपरा में शिक्षक को माता-पिता के समान दर्जा दिया गया है। वह केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और समाज सुधारक भी होता है। छात्रों का बौद्धिक, नैतिक और चारित्रिक विकास काफी हद तक शिक्षक की सोच और कार्यप्रणाली पर निर्भर करता है।

(राष्ट्रीय शिक्षक दिवस विशेष5 सितम्बर 2025)

(डॉ. प्रितम भि. गेडाम)

भारतीय संस्कृति में शिक्षक को माता-पिता के समान सम्मान दिया गया है। अभिभावकों के बाद,बच्चों के सर्वांगीण विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षक की ही होती है। कहा जाता है कि आने वाली पीढ़ी का निर्माण या विनाश काफी हद तक शिक्षक पर निर्भर करता है,क्योंकि वह अपने ज्ञान और अनुभव से छात्रों की बौद्धिक क्षमताओं को पहचानकर उन्हें निखारता है। यदि शिक्षक अपने पद की गरिमा और जिम्मेदारी को भूल जाए,तो समाज को इसका खामियाजा लंबे समय तक भुगतना पड़ता है।

एक आदर्श शिक्षक में विषय ज्ञान,संचार कौशल,शिक्षण के प्रति समर्पण,सकारात्मक दृष्टिकोण,रचनात्मकता,शोध प्रवृत्ति,धैर्य,चरित्रबल,कर्मठता,सहनशीलता,मृदुभाषिता,समय की समझ,निष्पक्ष दृष्टिकोण और छात्रों की प्रतिभा को पहचानने जैसी विशेषताएँ होती हैं। यही गुण उसे छात्रों के लिए मार्गदर्शक,प्रेरणास्रोत और सच्चा मित्र बनाते हैं। वह न केवल शिक्षा देता है,बल्कि उनके नैतिक और चारित्रिक विकास में भी योगदान करता है,ताकि वे बेहतर जीवन और सजग नागरिक बन सकें।

शिक्षा का बदलता स्वरूप

एक समय था जब शिक्षा को समाजसेवा माना जाता था। समाज सुधारक कठिन परिस्थितियों में भी ज्ञान की ज्योति जलाकर नई क्रांति लाते थे। लेकिन आज के बाज़ारवादी दौर में शिक्षा को एक व्यवसाय के रूप में देखा जाने लगा है। बड़े सरकारी अधिकारी,नेता और यहाँ तक कि सरकारी शिक्षक भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं,क्योंकि उन्हें सरकारी शिक्षा प्रणाली पर भरोसा नहीं है।

वहीं,सरकारी शिक्षण संस्थानों में भ्रष्टाचार के मामले भी सामने आते रहते हैं। महाराष्ट्र में हाल ही में “शालार्थ आईडी” घोटाला सुर्खियों में रहा,जिसमें कई सरकारी अनुदानित स्कूलों ने फर्जी आँकड़े दिखाकर करोड़ों रुपये का गबन किया। इसी तरह,कॉलेजों में शिक्षक भर्ती में भी घोर अनियमितताएं और भ्रष्टाचार देखने को मिलते हैं,जिससे योग्य और ईमानदार उम्मीदवारों का सपना टूट जाता है।

निजी संस्थानों की चुनौतियाँ

देश के कुछ प्रतिष्ठित निजी संस्थान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे रहे हैं,लेकिन अधिकांश निजी स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षक बेहद कम वेतन पर काम करते हैंकभी-कभी तो दिहाड़ी मजदूर से भी कम। कई जगह शिक्षकों से अतिरिक्त कार्य करवाया जाता है,महीनों वेतन रोका जाता है,पदोन्नति रोकी जाती है और मानसिक उत्पीड़न तक किया जाता है। महंगाई के इस दौर में ढाई-तीन हज़ार रुपये मासिक वेतन पर काम करना शिक्षकों की विवशता को दर्शाता है।

छात्रों का बदलता व्यवहार

आज छात्रों का रवैया भी पहले जैसा नहीं रहा। पहले शिक्षक की डाँट या सज़ा को अभिभावक सहज रूप से स्वीकार करते थे,लेकिन अब मामूली अनुशासनात्मक कार्रवाई को भी अपराध माना जाता है। हाल ही में पंजाब और हरियाणा में छात्रों द्वारा शिक्षकों पर हमला करने की घटनाएँ सामने आईं। नाबालिग अपराधों में भी तेजी से वृद्धि हो रही है,जिसमें महाराष्ट्र,मध्य प्रदेश,राजस्थान और तमिलनाडु अग्रणी हैं।

समाधान की राह

लोग कहते हैं कि सरकारी स्कूलों की हालत खराब है,जबकि वहाँ शिक्षकों का वेतन अच्छा है। दूसरी ओर,निजी संस्थानों में शिक्षकों का वेतन बेहद कम है। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता कैसे बढ़ेगी?क्या आर्थिक असमानता के बीच शिक्षक पूरी लगन से छात्रों का भविष्य सँवार पाएँगे,जबकि उनका खुद का वर्तमान असुरक्षित है?

देश में केन्द्रीय विद्यालय,आईआईटी,आईआईएम,एम्स जैसे संस्थानों का विस्तार हर गाँव और शहर तक होना चाहिए,ताकि हर बच्चे को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।

बिहार के प्रसिद्ध शिक्षक खान सर का कहना है कि सरकारी शिक्षा प्रणाली की कमजोरियों के कारण निजी कोचिंग संस्थान छात्रों से भरे रहते हैं। डिग्री मिलने के बावजूद,छात्रों का सर्वांगीण विकास अधूरा रह जाता है। जब तक शिक्षक समाज सुधारक की भूमिका में अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे,तब तक देश के उज्ज्वल भविष्य पर सवाल उठते रहेंगे।

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(साई फीचर्स)