कभी-कभी किसी दुकान, मकान या गली के बाहर ऐसे बोर्ड लगे मिल जाते हैं जिनसे लगता है कि अंदर कोई बड़ा ही खतरनाक जानवर होगा। लेकिन जब असलियत सामने आती है तो पूरा मामला कॉमेडी बन जाता है। आज की यह कहानी भी बिल्कुल ऐसी ही है—हल्की-फुल्की हंसी, मजेदार ट्विस्ट और दुकानदार की मासूमियत से भरी।
एक बस्ती की पुरानी दुकान के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
“कुत्ता है,सावधान रहें।”
बीच सड़क पर यह बोर्ड देखकर किसी का भी दिल धक से बैठ सकता है। एक शख्स भी डरते-डरते दुकान के भीतर गया — कहीं कुत्ता अचानक से उड़कर न आ जाए! लेकिन जैसे ही वह अंदर पहुंचा, उसने देखा कि दुकान के कोने में एक मरियल-सा बूढ़ा कुत्ता सो रहा है।
वह कुत्ता इतना शांत था कि उसकी सांसों की आवाज भी मुश्किल से आती थी। जब उसने ग्राहक को देखा, तो बस हल्की-सी आंख खोली… एक अंगड़ाई ली… और फिर शांति से दोबारा सो गया — जैसे कोई रिटायर कुत्ता हो जो अब ‘ड्यूटी’ पर नहीं रहता।
ग्राहक को हँसी भी आई और हैरानी भी। उसने दुकानदार से पूछा:
“आपने इस कुत्ते के लिए बोर्ड लगा रखा है?यह तो किसी को क्या काटेगा,शायद भौंक भी न पाए!”
दुकानदार मुस्कुराते हुए बोला:
“जी हां साहब,यह अब बूढ़ा है। इससे चला भी नहीं जाता। बोर्ड इसलिए है कि कोई इसका पैर पर ना रख दे…बेचारा कुचला न जाए!”
बस… इतना सुनते ही ग्राहक की हँसी छूट गई।
जहां लोग सोचते हैं बोर्ड डराने के लिए है, वहां दुकान वाला इसे अपने ‘वयोवृद्ध कुत्ते’ की सुरक्षा के लिए लगाए बैठा था। यही तो असली पंचलाइन है—डरने का नहीं, बल्कि सावधानी और ममता का संदेश!
Conclusion (निष्कर्ष)
यह मजेदार कहानी दिखाती है कि हर चेतावनी डराने के लिए नहीं होती; कुछ प्यार और सुरक्षा के लिए भी होती हैं। बूढ़े कुत्ते को देखकर डरने वाला ग्राहक जब सच्चाई जानता है, तो पूरा हाल हँसी से भर जाता है। छोटे-छोटे किस्सों में छुपी ऐसी मासूमियत ही जीवन को हल्का और मजेदार बना देती है।
(साई फीचर्स)

मूलतः प्रयागराज निवासी, पिछले लगभग 25 वर्षों से अधिक समय से नई दिल्ली में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय विनीत खरे किसी पहचान को मोहताज नहीं हैं.
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