लिमटी की लालटेन 756
लोकसभा में परंपरा पर सवाल: पीएम के जवाब बिना धन्यवाद प्रस्ताव पास, संसद की गरिमा और राजनीति पर बड़ा प्रभाव
देश की सबसे बड़ी पंचायत की गरिमा को कैसे रखा जाएगा बरकरार . . .
शर्मनाक, जून 2004 के बाद फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री बहस में विपक्ष के आरोपों का जवाब नहीं दे पाए . . .
(लिमटी खरे)
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🔹 संसद में अभूतपूर्व घटनाक्रम और उसका राजनीतिक अर्थ
फरवरी 2026 का बजट सत्र भारतीय संसदीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित होना सामान्य संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा होता है, लेकिन इस बार यह प्रस्ताव लोकसभा में प्रधानमंत्री के पारंपरिक जवाब के बिना पारित हुआ।
यह घटनाक्रम केवल प्रक्रियात्मक मामला नहीं बल्कि राजनीतिक और संस्थागत दृष्टि से भी गंभीर माना जा रहा है। संसद लोकतंत्र का केंद्र होती है और यहां की परंपराएं केवल औपचारिक नहीं बल्कि संवैधानिक संस्कृति का हिस्सा होती हैं।
पृष्ठभूमि: धन्यवाद प्रस्ताव और उसकी संसदीय अहमियत
भारत की संसदीय परंपरा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
आमतौर पर प्रक्रिया इस प्रकार होती है:
- राष्ट्रपति संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हैं
- दोनों सदनों में धन्यवाद प्रस्ताव लाया जाता है
- विपक्ष संशोधन प्रस्ताव देता है
- अंत में प्रधानमंत्री जवाब देते हैं
प्रधानमंत्री का जवाब सरकार का आधिकारिक राजनीतिक और नीतिगत दृष्टिकोण माना जाता है। यह सरकार के लिए विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का सबसे बड़ा मंच होता है।
फरवरी 2026: क्या हुआ सदन में
फरवरी 2026 में लोकसभा ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री के जवाब के बिना पारित कर दिया। यह घटना विपक्ष के विरोध और सदन में हंगामे के बीच हुई।
रिपोर्ट्स के अनुसार:
- सदन में लगातार विरोध और नारेबाजी चल रही थी
- विपक्ष संशोधनों पर मतदान हुआ
- वॉयस वोट से प्रस्ताव पास किया गया
- प्रधानमंत्री ने लोकसभा में जवाब नहीं दिया
यह घटना 2004 के बाद पहली बार हुई जब धन्यवाद प्रस्ताव बिना प्रधानमंत्री के जवाब के पारित हुआ।
2004 की मिसाल: इतिहास में दूसरा मौका
2004 में भी इसी तरह की स्थिति बनी थी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हंगामे के कारण सदन में जवाब नहीं दे पाए थे।
इससे यह स्पष्ट होता है कि ऐसी घटनाएं बेहद दुर्लभ हैं और सामान्य संसदीय व्यवहार का हिस्सा नहीं मानी जातीं।
राजनीतिक असर: सत्ता और विपक्ष की रणनीति
सत्ता पक्ष के लिए
- प्रक्रिया के जरिए कामकाज जारी रखने का संदेश
- सदन ठप न होने देने की रणनीति
- राजनीतिक स्थिरता का प्रदर्शन
विपक्ष के लिए
- सरकार पर जवाबदेही से बचने का आरोप
- संसदीय परंपरा कमजोर होने का मुद्दा
- राजनीतिक एकजुटता का अवसर
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका और विवाद
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका निष्पक्षता और संतुलन की होती है। संविधान निर्माताओं ने अध्यक्ष पद को दलगत राजनीति से ऊपर रखा था।
लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने विपक्ष को यह आरोप लगाने का मौका दिया कि सदन संचालन में पक्षपात हुआ। कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे संसदीय प्रक्रिया में गड़बड़ी तक बताया।
लोकतंत्र और संस्थागत गरिमा पर प्रभाव
यह घटनाक्रम कई बड़े सवाल खड़े करता है:
- क्या संसदीय परंपराएं कमजोर हो रही हैं?
- क्या राजनीतिक टकराव संवाद को खत्म कर रहा है?
- क्या संसद में संवाद की जगह टकराव ले रहा है?
संसदीय लोकतंत्र में संवाद सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है।
सामाजिक और जनमानस पर असर
संसद में टकराव का असर सीधे जनता की धारणा पर पड़ता है।
जनता के बीच मुख्य चिंताएं:
- लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती
- राजनीतिक जवाबदेही
- संसद की गरिमा
विशेषज्ञों की राय (सामान्य विश्लेषण)
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार:
- यह राजनीतिक ध्रुवीकरण का संकेत है
- विपक्ष की आक्रामक रणनीति दिखती है
- सरकार की प्रक्रियात्मक रणनीति सामने आई
डेटा और संसदीय तथ्य
- भारत में धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री का जवाब परंपरा का हिस्सा रहा है
- 2004 और 2026 दो दुर्लभ उदाहरण
- आमतौर पर यह सरकार का सबसे महत्वपूर्ण संसदीय भाषण होता है
भविष्य की राजनीति पर असर
आने वाले समय में संभावित प्रभाव:
- संसद में टकराव की राजनीति बढ़ सकती है
- विपक्ष अधिक आक्रामक रणनीति अपना सकता है
- संसदीय सुधारों की मांग बढ़ सकती है
लोकतंत्र का मूल सवाल: संवाद या टकराव
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों जरूरी हैं।
दोनों के बीच संवाद लोकतंत्र की आत्मा होता है।
यदि संवाद खत्म होता है तो संस्थागत संकट बढ़ सकता है।
🔹 CONCLUSION / निष्कर्ष
फरवरी 2026 का यह संसदीय घटनाक्रम केवल एक प्रक्रिया का मुद्दा नहीं बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं, राजनीतिक संवाद और संस्थागत संतुलन का प्रश्न बन गया है।
इतिहास बताता है कि मजबूत लोकतंत्र वही होते हैं जहां सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर संसदीय मर्यादाओं को बनाए रखते हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद संवाद की ओर लौटती है या टकराव की राजनीति और मजबूत होती है।
लोकतंत्र की मजबूती संसद की मजबूती से ही तय होती है — और संसद की मजबूती संवाद, परंपरा और जवाबदेही से।
इन दिनों देश की सबसे बड़ी पंचायत में लोकसभा अध्यक्ष पर विपक्ष जमकर हमलावर नजर आ रहा है। विपक्ष के तेवर इतने तल्ख हैं कि भारत के संसदीय इतिहास में यह दर्ज हो गया है। इस तरह तो नई परंपरा का आगाज हो जाएगा। सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात तो यह है कि सदन के नेता को लोकसभा अध्यक्ष यह कहे कि आपको भाषण नहीं देना है, और कथित तौर पर भयाक्रांत प्रधानमंत्री के द्वारा राष्ट्रपति के अभिभाषण का धन्यवाद भी न किया जाए।
आपको बता दें कि जब कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार थी तब 19 जून 2004 को राष्ट्रपति के अभिाभाषण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को जवाब देना था, पर विपक्ष में बैठी भाजपा के द्वारा डॉ. मनमोहन सिंह मंत्रीमण्डल में लालू प्रसाद यादव शिबू सोरेन, मोहम्मद तस्लीमुद्दीन व एम.ए.ए. फातमी जिन पर आपराधिक मामले दर्ज थे जैसे दागी मंत्रियों के त्यागपत्र मांगे जा रहे थे। इस दौरान हुए हंगामे के बीच प्रधानमंत्री अपना भाषण नहीं दे पाए थे।
जो भी परिस्थितियां सदन में पिछले दिनों बनीं है, उसे देखकर तो हर कोई यही कह रहा है कि देश के प्रधानमंत्री तब गरजे जब विपक्ष की कुर्सियां खाली थीं, पर जब विपक्ष हमलावर हुआ तो वे मौन हो गए। ऐसे में उनका 56 इंच वाला जुमला, खुद को स्वयंभू विश्वगुरू, देश को वैश्विक ताकत बताना, चीन के सुप्रीमो शी जिपनिंग और दुनिया के चौधरी अमेरिका के सामने सीना तानकर खड़े होने के दावे बेमानी ही प्रतीत हो रहे हैं।
04 फरवरी को शाम 05 बजे प्रधानमंत्री को लोकसभा में भाषण देना था, पर लोकसभा अध्यक्ष को आशंका हुई या सूचना मिली की विपक्ष उनके साथ कुछ गलत कर सकता है, कुछ अप्रत्याशित हो सकता है, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री को भाषण देने से रोक दिया वे सदन में नहीं आए और उनकी अनुपस्थिति में ही लोकसभा में महामहिम के अभिभाषण का धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर दिया गया। देश के प्रधानमंत्री पर सरकार हर साल पांच सौ करोड़ से ज्यादा अर्थात 40 करोड़ रूपए प्रतिमाह से ज्यादा खर्च करती है। कितना हास्यास्पद है कि वही प्रधानमंत्री अपने आप को संसद में असुरक्षित महसूस करता है।
सवाल यही है कि देश के चुने हुए प्रतिनिधियों को किससे डर है! आखिर भारी भरकम सुरक्षा घेरा उन्हें क्यों दिया गया है। आखिर क्या वजह है कि सांसदों और विधायकों को अंगरक्षक दिए गए हैं। क्या सदन में मार्शल्स की तैनाती भी शोभा की सुपारी के मानिंद है! जब देश की सबसे बड़ी पंचायत में प्रधानमंत्री ही सुरक्षित नहीं है तो आम जनता का क्या हो रहा होगा, यह सोचकर ही रीढ़ ी की हड्डी में पसीना आ जाता है।
यह एक ऐसा मामला था, जिसने विपक्ष को एकजुट होने के मार्ग प्रशस्त कर दिए। विपक्ष एकजुट हुआ और उसने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का आधिकारिक नोटिस दे दिया, जिसमें 118 सांसदों के दस्तखत हैं। स्पीकर ने इसे जांच प्रक्रिया के लिए भेजते हुए प्रक्रिया तेज करने के निर्देश भी दिए हैं।
वैसे देश का हर नागरिक दबी जुबान से यह बात कहता नजर आ रहा है कि सरकार लंबे समय से मनमानी पर उतारू दिख रही है। वहीं, कमजोर विपक्ष के कारण सरकार के हौसले बुलंदी पर रहे हैं। देश में अफसरशाही, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई आदि चरम पर है, पर विपक्ष इन मामालों में सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं कर पा रहा है। पहली बार ऐसा हुआ है कि कांग्रेस के ठोस विरोध के चलते विपक्ष एकजुट नजर आ रहा है।
सरकार के कथित अड़ियल रवैए के चलते ही संसद में गतिरोध की स्थिति बनी नजर आ रही है। दरअसल, देश की शासन व्यवस्था संसद के जरिए ही संचालित होती है। देश की आजादी के उपरांत लोकतंत्र की मजबूती के लिए लोकसभा अध्यक्ष का पद सर्वोच्च और निष्पक्ष बनाया गया था। संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि अध्यक्ष, सत्ता पक्ष से ऊपर उठकर, सदन के प्रत्येक सदस्य के अधिकारों और उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का रक्षक बने। यही कारण है कि अध्यक्ष का चुनाव सर्वसम्मति से कराने की परंपरा रही है, ताकि वह बिना किसी भेदभाव के कार्य कर सकें।
किंतु, वर्तमान परिदृश्य चिंताजनक है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को नियमों का हवाला देकर अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा बोलने से रोकने पर विपक्ष आक्रोशित है। इसी कारण विपक्ष ने अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का निर्णय लिया है। यह घटना दर्शाती है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद पूरी तरह टूट चुका है।
इतिहास पर अगर नजर डाली जाए तो 1952 में चुनी गई पहली लोकसभा में भी अध्यक्ष श्री मावलंकर के खिलाफ 1953 में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, जबकि उस समय कांग्रेस का भारी बहुमत था। नियम यह है कि जब अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आता है, तो वे पीठासीन नहीं रह सकते और चर्चा के दौरान सामान्य सदस्य की तरह बैठते हैं। उस समय सदन का संचालन उपाध्यक्ष करते हैं, लेकिन वर्तमान लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद रिक्त है। ऐसे में अध्यक्ष द्वारा नामित पैनल का कोई वरिष्ठ सदस्य ही सदन का संचालन करेगा।
यद्यपि, मौजूदा लोकसभा में एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत है और सहयोगी दल सरकार के साथ हैं, इसलिए यह प्रस्ताव गिरना तय भी माना जा रहा है। लेकिन इससे अध्यक्ष पद की गरिमा को जो ठेस पहुंचेगी, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके अलावा, महिला सांसदों ने भी अध्यक्ष श्री बिरला को पत्र लिखकर नाराजगी जताई है कि उनके बयानों से सांसदों की छवि धूमिल हुई है।
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। राज्यसभा में भी सभापति और उपसभापति के खिलाफ ऐसे प्रस्तावों की बात पहले उठ चुकी है। अंततः, लोकतंत्र के हित में यही आवश्यक है कि पुरानी स्वस्थ परंपराओं का पालन हो और संसद में विपक्ष की आवाज को अनसुना न किया जाए।
सवाल आज भी जस का तस ही खड़ा हुआ है कि आखिर जनरल नरवणे की उस किताब जिसका जिकर राहुल गांधी ने किया था में ऐसे कौन से वाक्ये हैं जिनके उजागर होने पर सरकार अपने आप को असहज महसूस कर रही है। आखिर 21 महीने से इसके प्रकाशन को रोके क्यों रखा गया है। देश की संसद में जो भी होता है वह देश के नागरिकों के लिए ही होता है, तब इस पुस्तक के प्रकाशन को हरी झंडी देने पर आखिर ऐसी कौन सी आफत आन खड़ी होगी! आखिर जनरल नवरणे की पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टनी का प्रिंट संस्करण राहुल गांधी के हाथों में कैसे आया! मीडिया, सोशल मीडिया पर उस किताब के अंश कैसे वायरल हो रहे हैं! इस पूरे विवाद के बाद भी एक सप्ताह से ज्यादा समय हो चुका पर सरकार ने न तो वायरल अंशों का खण्डन किया है, न ही अपना पक्ष ही उन अंशों के संबंध में रखा है, सरकार अड़ी है तो बस इस बात पर कि इस पुस्तक का प्रकाशन ही नहीं हुआ है! मुद्दा यह नहीं है कि किताब प्रकाशित हुई है अथवा नहीं, मुद्दा तो यह है कि वे अंश सही हैं अथवा गलत! प्रश्न तो बहुत सारे हैं देशवासियों के दिलो दिमाग में, जिनका उत्तर वे चाहते हैं पर . . .
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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

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