सिकुड़ चुकीं हैं टीकमगढ़ में सड़क रूपी दिल तक पहुंचने वाली धमनियां, बड़ी कार्रवाई की है दरकार . . . .

टीकमगढ़ शहर में अतिक्रमण के खिलाफ प्रशासन की हालिया कार्रवाई ने ‘अंधा बांटे रेवड़ी, चीन्ह-चीन्ह कर देय’ की कहावत को चरितार्थ कर दिया है। शहर की मुख्य सड़कें और धमनियां अवैध निर्माण के कारण दम तोड़ रही हैं, जिससे आम जनता का पैदल चलना भी दूभर हो गया है। चुनिंदा जगहों पर की गई दिखावे की कार्रवाई ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जबकि शहर को अब एक निष्पक्ष और व्यापक स्तर के ‘महा-अभियान’ की दरकार है।

अंधा बांटे रेवड़ी,चीन्ह चीन्ह कर देय की तर्ज पर चुनिंदा जगहों पर हटा टीकमगढ़ में अतिक्रमण …

अंधा बांटे रेवड़ी,चीन्ह-चीन्ह कर देय: टीकमगढ़ में अतिक्रमण हटाओ मुहिम पर उठे सवाल,क्या रसूखदारों के आगे नतमस्तक है प्रशासन?

(हर्ष वर्धन वर्मा)


टीकमगढ़ (साई)। बुंदेलखंड के हृदय स्थल कहे जाने वाले टीकमगढ़ शहर की सूरत इन दिनों अतिक्रमण की कालिख से बदरंग हो चुकी है। शहर की यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और सड़कें, जो किसी भी शहर के विकास की धमनियां मानी जाती हैं, वे अब संकुचित होकर अपनी अंतिम सांसें ले रही हैं। हाल ही में जिला प्रशासन और नगर पालिका द्वारा अतिक्रमण के विरुद्ध छेड़ी गई मुहिम ने राहत देने के बजाय विवादों को अधिक जन्म दिया है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि प्रशासन ने ‘पिक एंड चूज’ (चुनिंदा) की नीति अपनाते हुए केवल उन गरीबों और छोटे दुकानदारों पर डंडा चलाया है जिनके पीछे कोई राजनीतिक हाथ नहीं है, जबकि रसूखदारों के अवैध निर्माणों की ओर आंखें मूंद ली गईं।

सड़कों का दम घोंटता अतिक्रमण: ‘धमनियों’ में जमा कोलेस्ट्रॉल

किसी भी विकसित शहर के लिए उसकी सड़कें ‘दिल’ तक पहुंचने वाली धमनियों के समान होती हैं। टीकमगढ़ के मुख्य बाजार, अस्पताल रोड, गांधी चौराहा और नजरबाग क्षेत्र की सड़कों की हालत यह है कि यहाँ से गुजरते समय ऐसा महसूस होता है मानो शहर के विकास को ‘हार्ट अटैक’ आ गया हो। सड़कों के दोनों किनारों पर पक्के निर्माण, ऊंचे चबूतरे और दुकानों के बाहर फैले सामान ने 40 फीट की सड़क को महज 10 से 15 फीट में तब्दील कर दिया है।

अतिक्रमण के इस ‘कोलेस्ट्रॉल’ ने शहर की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। स्थिति यह है कि एम्बुलेंस जैसी आपातकालीन सेवाओं को भी भीड़भाड़ वाले इलाकों से निकलने में घंटों की मशक्कत करनी पड़ती है। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते इन अवैध निर्माणों पर कठोर प्रहार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में टीकमगढ़ की पहचान सिर्फ ‘जाम के शहर’ के रूप में रह जाएगी।

प्रशासन की कार्रवाई: दिखावा या कर्तव्य?

पिछले कुछ दिनों में नगर पालिका की टीम ने शहर के कुछ हिस्सों में बुलडोजर चलाया। दुकानों के बाहर लगे शेड हटाए गए और कुछ हाथ ठेला वालों को खदेड़ा गया। लेकिन, जैसे ही यह टीम रसूखदारों और रसूख रखने वाले व्यापारियों के अवैध कब्जों के पास पहुंची, कार्रवाई की गति धीमी पड़ गई।

शहर के प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि “अंधा बांटे रेवड़ी, चीन्ह-चीन्ह कर देय” वाली स्थिति बनी हुई है। प्रशासन ने कुछ गलियों में तो सख्ती दिखाई, लेकिन मुख्य मार्ग पर स्थित उन विशाल शोरूम्स और होटलों की ओर रुख भी नहीं किया जिन्होंने फुटपाथ के साथ-साथ आधी सड़क पर अपना कब्जा जमा रखा है। यह भेदभावपूर्ण रवैया न केवल कानून की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, बल्कि जनता के मन में प्रशासन के प्रति अविश्वास की भावना भी भरता है।

आंकड़े और वास्तविकता का विश्लेषण

एक अनुमान के मुताबिक, टीकमगढ़ नगर पालिका सीमा के भीतर पिछले पांच वर्षों में अवैध अतिक्रमण में 30% से अधिक की वृद्धि हुई है। शहर की मास्टर प्लान के अनुसार सड़कों की जो चौड़ाई होनी चाहिए थी, वह वर्तमान में आधी भी नहीं बची है।

  • गांधी चौराहा क्षेत्र: यहाँ पार्किंग के अभाव और दुकानों के फैलाव के कारण प्रतिदिन औसतन 5 से 7 बार भारी जाम लगता है।
  • अस्पताल मार्ग: यहाँ सड़क किनारे बनी अवैध सीढ़ियों के कारण मरीजों को लेकर आ रहे वाहन फंसे रहते हैं।
  • सरकारी जमीन पर कब्जा: तालाबों के किनारे और सरकारी आरक्षित भूमि पर प्रभावशाली लोगों ने पक्के निर्माण कर लिए हैं, जिन्हें हटाने के नोटिस तो जारी हुए, लेकिन कार्रवाई फाइलों में दब गई।

आम जनता और मध्यम वर्ग की पीड़ा

अतिक्रमण का सबसे बुरा प्रभाव आम पैदल चलने वाले यात्रियों और मध्यम वर्ग के वाहन स्वामियों पर पड़ रहा है। पार्किंग की जगह न होने के कारण लोग सड़कों पर वाहन खड़े करने को मजबूर हैं, जिससे जाम की समस्या और विकराल हो जाती है। जब प्रशासन कार्रवाई के नाम पर केवल गरीबों के गुमटियां हटाता है, तो इससे समाज में असंतोष फैलता है।

स्थानीय निवासी राघवेंद्र सिंह (बदला हुआ नाम) कहते हैं, “अगर कार्रवाई करनी है, तो सबको एक नजर से देखें। गरीब की झोपड़ी और अमीर का पक्का निर्माण, दोनों अगर सड़क पर हैं तो दोनों पर बुलडोजर चलना चाहिए। केवल गरीबों को हटाकर शहर को अतिक्रमण मुक्त नहीं किया जा सकता।”

राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक लाचारी

अतिक्रमण के फलने-फूलने के पीछे राजनीतिक संरक्षण एक बड़ा कारण माना जाता है। चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए कई बार वोट बैंक की राजनीति अतिक्रमणकारियों को सुरक्षा कवच प्रदान करती है। जब भी कोई ईमानदार अधिकारी बड़ी कार्रवाई की योजना बनाता है, तो ‘ऊपर’ से आने वाले फोन कॉल उस अभियान की हवा निकाल देते हैं। यही कारण है कि टीकमगढ़ में अतिक्रमण हटाओ अभियान केवल ‘खानापूर्ति’ बनकर रह गया है।

विशेषज्ञों की राय और भविष्य की राह

नगर नियोजन विशेषज्ञों का मानना है कि टीकमगढ़ को बचाने के लिए अब केवल छोटे-मोटे अभियानों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए:

  1. डिजिटल मैपिंग: शहर की सड़कों की चौड़ाई की डिजिटल पैमाइश हो और रिकॉर्ड के आधार पर सीमांकन किया जाए।
  2. समान कार्रवाई: बिना किसी भेदभाव के सभी अवैध निर्माणों को ढहाया जाए।
  3. वेंडिंग जोन का निर्माण: हाथ ठेला और छोटे व्यापारियों के लिए व्यवस्थित वेंडिंग जोन बनाए जाएं ताकि वे सड़क पर न आएं।
  4. पार्किंग नीति: मुख्य बाजारों में मल्टीलेवल पार्किंग की व्यवस्था अनिवार्य है।

निष्कर्ष

टीकमगढ़ की सड़कें आज प्रशासन से अपनी खोई हुई चौड़ाई और गरिमा मांग रही हैं। “चीन्ह-चीन्ह कर” की जाने वाली कार्रवाई से न तो यातायात सुधरेगा और न ही शहर का सौंदर्यीकरण होगा। जिला प्रशासन को समझना होगा कि अतिक्रमण एक ऐसा नासूर है जिसे यदि जड़ से नहीं काटा गया, तो यह पूरे शहर के ढांचे को पंगु बना देगा। अब वक्त आ गया है कि रसूख की दीवारों को गिराकर कानून का इकबाल बुलंद किया जाए और टीकमगढ़ को एक व्यवस्थित, सुंदर और अतिक्रमण मुक्त शहर बनाने के लिए एक बड़े एवं निष्पक्ष ‘महा-ऑपरेशन’ की शुरुआत की जाए।