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एपस्टीन फाइल्स: एक वैश्विक सेक्स-ट्रैफिकिंग कांड के बहाने भारत में उभरती राजनीतिक और सूचना-अराजकता
एक वैश्विक सेक्स-ट्रैफिकिंग कांड के बहाने भारत में फैलती राजनीतिक और सूचना-अराजकता
(लिमटी खरे)
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वैश्विक सत्ता और नैतिकता के इतिहास में कुछ मामले ऐसे होते हैं जो समय, भूगोल और सीमाओं से परे जाकर सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करते हैं। जेफ्री एपस्टीन से जुड़ा सेक्स-ट्रैफिकिंग कांड और उससे संबंधित दस्तावेज़, जिन्हें सामूहिक रूप से “एपस्टीन फाइल्स” कहा जा रहा है, ऐसा ही एक मामला बन चुका है। अमेरिका में जन्मे इस आपराधिक प्रकरण के दस्तावेज़ जब सार्वजनिक हुए, तो इसका प्रभाव केवल न्यायिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति, मीडिया नैरेटिव और सोशल मीडिया चर्चाओं तक फैल गया। भारत में भी यह विषय तेजी से चर्चा का केंद्र बना, जहां तथ्यों के साथ-साथ अटकलें और अफवाहें भी समानांतर रूप से फैलती दिखीं।
जेफ्री एपस्टीन एक अमेरिकी फाइनेंसर था, जिस पर नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण, सेक्स-ट्रैफिकिंग और प्रभावशाली लोगों के लिए कथित रूप से नेटवर्क संचालित करने के गंभीर आरोप लगे। वर्ष 2019 में उसकी गिरफ्तारी हुई और उसी वर्ष जेल में उसकी मृत्यु हो गई, जिसे आधिकारिक रूप से आत्महत्या बताया गया। हालांकि इस मृत्यु को लेकर आज भी कई प्रश्न उठते हैं। एपस्टीन फाइल्स दरअसल एक या दो कागज़ों का समूह नहीं, बल्कि वर्षों में विभिन्न कानूनी मामलों से जुड़े दस्तावेज़, कोर्ट ट्रांसक्रिप्ट, गवाहियों के बयान, ई-मेल रिकॉर्ड और उड़ान लॉग्स का संग्रह हैं, जो समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
इन फाइल्स को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही है कि जिन नामों का उल्लेख हुआ, उन्हें अक्सर आरोप के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया। जबकि वास्तविकता यह है कि कई नाम केवल संदर्भ, संपर्क या किसी गवाही में उल्लेख के तौर पर सामने आए हैं, न कि किसी अपराध में दोष सिद्ध होने के रूप में। कानूनी दृष्टि से यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन सोशल मीडिया विमर्श में यह बारीकी अक्सर खो जाती है।
भारत के संदर्भ में, एपस्टीन फाइल्स ने एक अलग ही तरह की बहस को जन्म दिया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अनेक सूचियां, ग्राफिक्स और कथित “लीक” वायरल हुए, जिनमें भारतीय नेताओं, उद्योगपतियों और प्रभावशाली व्यक्तियों के नाम होने का दावा किया गया। तथ्यों की जांच करने पर यह स्पष्ट होता है कि अब तक किसी भी भारतीय नागरिक के खिलाफ एपस्टीन मामले में न तो कोई चार्जशीट दाखिल हुई है, न कोई आधिकारिक समन जारी हुआ है और न ही किसी भारतीय जांच एजेंसी को इस संबंध में कोई औपचारिक सूचना प्राप्त हुई है।
कुछ मामलों में यह जरूर सामने आया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय कुछ भारतीय मूल के वैज्ञानिकों या बुद्धिजीवियों ने एपस्टीन से जुड़े चैरिटेबल फाउंडेशन से शोध के लिए फंडिंग प्राप्त की थी। यह तथ्य अपने आप में किसी आपराधिक संलिप्तता को प्रमाणित नहीं करता, क्योंकि उस समय यह फंडिंग कई प्रतिष्ठित संस्थानों और व्यक्तियों को दी जा रही थी। इसी तरह, कुछ व्यापारिक संपर्क या सामाजिक आयोजनों में उपस्थिति को भी अपराध के समकक्ष मानकर प्रचारित किया गया, जो तथ्यात्मक रूप से भ्रामक है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम को लेकर भी सोशल मीडिया पर कई दावे किए गए। इनमें कुछ कथित ई-मेल या अंतरराष्ट्रीय दौरों को एपस्टीन फाइल्स से जोड़ने की कोशिश की गई। हालांकि उपलब्ध आधिकारिक और कानूनी दस्तावेज़ों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम किसी भी प्रमाणित एपस्टीन फाइल में आरोप या संदिग्ध के रूप में दर्ज नहीं है। जिन तारीखों या घटनाओं का उल्लेख किया गया, वे स्वतंत्र रूप से सार्वजनिक कूटनीतिक कार्यक्रमों से संबंधित हैं और उन्हें एपस्टीन नेटवर्क से जोड़ने का कोई ठोस कानूनी आधार सामने नहीं आया है।
यहां से यह स्पष्ट होता है कि एपस्टीन फाइल्स भारत में एक कानूनी मुद्दे से अधिक एक नैरेटिव बनकर उभरी हैं। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो इस तरह के अंतरराष्ट्रीय कांड अक्सर घरेलू राजनीति में हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं। भारत में भी यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ नैतिक प्रश्न खड़े करने के माध्यम के रूप में उपयोग कर सकता है, भले ही प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध न हों।
सूचना-अराजकता का यह दौर भारतीय राजनीति के लिए नया नहीं है। पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय या घरेलू मामलों में अधूरी सूचनाओं, लीक दस्तावेज़ों और भावनात्मक अपीलों के आधार पर राजनीतिक विमर्श को दिशा देने की कोशिशें होती रही हैं। एपस्टीन फाइल्स के मामले में भी यही देखने को मिला कि तथ्यों से पहले भावनाएं सक्रिय हुईं, स्पष्टीकरण से पहले आरोप वायरल हुए और संसद से अधिक बहस सोशल मीडिया मंचों पर होती दिखी।
प्रशासनिक और सामाजिक प्रभाव के स्तर पर इसका एक बड़ा खतरा यह है कि वास्तविक पीड़ितों की आवाज़ शोर में दब जाती है। एपस्टीन मामला मूल रूप से यौन शोषण और मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर अपराध है, लेकिन जब इसे केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का साधन बना दिया जाता है, तो न्याय और संवेदनशीलता दोनों प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में तथ्यों की पुष्टि, कानूनी प्रक्रिया का सम्मान और जिम्मेदार रिपोर्टिंग सबसे अधिक आवश्यक है।
सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी इस पूरे प्रकरण में दो हिस्सों में बंटी दिखाई देती है। एक वर्ग इसे सत्ता और वैश्विक अभिजात वर्ग की नैतिक विफलता के प्रतीक के रूप में देखता है, जबकि दूसरा वर्ग इसे राजनीतिक एजेंडा चलाने का माध्यम मानता है। आम नागरिक के लिए सच और झूठ में अंतर करना कठिन होता जा रहा है, क्योंकि सूचनाओं की गति सत्यापन की प्रक्रिया से कहीं तेज हो चुकी है।
भविष्य की संभावनाओं पर नजर डालें तो एपस्टीन फाइल्स से जुड़ी चर्चाएं अभी थमने वाली नहीं हैं। जैसे-जैसे नए दस्तावेज़ या पुराने रिकॉर्ड्स की व्याख्या सामने आती रहेगी, वैसे-वैसे नए नैरेटिव भी गढ़े जाते रहेंगे। भारत के संदर्भ में यह आवश्यक होगा कि सरकार, विपक्ष और मीडिया सभी इस विषय को कानूनी तथ्यों और जिम्मेदार संवाद के दायरे में रखें, ताकि लोकतांत्रिक विमर्श भ्रम और भय पर नहीं, बल्कि सत्य और विवेक पर आधारित रहे।
8️⃣ Conclusion / निष्कर्ष
एपस्टीन फाइल्स एक गंभीर वैश्विक आपराधिक कांड से जुड़े दस्तावेज़ों का संग्रह हैं, जिन्हें भारत में अक्सर तथ्य से अधिक नैरेटिव के रूप में देखा गया। अब तक किसी भी भारतीय व्यक्ति के खिलाफ प्रत्यक्ष कानूनी आरोप सामने नहीं आए हैं, फिर भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इसका प्रभाव महसूस किया जा रहा है। इस प्रकरण ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि सूचना के युग में जिम्मेदार पत्रकारिता, तथ्य-जांच और कानूनी समझ लोकतंत्र के लिए कितनी आवश्यक है।
एपस्टीन फाइल्स यह शब्द कुछ दिनों से चर्चा में है पर अब केवल एक आपराधिक जांच का दस्तावेज़ नहीं रहा,बल्कि वैश्विक राजनीति,मीडिया नैरेटिव और सोशल मीडिया अफवाहों का केंद्र बन चुका है। अमेरिका में सामने आए जेफ्री एपस्टीन सेक्स-ट्रैफिकिंग कांड से जुड़े दस्तावेज़ों के सार्वजनिक होने के बाद दुनिया के कई देशों में राजनीतिक और सामाजिक हलचल देखी गई। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।
हालांकि,इस पूरे विमर्श में तथ्य,अटकलें,अफवाहें और राजनीतिक आरोप इस कदर आपस में घुल-मिल गए हैं कि आम नागरिक के लिए सच और झूठ में फर्क कर पाना कठिन हो गया है। ऐसे में यह आवश्यक है कि एपस्टीन फाइल्स को भावनात्मक या राजनीतिक हथियार नहीं,बल्कि तथ्यों के चश्मे से देखा जाए।
वैश्विक सत्ता के गलियारों में जब भी जेफ्री एपस्टीन का नाम गूँजता है,तो वह केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं,बल्कि अनैतिकता,यौन शोषण और रसूखदारों के उस गठजोड़ का प्रतीक बन जाता है जो कानून से ऊपर होने का भ्रम पाले हुए थे। हाल के समय में एपस्टीन फाइल्स के सार्वजनिक होने से दुनिया भर में हड़कंप मचा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है,जहाँ सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चाओं का बाजार गर्म है।
एपस्टीन फाइल्स मूलतः एक अमेरिकी आपराधिक कांड से जुड़ा विषय है,लेकिन वैश्विक मीडिया,सोशल मीडिया और राजनीतिक विमर्श के दौर में यह केवल कानून या अपराध तक सीमित नहीं रहा। जैसे ही इससे जुड़े दस्तावेज़ों और नामों की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई,वैसे ही कई देशों की आंतरिक राजनीति में भी इसका प्रभाव महसूस किया जाने लगा। भारत में भी यह विषय तथ्यों से अधिक नैरेटिव के रूप में राजनीतिक बहस का हिस्सा बना।
सबसे पहले जानते हैं कि आखिर जेफ्री एपस्टीन कौन था और एपस्टीन फाइल्स क्या हैं?
जेफ्री एपस्टीन एक अमेरिकी फाइनेंसर था,जिस पर नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण,सेक्स-ट्रैफिकिंग और शक्तिशाली लोगों के लिए सेक्स रैकेट चलाने के गंभीर आरोप लगे। वर्ष2019 में उसकी गिरफ्तारी हुई और उसी वर्ष जेल में उसकी मौत हो गई,जिसे आधिकारिक तौर पर आत्महत्या बताया गया,हालांकि इस पर आज भी सवाल उठते हैं।
एपस्टीन फाइल्स असल में वर्जीनिया गिफ्रे (एक पीड़ित) द्वारा एपस्टीन की सहयोगी घिसलेन मैक्सवेल के खिलाफ दायर दीवानी मुकदमे से संबंधित अदालती दस्तावेज हैं। इन फाइलों में उन लोगों के नाम,ईमेल,उड़ान लाग और गवाहों के बयान शामिल हैं जो कभी न कभी एपस्टीन के निजी विमान या उसके द्वीप पर मौजूद रहे थे।
एपस्टीन फाइल्स कोई एक दस्तावेज़ नहीं,बल्कि कई कानूनी फाइलें,कोर्ट ट्रांसक्रिप्ट्स,गवाहों के बयान,फ्लाइट लाग्स और ई-मेल रिकार्ड्स का संग्रह हैं,जो वर्षों में अलग-अलग मामलों के तहत सामने आए।2024 में अमेरिका की एक अदालत के आदेश पर कुछ दस्तावेज़ सार्वजनिक किए गए,जिनमें कई वैश्विक हस्तियों के नाम संदर्भ के रूप में सामने आए हैं न कि आरोप सिद्ध होने के रूप में। और यहीं से भ्रम की शुरुआत होती है। यह एक गंभीर और संवेदनशील विषय है। एपस्टीन मामला वैश्विक राजनीति और नैतिकता के सबसे काले अध्यायों में से एक है।
अब जानते हैं कि एपस्टीन फाइल्स में अब तक भारत के किन लोगों के नाम आए हैं?तथ्यों पर अगर गौर करें तो अब तक सोशल मीडिा पर अनेक नेताओं के नाम इसमें सामने आए हैं,जिसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। वहीं,कुछ सोशल मीडिया पोस्ट और अप्रमाणित वेबसाइटों पर यह दावा किया गया कि भारत के उद्योगपति,नेता या नौकरशाहों एपस्टीन नेटवर्क से जुड़े थे,लेकिन,सच यह भी है कि कोई नाम आधिकारिक कोर्ट रिकार्ड में अभियुक्त के रूप में दर्ज नहीं है। कोई चार्जशीट,समन या जांच आदेश भारत से संबंधित नहीं है। जिन नामों का दावा किया गया,वे अधिकतर फर्जी सूची,एडिटेड ग्राफिक्स या क्लिकबेट कंटेंट निकले।
भारत के संदर्भ में,अब तक किसी बड़े सक्रिय राजनेता या सेलिब्रिटी का नाम सीधे तौर पर यौन अपराधों में संलिप्तता के लिए नहीं आया है। हालांकि,कुछ प्रमुख नाम चर्चा में रहे हैं जिनमें कुछ भारतीय मूल के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों के नाम सामने आए हैं,जिन्होंने एपस्टीन के चौरिटी फाउंडेशन से अपनी रिसर्च के लिए फंडिंग ली थी। कुछ ऐसे व्यापारियों के नाम पते की डायरी में मिले हैं जिनके अंतरराष्ट्रीय संबंध रहे हैं।
अब बात करते हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का नाम इसमें आने के बारे में। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम के साथ एक ईमेल का भी जिकर आ रहा है,जिसमें कहा जा रहा है कि अमेरिका के दबाव में प्रधानमंत्री इजराईल गए,और वहां नाचे। जिन तारीखों का वहां जिकर हो रहा है वे तथ्यात्मक प्रतीत होती हैं,पर एपस्टीन फाइल्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम किसी भी आधिकारिक,प्रमाणित या कानूनी दस्तावेज़ में नहीं है।
अब जानते हैं कि एपस्टीन फाइल्स से भारत के अंदर क्या राजनीतिक भूचाल आ सकता है?भारत में संभावित असर पर अगर चर्चा करें तो सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी अभियानों को इससे ईंधन मिलने की पूरी पूरी उम्मीद है। देश की सर्वोच्च पंचायत के अंदर और बाहर हंगामे के पूरे पूरे आसार बनते दिख रहे हैं।
वैसे भी राजनीति में जब आरोप प्रत्यारोप का दौर आता है तब तथ्यों को परे रखकर ही राजनैतिक युद्ध आरंभ हो जाते हैं। एपस्टीन फाइल्स ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया अब सूचना का माध्यम नहीं,बल्कि राजनीतिक युद्ध का मैदान बन चुका है। अप्रमाणित सूचनाओं,सूचियाँ,विदेशी ब्लाग्स के स्क्रीनशाट,अधूरे कोर्ट डाक्यूमेंट्स आदि का उपयोग कर राजनीतिक संदेश गढ़े गए। इसका तत्काल प्रभाव यह हुआ कि तथ्य से पहले भावनाएं सक्रिय हुईं,स्पष्टीकरण से पहले आरोप वायरल हुए,राजनीति संसद से ज्यादा सोशल मीडिया पर लड़ी गई
जिस तरह बोफोर्स मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम आने पर उन्हें परेशानी झेलनी पड़ी थी,उसी तर्ज पर अब विपक्ष इसे हथियार बना सकता है। फिलहाल विपक्ष की बोथरी तलवार,राहुल गांधी का एपस्टीन फाईल्स पर ज्यादा ध्यान न जाना,प्रियंका वढ़ेरा का इस पर मौन रहना,कांग्रेस की आईटी सेल पूरी तरह शांत रहना आदि इस तरह के अनेक संकेत इसी ओर इशारा करते दिख रहे हैं कि विपक्ष एक बार फिर सरकार के खिलाफ एक बहुत जबर्दस्त या यूं कहा जाए कि तुरूप का इक्का मिलने के बाद भी अपना मौन नहीं तोड़ रहा है . . .
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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

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