भारत-म्यांमार ने सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी में गहरा सहयोग करने का वादा किया

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति उ मिन औंग ह्लैंग के बीच द्विपक्षीय समझौते ने क्षेत्रीय रणनीति को नई दिशा दी

(मणिका सोनल)
नई दिल्ली (साई)। नई दिल्ली में भारत और म्यांमार के बीच एक ऐतिहासिक द्विपक्षीय बैठक आयोजित हुई, जिसमें दोनों देशों ने सुरक्षा, व्यापार और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करने का स्पष्ट संकल्प लिया। इस समझौते ने मौजूदा राजनीतिक संकट के बीच भी क्षेत्रीय स्थिरता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति उ मिन औंग ह्लैंग ने अपने-अपने देशों की संप्रभुता और विकास को प्राथमिकता देते हुए कई रणनीतिक परियोजनाओं को पुनर्जीवित किया। दोनों पक्षों ने कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने, सीमा प्रबंधन को सुदृढ़ करने और आर्थिक साझेदारी को विस्तारित करने के लिए विस्तृत कार्यसूची तैयार की। इस पहल ने न केवल भारत-नायप्याव संबंधों को पुनर्स्थापित किया, बल्कि व्यापक एशिया‑प्रशांत रणनीति में भी नई संभावनाएँ खोलीं।

1. घटना का मुख्य विवरण और तत्कालीन संकट

तात्कालिक घटनाक्रम: 16 जून को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के राष्ट्रपति उ मिन औंग ह्लैंग के बीच उच्च‑स्तरीय द्विपक्षीय बैठक आयोजित हुई, जिसमें दोनों देशों ने सुरक्षा, व्यापार और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करने का स्पष्ट इरादा व्यक्त किया। इस मुलाकात में संयुक्त बयान जारी किया गया, जिसमें म्यांमार ने भारत की सुरक्षा हितों के विरुद्ध अपने क्षेत्र का उपयोग न करने की प्रतिबद्धता दोहराई, जबकि भारत ने म्यांमार की संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता का समर्थन किया। दोनों पक्षों ने कनेक्टिविटी परियोजनाओं, सीमा प्रबंधन और आर्थिक सहयोग के विस्तृत एजेंडा पर चर्चा की, जिससे क्षेत्रीय रणनीति में नई दिशा स्पष्ट हुई। इस दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत दोवाल ने भी अपने‑अपने बिंदु रखे, जिससे भारत की इस संबंध में संपूर्ण प्रतिबद्धता का संकेत मिला। बैठक के बाद दोनों देशों ने भविष्य में नियमित उच्च‑स्तरीय संवाद स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखा।

मुख्य विवाद और वर्तमान स्थिति: म्यांमार में चल रहे सशस्त्र संघर्ष और सीमा पर सक्रिय विद्रोही समूहों की उपस्थिति ने दोनों देशों के बीच सुरक्षा चिंता को तीव्र किया, जिससे इस समझौते की महत्ता और भी बढ़ गई। भारत ने सीमा पर निगरानी को सुदृढ़ करने, सूचना साझाकरण को तेज करने और संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों की शुरुआत करने की योजना बताई। म्यांमार ने अपने सैन्य संचालन में भारत की सहायता को स्वीकार किया, परन्तु साथ ही अंतर्राष्ट्रीय दबाव और घरेलू विरोध को संतुलित करने की चुनौती भी उजागर की। आर्थिक रूप से, दोनों पक्षों ने मौजूदा व्यापार बाधाओं को दूर करने और रूपी‑क्याट द्विपक्षीय निपटान तंत्र को विस्तारित करने की प्रतिबद्धता दोहराई। इस प्रकार, तत्कालीन संकट के बीच भी दोनों देशों ने सहयोग के कई आयामों को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

2. मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और गहरा संदर्भ

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: भारत‑म्यांमार संबंधों की जड़ें प्राचीन व्यापार मार्गों और बौद्ध सांस्कृतिक आदान‑प्रदान में निहित हैं, परन्तु आधुनिक इतिहास में 1990 के दशक के बाद दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी को औपचारिक रूप दिया। 2015 में ‘अभियान एशिया’ के तहत कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के प्रयास शुरू हुए, जबकि 2018 में कैलाडन मल्टी‑मॉडल ट्रांज़िट प्रोजेक्ट को प्राथमिकता दी गई। हालिया वर्षों में म्यांमार की राजनीतिक अस्थिरता ने भारत को सीमा सुरक्षा को सुदृढ़ करने और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए दोहरावदार कदम उठाने पर मजबूर किया। इस संदर्भ में, ‘नबरह’ (Neighbourhood First) और ‘एक्ट ईस्ट’ नीतियों ने म्यांमर को भारत के पूर्वी द्वार के रूप में पुनः स्थापित करने की दिशा में काम किया। वर्तमान समझौता इन ऐतिहासिक प्रवृत्तियों का निरंतरता है, जिसमें नई सुरक्षा और आर्थिक ढांचों को जोड़ने का प्रयास स्पष्ट है।

छिपे हुए कारक और अंतर्निहित समस्याएं: म्यांमार में चल रहे सशस्त्र विद्रोह, विशेषकर उत्तर‑पूर्वी सीमा पर, भारत के लिए एक जटिल सुरक्षा चुनौती प्रस्तुत करता है, क्योंकि कई विद्रोही समूह इस क्षेत्र से गुजरते हैं। साथ ही, कैलाडन और त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसे बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में वित्तीय बाधाएँ, भूमि अधिग्रहण की जटिलताएँ और स्थानीय विरोध ने प्रगति को धीमा किया है। रूपी‑क्याट निपटान तंत्र की शुरुआत ने व्यापार में नई संभावनाएँ खोलीं, परन्तु नियामक अनिश्चितताएँ और मुद्रा अस्थिरता अभी भी जोखिम बनाकर खड़ी हैं। अंत में, म्यांमार की अंतर्राष्ट्रीय अलगाव नीति और मानवाधिकार संबंधी आलोचनाएँ भारत को कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए अतिरिक्त दबाव में डालती हैं। इन सभी कारकों को समझे बिना द्विपक्षीय सहयोग की गहराई को मापना अधूरा रहेगा।