(स्पेशल ब्यूरो)
भोपाल (साई)।मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के राजपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तीन सरकारी डॉक्टरों को निजी पैथोलॉजी लैब से कथित कमीशन लेते हुए लोकायुक्त द्वारा रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में हलचल मच गई है। इस कार्रवाई ने सरकारी अस्पतालों में मरीजों को निजी लैब भेजने के बदले कमीशन लेने की उस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसकी शिकायतें लंबे समय से अलग-अलग जिलों से सामने आती रही हैं।
अब इस मामले की आंच सिवनी जिले तक पहुंचती दिखाई दे रही है। जिला चिकित्सालय सिवनी सहित कई सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को लेकर भी लगातार ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि सरकारी जांच सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को निजी पैथोलॉजी और डायग्नोस्टिक सेंटरों में भेजा जाता है। हालांकि इन मामलों की अब तक कोई बड़ी आधिकारिक जांच सामने नहीं आई है, लेकिन बड़वानी की घटना के बाद सिवनी में भी स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
बड़वानी में लोकायुक्त ने कैसे किया खुलासा?
राजपुर CHC में पदस्थ तीन डॉक्टरों — डॉ. अमित शाक्य, डॉ. दिव्या सांई और डॉ. मनोहर गोदारा — पर आरोप है कि वे सरकारी अस्पताल आने वाले मरीजों को निजी “सेवा पैथोलॉजी लैब” भेजते थे और बदले में कमीशन लेते थे। शिकायत मिलने के बाद इंदौर लोकायुक्त पुलिस ने ट्रैप कार्रवाई की और कथित रूप से तीनों डॉक्टरों को रिश्वत लेते हुए पकड़ लिया।
लोकायुक्त के अनुसार:
- डॉ. अमित शाक्य — ₹8,000
- डॉ. दिव्या सांई — ₹5,000
- डॉ. मनोहर गोदारा — ₹12,000
कुल ₹25,000 की राशि कथित तौर पर कमीशन के रूप में ली जा रही थी। शिकायत लैब मैनेजर अदनान अली द्वारा की गई थी, जिन्होंने आरोप लगाया कि पहले कमीशन 20 प्रतिशत था, जिसे बाद में बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया गया।
इस कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि शिकायतकर्ता सामने आए और पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हों, तो स्वास्थ्य विभाग के भीतर चल रही कथित अनियमितताओं का पर्दाफाश संभव है।
सिवनी में भी उठ रहे हैं सवाल
सिवनी जिले में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लंबे समय से असंतोष की स्थिति बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों से जिला अस्पताल पहुंचने वाले कई मरीजों और उनके परिजनों का आरोप रहता है कि अस्पताल में मशीनें और जांच सुविधाएं मौजूद होने के बावजूद उन्हें निजी लैब में जांच कराने के लिए कहा जाता है।
कई मामलों में मरीजों का कहना होता है कि:
- सरकारी जांच रिपोर्ट आने में देरी बताई जाती है
- मशीन खराब होने की बात कही जाती है
- बाहर की विशेष लैब का नाम लिखकर दिया जाता है
- तत्काल जांच के नाम पर निजी सेंटर भेजा जाता है
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं तो यह प्रशासनिक जांच का विषय जरूर बनता है।
गरीब मरीजों पर सबसे ज्यादा असर
सरकारी अस्पतालों का सबसे बड़ा उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद लोगों को कम खर्च में इलाज उपलब्ध कराना होता है। लेकिन जब मरीजों को निजी लैब या डायग्नोस्टिक सेंटरों में भेजा जाता है, तो इसका सीधा आर्थिक बोझ आम जनता पर पड़ता है।
ग्रामीण इलाकों से आने वाले कई परिवार पहले ही आर्थिक संकट से जूझ रहे होते हैं। ऐसे में निजी जांचों पर हजारों रुपये खर्च करना उनके लिए बेहद कठिन हो जाता है। कई मरीज इलाज बीच में छोड़ देते हैं, जबकि कई लोग कर्ज लेकर जांच कराने को मजबूर हो जाते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं के बावजूद मरीजों को बाहर भेजा जा रहा है, तो इसकी गंभीरता से जांच होना आवश्यक है।
स्वास्थ्य विभाग बना कलेक्टर नेहा मीणा की प्राथमिकता
सिवनी कलेक्टर Neha Meena ने पदभार संभालने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता में रखा है। जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और दवाओं की उपलब्धता को लेकर प्रशासन लगातार सक्रिय दिखाई दिया है।
इसी कारण अब लोगों की नजर जिला प्रशासन पर टिक गई है। सामाजिक संगठनों और नागरिकों का कहना है कि यदि सिवनी में भी निजी लैब रेफरल और कथित कमीशनखोरी की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो जिला प्रशासन को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासन पारदर्शी जांच कराए तो इससे न केवल स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा, बल्कि आम लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा।
किन बिंदुओं पर हो सकती है जांच?
यदि जिला प्रशासन इस दिशा में कार्रवाई करता है तो कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की जांच की जा सकती है:
1. सबसे ज्यादा रेफरल किन लैब को?
जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से किन निजी लैबों को सबसे ज्यादा मरीज भेजे जा रहे हैं, इसका रिकॉर्ड खंगाला जा सकता है।
2. सरकारी मशीनों की वास्तविक स्थिति
क्या अस्पतालों में मौजूद जांच मशीनें नियमित रूप से संचालित हो रही हैं या उन्हें जानबूझकर अनुपयोगी बताया जाता है?
3. डॉक्टरों और निजी लैब के बीच संबंध
क्या किसी प्रकार का आर्थिक लेन-देन या अनौपचारिक समझौता मौजूद है?
4. मरीजों से वसूली
गरीब मरीजों से निजी जांच के नाम पर कितना अतिरिक्त पैसा लिया जा रहा है?
5. शिकायत तंत्र की स्थिति
क्या मरीजों के पास शिकायत दर्ज कराने का प्रभावी माध्यम उपलब्ध है?
क्या प्रदेशभर में है “रेफरल संस्कृति”?
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी अस्पतालों से निजी लैबों की ओर रेफरल का मुद्दा केवल एक जिले तक सीमित नहीं है। कई राज्यों में समय-समय पर ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं कि कुछ डॉक्टर निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों से सांठगांठ कर मरीज भेजते हैं।
हालांकि हर मामले में आरोप सही हों, यह जरूरी नहीं है। कई बार तकनीकी कारणों से मरीजों को बाहर भेजना पड़ता है। लेकिन यदि किसी अस्पताल में लगातार एक ही निजी लैब का नाम सामने आता है, तो इससे संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
जनता क्या चाहती है?
सिवनी जिले में अब लोगों की मांग है कि स्वास्थ्य विभाग में पारदर्शिता बढ़ाई जाए। नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि:
- जिला अस्पताल में सभी जांचों की सार्वजनिक सूची लगे
- मशीन खराब होने की जानकारी सार्वजनिक हो
- निजी लैब रेफरल का रिकॉर्ड रखा जाए
- शिकायत हेल्पलाइन शुरू की जाए
- अचानक निरीक्षण किए जाएं
लोगों का मानना है कि यदि प्रशासन समय रहते सख्ती नहीं दिखाता, तो भविष्य में बड़े घोटाले सामने आ सकते हैं।
स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसे का सवाल
यह मामला केवल भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है। यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जनता के भरोसे से भी जुड़ा हुआ है। जब गरीब मरीज सरकारी अस्पताल पहुंचता है तो उसे उम्मीद होती है कि उसे कम खर्च में बेहतर इलाज मिलेगा। लेकिन यदि उसे बार-बार निजी जांच केंद्रों के चक्कर लगाने पड़ें, तो सरकारी व्यवस्था पर उसका भरोसा कमजोर होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद जरूरी है। यदि समय-समय पर निगरानी और जांच होती रहे तो ऐसी शिकायतों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
बड़वानी में लोकायुक्त की कार्रवाई ने सरकारी अस्पतालों में कथित कमीशनखोरी और निजी लैब रेफरल के मुद्दे को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब सिवनी जिले में भी स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि अभी तक किसी प्रकार की आधिकारिक जांच या पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन लगातार मिल रही शिकायतों ने प्रशासनिक सतर्कता की आवश्यकता बढ़ा दी है।
सिवनी कलेक्टर नेहा मीणा द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता दिए जाने के कारण अब जनता को उम्मीद है कि यदि कहीं कोई अनियमितता है तो उसकी निष्पक्ष जांच होगी। आने वाले समय में प्रशासन की कार्रवाई यह तय करेगी कि स्वास्थ्य व्यवस्था में जनता का भरोसा और मजबूत होता है या फिर सवाल और गहरे होते जाते हैं।

लंबे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं प्रीति भोसले, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली आदि में पत्रकारिता करने के साथ ही समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से जुड़ी हुई हैं, प्रीति भोसले ….
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