लिमटी की लालटेन 754
आखिर क्यों रोकी गई नरवणे की किताब!, आखिर किसे डर है इस किताब से!
आखिर किसने और क्यों रोक रखा है जनरल नरवणे की बहुचर्चित किताब का प्रकाशन!
सेना की शौर्य गाथा और सत्ता का संकोच, जनरल नरावणे की किताब का द्वंद्व
(लिमटी खरे)
इस आलेख को साई न्यूज चेनल पर वीडियो में देखने के लिए क्लिक कीजिए . . .
भूमिका: एक किताब से उठा बड़ा सवाल
पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरावणे की संस्मरण पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी का प्रकाशन रुकना बीते कुछ समय से देश की राजनीति और बौद्धिक जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह मुद्दा तब और गंभीर हो गया, जब संसद के भीतर और बाहर इस पर सवाल उठे, लेकिन सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया। यह विवाद केवल एक सैन्य अधिकारी की आत्मकथा का नहीं, बल्कि उस संतुलन का है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक जवाबदेही आपस में टकराती दिखाई देती हैं।
पृष्ठभूमि: सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नियंत्रण की परंपरा
भारतीय लोकतंत्र की एक बुनियादी विशेषता यह रही है कि सेना पूरी तरह नागरिक नेतृत्व के अधीन रहती है। यही कारण है कि सैन्य निर्णयों का अंतिम नियंत्रण निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व के पास होता है। यह व्यवस्था भारत को कई अन्य देशों से अलग करती है।
लेकिन जब कोई पूर्व सेनाध्यक्ष अपने कार्यकाल के अनुभवों को शब्दों में ढालता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है कि किन अनुभवों को सार्वजनिक किया जा सकता है और किन्हें राष्ट्रीय हित में सीमित रखा जाना चाहिए।
मौजूदा स्थिति: क्यों अटकी है किताब?
जनरल नरावणे की किताब को लेकर सरकार का आधिकारिक तर्क यह रहा है कि यह अभी प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए इस पर संसद में चर्चा संभव नहीं है। संसदीय परंपराओं के लिहाज से यह तर्क तकनीकी रूप से सही माना जा सकता है।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यदि 20 से अधिक महीनों तक पुस्तक का प्रकाशन नहीं हो रहा, जबकि इसके अंश सार्वजनिक चर्चा में आ चुके हैं, तो यह देरी संदेह को जन्म देती है।
कैलाश रेंज प्रकरण: विवाद का केंद्र
इस पूरे विवाद का केंद्र अगस्त 2020 का कैलाश रेंज प्रकरण माना जा रहा है। उस समय भारत-चीन सीमा पर हालात बेहद तनावपूर्ण थे।
आरोपों के अनुसार, जब भारतीय सेना ने रणनीतिक बढ़त हासिल की, तब निर्णय की घड़ी में राजनीतिक नेतृत्व की ओर से स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं मिले। कहा जाता है कि तत्कालीन परिस्थितियों में सेनाध्यक्ष ने रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री से संपर्क किया, लेकिन अंतिम निर्णय टलता रहा।
निर्णयहीनता या रणनीतिक संयम?
आलोचकों का तर्क है कि युद्ध या संभावित युद्ध की स्थिति में राजनीतिक नेतृत्व की स्पष्ट भूमिका आवश्यक होती है।
यदि उस समय निर्णय की जिम्मेदारी सेना पर छोड़ दी गई, तो यह संस्थागत संतुलन के लिए खतरनाक संकेत माना जा सकता है। वहीं, सरकार समर्थकों का कहना है कि उस समय रणनीतिक संयम और कूटनीति को प्राथमिकता देना आवश्यक था, ताकि देश को व्यापक संघर्ष से बचाया जा सके।
राजनीतिक असर: विपक्ष के सवाल
इस मुद्दे को विपक्ष ने राजनीतिक इच्छाशक्ति और जवाबदेही से जोड़ दिया है।
राहुल गांधी द्वारा इस किताब का मुद्दा उठाया जाना और बाद में उस पर चर्चा का ठंडा पड़ जाना, यह दर्शाता है कि राजनीतिक विमर्श किस तरह अन्य बड़े मुद्दों के शोर में दब सकता है।
विपक्ष का कहना है कि यदि सरकार को अपनी रणनीति पर भरोसा है, तो उसे इस किताब के प्रकाशन से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
पारदर्शिता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा
लोकतंत्र में पारदर्शिता को सर्वोच्च मूल्य माना जाता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा उससे भी अधिक संवेदनशील विषय है।
यही द्वंद्व इस पूरे विवाद की जड़ में है—
- क्या किताब में ऐसे तथ्य हैं, जो सुरक्षा हितों को नुकसान पहुंचा सकते हैं?
- या फिर यह केवल असहज राजनीतिक सवालों से बचने की कोशिश है?
इन सवालों का स्पष्ट उत्तर अब तक सामने नहीं आया है।
तथ्य और विश्लेषण
यदि उपलब्ध जानकारियों को देखा जाए, तो यह साफ है कि—
- पुस्तक के कुछ अंश पहले ही चर्चा में आ चुके हैं
- सोशल मीडिया पर विभिन्न दावे और व्याख्याएं सामने आ रही हैं
- सरकार की ओर से न तो स्पष्ट अनुमति दी गई है, न ही ठोस आपत्ति सार्वजनिक की गई है
ऐसी स्थिति में अस्पष्टता ही विवाद को और गहरा करती है।
जन प्रतिक्रिया: भरोसे की परीक्षा
जनरल नरावणे की किताब का मामला आम जनता के लिए भी महत्व रखता है।
लोग यह जानना चाहते हैं कि—
- संकट की घड़ी में निर्णय कैसे लिए गए
- राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच समन्वय कैसा था
- क्या भविष्य में ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए सबक लिए गए
जनता के मन में उठते ये सवाल लोकतंत्र में विश्वास की कसौटी बन जाते हैं।
विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक और रक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि इस तरह के मामलों में संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार—
- किताब का प्रकाशन पूरी जांच और आवश्यक संपादन के बाद किया जा सकता है
- संवेदनशील जानकारियों को सीमित रखते हुए भी पारदर्शिता संभव है
- पूर्ण प्रतिबंध की बजाय नियंत्रित विमोचन बेहतर विकल्प हो सकता है
भविष्य की संभावनाएं
आने वाले समय में इस मुद्दे को लेकर तीन संभावनाएं दिखती हैं—
- किताब का पूर्ण प्रकाशन – जिससे सभी अटकलों पर विराम लग सकता है
- संशोधित प्रकाशन – जहां संवेदनशील अंश हटाए जाएं
- लंबी देरी – जिससे विवाद और अविश्वास दोनों बढ़ें
लोकतांत्रिक दृष्टि से पहला या दूसरा विकल्प अधिक उपयुक्त माना जा रहा है।
लोकतंत्र की कसौटी पर सरकार
इतिहास गवाह है कि सूचनाओं को दबाने से सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि और तीखे हो जाते हैं।
यदि सरकार यह मानती है कि लद्दाख संकट का प्रबंधन सफल रहा, तो उसे इस किताब को एक दस्तावेज़ के रूप में सामने लाने से नहीं हिचकना चाहिए।
🔹 8️⃣ CONCLUSION /निष्कर्ष
जनरल मनोज मुकुंद नरावणे की किताब का प्रकाशन रुकना केवल एक साहित्यिक या सैन्य मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही की परीक्षा है। राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं, लेकिन लोकतंत्र की मजबूती इसी संतुलन में निहित है। सरकार के लिए बेहतर होगा कि वह स्पष्टता के साथ इस विषय पर निर्णय ले, ताकि संदेह, अफवाहों और राजनीतिक आरोपों की जगह तथ्य और विश्वास ले सकें।
****************************************************
फिलहाल तो राहुल गांधी के द्वारा जनरल नरवणे की किताब का जो मुद्दा उठाया गया था, पर एपस्टीन फाईल्स के शोर में कहीं खो गया है, इसे पुनः जागृत अवस्था में लाने के लिए अब राहुल गांधी को न केवल इस मुद्दे को वरन एपस्टीन फाईल्स के मसले को भी नए सिरे से उठाने की जरूरत है।
देखा जाए तो जनरल नरवरणे की किताब का मामला वास्तव में एक बेहद संवेदनशील और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरावणे की संस्मरण पुस्तिका फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी के इर्द-गिर्द खड़ा हुआ यह विवाद भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संसदीय मर्यादा और राष्ट्रीय सुरक्षा के त्रिकोण को दर्शाता है।
भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात में निहित है कि यहाँ सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व के बीच एक स्पष्ट और मजबूत रेखा खींची गई है। लेकिन जब एक पूर्व सेनाध्यक्ष के अनुभव छपने से पहले ही राजनीतिक विवाद का केंद्र बन जाएं, तो सवाल सिर्फ एक किताब का नहीं रह जाता, बल्कि सवाल उस पारदर्शिता का बन जाता है जिसे लोकतंत्र की आत्मा कहा जाता है। जनरल मनोज मुकुंद नरावणे की किताब का प्रकाशन रुकना और संसद में उस पर चर्चा से इनकार करना, वर्तमान समय के कई अनुत्तरित प्रश्नों को जन्म देने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता मानी जाती है। जब शासन के निर्णय, विशेषकर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर, जनप्रतिनिधियों और जनता की निगाहों से ओझल रहते हैं, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरावणे की अप्रकाशित पुस्तक से जुड़े हालिया घटनाक्रम ने यही सवाल देश के सामने खड़ा कर दिया है कि क्या सरकार किसी असहज सच से बच रही है, या फिर वह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी मर्यादाओं का पालन कर रही है?
आईए इस संबंध में सरकार की आलोचना करने वालों के नजरिए को देखा जाए। सरकार की आलोचना करने वालों का तर्क सीधा है कि अगर किताब प्रकाशित ही नहीं हो रही, तो उसमें दर्ज अनुभवों पर चर्चा कैसे होगी? और अगर सरकार को भरोसा है कि उसमें कुछ भी आपत्तिजनक या गलत नहीं है, तो फिर प्रकाशन की अनुमति रोकी क्यों गई है?
रिपोर्ट के अनुसार, कैलाश रेंज प्रकरण के दौरान जनरल नरावणे ने तत्कालीन रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री से कई बार संपर्क कर स्पष्ट निर्देश मांगे थे। आरोप यह है कि घंटों तक निर्णय टलता रहा और अंततः प्रधानमंत्री से चर्चा के बाद रक्षा मंत्री ने सेनाध्यक्ष से कह दिया कि जो उचित लगे, वह करें।
आलोचकों के मुताबिक, यह स्थिति राजनीतिक नेतृत्व की निर्णय क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। युद्ध या संभावित युद्ध की स्थिति में सेना तात्कालिक फैसले ले सकती है, लेकिन ऑपरेशनल और रणनीतिक निर्णयों की जिम्मेदारी निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व की होती है। यदि उस क्षण सरकार ने निर्णय की जिम्मेदारी सेना प्रमुख पर डाल दी, तो यह न केवल संस्थागत भूमिका की सीमाओं का उल्लंघन है, बल्कि जवाबदेही से बचने का प्रयास भी माना जा सकता है।
आलोचना का दूसरा पहलू नेतृत्व से जुड़ा है। अगस्त 2020 का समय देश के लिए बेहद कठिन था। कोरोना महामारी अपने चरम पर थी, आपूर्ति श्रृंखलाएं पूरी तरह बाधित हीं थीं, अर्थव्यवस्था दबाव में थी। ऐसे में चीन के साथ सीमित या व्यापक सैन्य टकराव के गंभीर परिणाम हो सकते थे। इन परिणामों का आकलन और जोखिम उठाने या न उठाने का निर्णय केवल सरकार ही कर सकती थी। यदि रिपोर्ट में वर्णित घटनाएं सही हैं, तो यह आभास मिलता है कि सरकार उस निर्णायक क्षण में स्पष्ट दिशा देने से हिचक रही थी। यही कारण है कि विपक्ष इस मुद्दे को केवल एक सैन्य घटना नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा के रूप में देख रहा है।
अब जानते हैं कि कैलाश रेंज में क्या हुआ था उस क्षण! अगस्त 2020 की वह रात भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे तनावपूर्ण क्षणों में से एक थी। रिपोट्स के अनुसार, जब कैलाश रेंज की चोटियों पर भारतीय सेना ने रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली थी, तब चीनी सेना का आक्रामक होना स्वाभाविक था। एक सेनाध्यक्ष जब संकट की घड़ी में रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री को फोन करता है, तो वह केवल अनुमति नहीं मांग रहा होता, बल्कि वह देश के राजनीतिक नेतृत्व से उस रणनीतिक विजन की मांग कर रहा होता है जिसके आधार पर युद्ध या शांति का फैसला होता है।
इस मामले में विपक्ष का आरोप है कि घंटों तक सरकार का कोई स्पष्ट निर्देश न मिलना निर्णयहीनता का परिचायक है। अंततः प्रधानमंत्री से चर्चा के बाद जो उचित लगे, वह करें का निर्देश देना, पहली नजर में सेना को सशक्त करने वाला लग सकता है, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से यह जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा भी प्रतीत होता है। यदि उस रात युद्ध छिड़ जाता, तो क्या उसकी पूरी जिम्मेदारी केवल सेना की होती? कूटनीतिक और आर्थिक परिणामों का उत्तरदायी कौन होता?
सरकार और सत्ता पक्ष का यह तर्क कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए सदन में इसका उल्लेख नहीं हो सकता, तकनीकी रूप से नियमों के अनुकूल लग सकता है। संसदीय परंपराओं के अनुसार, अपुष्ट तथ्यों या अप्रकाशित दस्तावेजों पर चर्चा को अक्सर टाला जाता है। इसके पीछे सरकार की क्या मंशा है यह तो सरकार ही स्पष्ट कर सकती है, पर 21 महीनों का समय कम नहीं होता, इसलिए सरकार की मंशा पर सवालिया निशान खड़े होना स्वाभाविक ही है। अब जबकि पत्र पत्रिकाओं में पुस्तक के अंश छप चुके हैं, सोशल मीडिया पर जमकर बहस चल पड़ी है, तब उस किताब को आधिकारिक तौर पर प्रकाशन से रोकना तर्कसंगत आधार कतई नहीं माना जा सकता है। इससे तो उन आरोपों को ही बल मिल रहा है जिसमें कहा जा रहा है कि कैलाश रेंज में सरकार से चूक हुई है!
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी हाथ में किताब लिए मीडिया से रूबरू हो चुके हैं तब यह कहना कि किताब का कोई अस्तित्व ही नहीं है, पूरी तरह बेमानी ही माना जाएगा। जिस तरह के हालात हाल ही में पैदा हुए एवं होते जा रहे हैं, उससे सरकार की किरकिरी ही हो रही है।
वैसे देखा जाए तो लोकतंत्र में सूचनाओं का गला घोंटना कभी भी किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं रहा है। यदि जनरल नरावणे की किताब में कुछ ऐसा है जो सरकार की छवि को धूमिल करता है, तो उसका जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए, न कि प्रकाशन रोककर। यदि सरकार का दावा है कि उसने लद्दाख संकट को कुशलता से संभाला, तो उसे इस किताब को एक सक्सेस स्टोरी के रूप में प्रमोट करना चाहिए था।
जनरल नरावणे की किताब और उससे जुड़ा विवाद केवल एक पुस्तक या एक संसदीय बहस तक सीमित नहीं है। यह उस भरोसे की परीक्षा है, जो जनता अपने राजनीतिक नेतृत्व और संस्थानों पर करती है। यदि सरकार के पास छिपाने को कुछ नहीं है, तो पुस्तक के प्रकाशन की प्रक्रिया को जल्द पूरा करना उसके हित में है। इससे न केवल संदेह दूर होंगे, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी शर्त जिसे सच तक पहुंच भी कहा जाता है को इससे मजबूती ही मिलेगी।
साथ ही, यह भी जरूरी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा जिम्मेदारी और संतुलन के साथ हो। न अंधी आलोचना देशहित में है, न ही पूर्ण मौन। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह कठिन सवालों का सामना साहस और ईमानदारी से करे। हमारी राय में बेहतर होगा कि सरकार अविलंब इस किताब के प्रकाशन को हरी झंडी दे। देश को यह जानने का हक है कि जब दुश्मन के टैंक हमारी सीमाओं की ओर बढ़ रहे थे, तब दिल्ली के गलियारों में क्या हलचल थी। पारदर्शिता ही वह एकमात्र औजार है जो अफवाहों और राजनीति के शोर को शांत कर सकता है। सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। रक्षा मामलों में पारदर्शिता उतनी ही जरूरी है जितनी कि मारक क्षमता। इसलिए अब सरकार को बिना देर किए इस किताब के प्रकाशन के लिए हामी भर देना चाहिए, अन्यथा सोशल मीडिया पर इस किताब के कुछ कथित, काल्पनिक भद्दे, सरकार को कटघरे में खड़े करने वाले अंश अगर वायरल होना आरंभ हुए तो सरकार को उसे रोकना मुश्किल ही होगा . . .
लिमटी की लालटेन के 754वें एपीसोड में फिलहाल इतना ही। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया की साई न्यूज में लिमटी की लालटेन अब हर रोज सुबह 07 बजे प्रसारित की जा रही है। आप समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया की वेब साईट या साई न्यूज के चेनल पर जाकर इसे रोजाना सुबह 07 बजे देख सकते हैं। अगर आपको लिमटी की लालटेन पसंद आ रही हो तो आप इसे लाईक, शेयर व सब्सक्राईब अवश्य करें। हम लिमटी की लालटेन का 755वां एपीसोड लेकर जल्द हाजिर होंगे, तब तक के लिए इजाजत दीजिए . . .
(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

मौसम विभाग पर जमकर पकड़, लगभग दो दशकों से मौसम का सटीक पूर्वानुमान जारी करने के लिए पहचाने जाते हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 20 वर्षों से ज्यादा समय से सक्रिय महेश रावलानी वर्तमान में समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के ब्यूरो के रूप में कार्यरत हैं .
समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया देश की पहली डिजीटल न्यूज एजेंसी है. इसका शुभारंभ 18 दिसंबर 2008 को किया गया था. समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया में देश विदेश, स्थानीय, व्यापार, स्वास्थ्य आदि की खबरों के साथ ही साथ धार्मिक, राशिफल, मौसम के अपडेट, पंचाग आदि का प्रसारण प्राथमिकता के आधार पर किया जाता है. इसके वीडियो सेक्शन में भी खबरों का प्रसारण किया जाता है. यह पहली ऐसी डिजीटल न्यूज एजेंसी है, जिसका सर्वाधिकार असुरक्षित है, अर्थात आप इसमें प्रसारित सामग्री का उपयोग कर सकते हैं.
अगर आप समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को खबरें भेजना चाहते हैं तो व्हाट्सएप नंबर 9425011234 या ईमेल samacharagency@gmail.com पर खबरें भेज सकते हैं. खबरें अगर प्रसारण योग्य होंगी तो उन्हें स्थान अवश्य दिया जाएगा.





