बजट 2026: लोकलुभावनवाद से आगे रोजगार की अग्निपरीक्षा, युवाओं को खैरात नहीं अवसर चाहिए

बजट 2026 ऐसे समय में पेश होने जा रहा है जब देश लोकलुभावन राजनीति और स्थायी रोजगार नीति के बीच खड़ा है। मुफ्त योजनाओं ने तत्काल राहत दी, लेकिन रोजगार सृजन की चुनौती अब भी बनी हुई है। सवाल यह है कि क्या सरकार खैरात से आगे बढ़कर युवाओं को अवसर दे पाएगी। यह बजट देश की आर्थिक दिशा और लोकतांत्रिक परिपक्वता की परीक्षा बनेगा।

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बजट 2026, लोकलुभावनवाद से आगे क्या, मुफ्त योजनाओं नहीं, रोजगार की अग्निपरीक्षा

बजट में हो कुछ ठोस, युवाओं को खैरात नहीं अवसर चाहिए . . .

(लिमटी खरे)

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देश का लोकतंत्र आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां नीतियों की दिशा आने वाले वर्षों का भविष्य तय करेगी। वर्ष 2026 केवल एक और बजट वर्ष नहीं है, बल्कि यह यह तय करने का समय है कि शासन की प्राथमिकता क्या होगी—मुफ्त योजनाओं के सहारे तात्कालिक राहत या रोजगार और अवसरों के जरिए दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता। बीते एक दशक में कल्याणकारी योजनाओं और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने समाज के कमजोर वर्गों को संबल दिया, लेकिन अब यही मॉडल अपनी सीमाओं के साथ सामने खड़ा है।

पृष्ठभूमि: राहत से निर्भरता तक का सफर

मुफ्त बिजली, पानी, अनाज और नकद हस्तांतरण जैसी योजनाएं चुनावी राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुकी हैं। इन योजनाओं ने आर्थिक असमानता को कुछ हद तक कम किया और संकट के समय लोगों को सहारा दिया। महामारी और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के दौर में इन उपायों ने सामाजिक असंतोष को थामे रखा।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह राहत स्थायी समाधान बन सकती है? अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब कल्याण का केंद्र केवल वितरण तक सीमित हो जाए, तो वह धीरे-धीरे निर्भरता को जन्म देता है। इससे न केवल सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ता है, बल्कि कार्यशील आबादी की उत्पादक क्षमता भी प्रभावित होती है।

वर्तमान परिदृश्य: बजट 2026 के सामने दो रास्ते

जनवरी की ठंडी हवा के बीच जब बजट 2026 की रूपरेखा तैयार हो रही है, तब देश के सामने दो स्पष्ट रास्ते हैं।
पहला रास्ता वह है, जिसमें लोकलुभावन योजनाओं का विस्तार कर तात्कालिक संतोष हासिल किया जाए। यह रास्ता राजनीतिक दृष्टि से आसान है, क्योंकि इससे तत्काल लाभार्थी वर्ग बनता है।
दूसरा रास्ता कठिन है—रोजगार सृजन, कौशल विकास और उद्यमिता को प्राथमिकता देना। यह रास्ता त्वरित राजनीतिक लाभ भले न दे, लेकिन देश की आर्थिक नींव को मजबूत करता है।

वित्तीय नीति निर्माताओं के सामने असली चुनौती यह नहीं है कि कितनी नई योजनाएं घोषित हों, बल्कि यह है कि संसाधनों का उपयोग कैसे हो। मछली देने की बजाय मछली पकड़ने के साधन देना ही स्थायी विकास का मूल मंत्र माना जाता है।

सियासत बनाम अर्थशास्त्र: आंकड़ों की सच्चाई

चुनावी वर्षों में बजट अक्सर लोकप्रियता की कसौटी पर कसे जाते हैं। लेकिन आर्थिक अध्ययनों की सच्चाई इससे अलग तस्वीर पेश करती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बुनियादी ढांचे में किया गया निवेश बहुगुणक प्रभाव पैदा करता है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च किया गया एक रुपया भविष्य में कई गुना मूल्य सृजन करता है, जबकि लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च सीमित आर्थिक प्रभाव तक सिमट जाता है।

राजमार्ग, रेलवे, औद्योगिक कॉरिडोर और लॉजिस्टिक हब केवल कंक्रीट की संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि वे भविष्य की आर्थिक गतिविधियों के केंद्र होते हैं। इन परियोजनाओं से रोजगार, व्यापार और राजस्व—तीनों को गति मिलती है।

रोजगार का असली इंजन: एमएसएमई और विनिर्माण

भारत की अर्थव्यवस्था में लघु, मध्यम और सूक्ष्म उद्योगों की भूमिका केंद्रीय है। यह क्षेत्र करोड़ों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार देता है। निर्यात से लेकर घरेलू उत्पादन तक, एमएसएमई अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।
यदि बजट 2026 में इस क्षेत्र को लक्षित कर ऋण, तकनीक और बाजार तक पहुंच को आसान बनाया जाए, तो रोजगार सृजन की संभावनाएं कई गुना बढ़ सकती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कर प्रोत्साहन को सीधे रोजगार सृजन से जोड़ा जाना चाहिए। इससे उद्योगों को विस्तार का प्रोत्साहन मिलेगा और युवाओं के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

क्षेत्रीय असंतुलन और पलायन की समस्या

देश के कई राज्यों में रोजगार के अवसरों की कमी के कारण युवा बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इससे शहरी क्षेत्रों पर दबाव बढ़ता है और ग्रामीण व अर्ध-शहरी इलाकों में आर्थिक ठहराव पैदा होता है।
यदि औद्योगिक और सेवा क्षेत्र के केंद्र क्षेत्रीय स्तर पर विकसित किए जाएं, तो यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। स्थानीय रोजगार से न केवल सामाजिक स्थिरता बढ़ेगी, बल्कि क्षेत्रीय विकास भी संतुलित होगा।

मुफ्त योजनाओं की सीमाएं

मुफ्त योजनाएं आय का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे केवल अस्थायी सहारा देती हैं। जब बड़ी संख्या में कार्यशील आबादी इन्हीं योजनाओं पर निर्भर होने लगे, तो आत्मनिर्भरता कमजोर पड़ने लगती है।
इसके साथ ही, सरकारी कोष पर बढ़ता बोझ कर्ज को बढ़ाता है, जिसका असर भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ता है। उत्पादक क्षेत्रों में निवेश की गति धीमी हो जाती है, जिससे समग्र आर्थिक विकास प्रभावित होता है।

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव

रोजगार केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक गरिमा और आत्मसम्मान से भी जुड़ा है। काम करने का अवसर व्यक्ति को व्यवस्था में हिस्सेदारी का एहसास कराता है।
राजनीतिक दृष्टि से भी रोजगार केंद्रित नीति लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत मानी जाती है। जब नागरिकों को अवसर मिलते हैं, तो वे नीतियों के सहभागी बनते हैं, केवल लाभार्थी नहीं।

विशेषज्ञ दृष्टिकोण और भविष्य की संभावनाएं

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की विशाल युवा आबादी एक जनसांख्यिकीय लाभांश है। लेकिन यदि इसे अवसरों में नहीं बदला गया, तो यही शक्ति असंतोष का कारण भी बन सकती है।
बजट 2026 में कौशल विकास, नवाचार, स्टार्टअप और हरित अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों पर फोकस भविष्य की दिशा तय कर सकता है।

आने वाले वर्षों में वही देश आगे बढ़ेंगे, जो अपने युवाओं को खैरात नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी और समान अवसर देंगे। यह न केवल आर्थिक मजबूती लाएगा, बल्कि सामाजिक स्थिरता भी सुनिश्चित करेगा।

8️⃣ Conclusion / निष्कर्ष

बजट 2026 की असली कसौटी यह नहीं होगी कि कितनी मुफ्त योजनाएं घोषित की गईं, बल्कि यह होगी कि कितने नए अवसर पैदा हुए। राहत जरूरी है, लेकिन सम्मान और आत्मनिर्भरता रोजगार से ही आती है। लोकलुभावन राजनीति से आगे बढ़कर रोजगार केंद्रित नीति अपनाना ही भारत की आर्थिक मजबूती और लोकतांत्रिक भविष्य की कुंजी है।

देश का लोकतंत्र आज एक निर्णायक चौराहे पर खड़ा है। वर्ष 2026 केवल नीतियों की निरंतरता का नहीं, बल्कि यह तय करने का वर्ष है कि शासन की प्राथमिकता मुफ्त योजनाएं रहेंगी या स्थायी रोजगार के अवसर। बीते एक दशक में निशुल्क सुविधाओं और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने जरूरतमंद तबकों को तत्काल राहत जरूर दी है, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या यह मॉडल देश की आर्थिक मजबूती और सामाजिक आत्मनिर्भरता को टिकाऊ आधार दे पा रहा है?

आईए इस मामले में सबसे पहले चर्चा करते हैं कि कि निशुल्क योजनाएं लोगों के लिए सहारा हैं या स्थायी निर्भरता?

जनवरी की ठण्डी बयार बह रही है। जनवरी की इस ठंडी हवा में जब बजट 2026 की रूपरेखा तैयार हो रही है, तब देश के सामने दो स्पष्ट  रास्ते हैं। पहला रास्ता है, मुफ्त बिजली, पानी और नकद हस्तांतरण जैसी अल्पकालिक राहतों का है, जो चुनावी लाभ तो दे सकती हैं, लेकिन नागरिकों को आत्मनिर्भर नहीं बनातीं। दूसरा रास्ता है युवाओं के लिए रोजगार सृजन और अवसर निर्माण का है, जो भले ही तत्काल राजनीतिक लाभ न दे, लेकिन देश की दीर्घकालिक आर्थिक नींव मजबूत करता है।

देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने चुनौती यह नहीं है कि कितनी योजनाएं घोषित हों, बल्कि यह है कि चुनावी राज्यों को मछली देने के स्थान पर मछली पकड़ने के साधन कैसे दिए जाएं। बुनियादी जरूरतों में राज्य की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन जब नीति का केंद्र रोजगार सृजन से हटकर केवल वितरण बन जाए, तो कल्याण निर्भरता में बदलने लगता है।

चुनावी वर्षों में लोकलुभावन योजनाओं की बाढ़ नई बात नहीं है। लेकिन आज का युवा सब्सिडी नहीं, समान अवसर चाहता है। उसे बैसाखी नहीं, दौड़ने के लिए मैदान चाहिए। अब समय आ गया है कि सरकार स्किल इंडिया 2.0, औद्योगिक गलियारों और क्षेत्रीय रोजगार केंद्रों पर ध्यान केंद्रित करे। यदि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु या असम के युवाओं को अपने ही राज्य में रोजगार मिले, तो पलायन, असंतोष और बेरोजगारी जैसी समस्याएं स्वतः ही कमजोर पड़ेंगी।

निशुल्क योजनाओं की सीमाएं अब स्पष्ट होने लगी हैं। ये आय नहीं, केवल अस्थायी सहारा देती हैं और कार्यशील आबादी में आत्मनिर्भरता को कमजोर करती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सरकारी खजाने पर स्थायी दबाव बनाती हैं, जिससे उत्पादक अर्थव्यवस्था के विस्तार की गति धीमी हो जाती है।

अब जानते हैं सियासत बनाम अर्थशास्त्र में आंकड़ों की हकीकत को, चुनावी बजट  अक्सर लोकप्रिय बनने की होड़ में आर्थिक रूप से कमजोर पड़ जाते हैं। आर्थिक अध्ययनों के अनुसार, इंफ्रास्ट्रक्चर यानी बुनियादी ढांचे में निवेश किया गया 1 रुपया लगभग 2.45 रुपये का मूल्य सृजन करता है, जबकि लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च किया गया 1 रुपया केवल 0.95 रुपये तक ही सिमट कर रह जाता है। यानी रेवड़ी से वोट तो मिल सकते हैं, लेकिन विकास नहीं।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के अनुसार, राजमार्ग, रेलवे और लॉजिस्टिक पार्क केवल कंक्रीट के ढांचे नहीं, बल्कि भविष्य का राजस्व हैं। यदि सरकार चुनावी राज्यों में इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता दे, तो वह केवल वोट नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की आर्थिक मजबूती भी अर्जित करती है।

अब चर्चा की जाए एमएसएमई और विनिर्माण पर, जो रोजगार के असली इंजन माने जाते हैं।

भारत में रोजगार का सबसे बड़ा स्त्रोत लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) हैं, जिनका कुल निर्यात में 45 प्रतिशत योगदान है। यदि बजट 2026 में ऋण गारंटी योजनाओं को 20 फीसदी बढ़ाया जाए, तो लगभग 1.5 करोड़ नए रोजगार सृजित हो सकते हैं। खैरात देने से बेहतर है कि छोटे उद्यमियों को खड़ा किया जाए और टैक्स छूट को रोजगार सृजन से जोड़ा जाए। इसी तरह, मेक इन इंडिया को महानगरों से बाहर निकालकर असम में कृषि-प्रसंस्करण या केरल में आईटी-पर्यटन हब जैसे क्षेत्रीय केंद्रों तक ले जाना होगा।

यह सच है कि भोजन, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों में राज्य की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब नीति का केंद्र रोजगार सृजन से हटकर केवल वितरण बन जाए, तो वही कल्याण निर्भरता में बदलने लगता है। अगर युवाओं को सब कुछ निशुल्क मिलने लगेगा मतलब यह कि दाल, चावल सब एक या दो रूपए किलो मिलने लगेगा, हर महीने महिलाओं को हजार दो हजार रूपए की सौगात मिलेगी तो सबसे बड़ा विचारणीय प्रश्न यही है कि क्या वे आत्मनिर्भर बन पाएंगे! जाहिर है नहीं, उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा करना होगा। युवाओं के लिए कुटीर, मध्यम उद्योगों के मार्ग प्रशस्त करने होंगे।

रोजगार सिर्फ आय नहीं देता, वह व्यक्ति को गरिमा और व्यवस्था में हिस्सेदारी देता है। भारत की विशाल युवा शक्ति एक वरदान है, लेकिन यदि उन्हें अवसर न मिले, तो यह एक गंभीर चेतावनी भी है। 2026 यह तय करेगा कि भारत कल्याणकारी राज्य को किस रूप में देखता है, एक ऐसा राज्य जो नागरिकों को सहारा देता रहे, या ऐसा जो उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर दे।

असली सवाल यह नहीं कि सरकार क्या मुफ्त दे रही है, बल्कि यह है कि वह लोगों को क्या कमाने का अवसर दे रही है। लोकलुभावन राजनीति से आगे बढ़कर रोजगार केंद्रित नीति अपनाना ही भारत की आर्थिक मजबूती और लोकतांत्रिक परिपक्वता की असली कसौटी है।

आज जो निशुल्क सौगातें दी जा रही हैं वे आय के साधन नहीं, वरन अस्थायी सहारा ही हैं। इस तरह की कवायद कार्यशील आबादी में आत्मनिर्भरता को कमजोर करती है। इससे सरकारी कोष पर दबाव बढ़ता है, सरकारों पर कर्ज बढ़ता ही जाता है। उत्पादक अर्थव्यवस्था के विस्तार को धीमा करती हैं। इससे लोकप्रियता तो मिलती है, लेकिन देश की सबसे बड़ी पूंजी मानव श्रम और कौशल अप्रयुक्त रह जाती है।

मुफ्त योजनाएं राहत दे सकती हैं, लेकिन रोजगार सम्मान देता है। असली सवाल यह नहीं कि सरकार क्या मुफ्त दे रही है, बल्कि यह है कि वह लोगों को क्या कमाने का अवसर दे रही है। लोकलुभावन राजनीति से आगे बढ़कर रोजगार केंद्रित नीति अपनाना ही भारत की आर्थिक मजबूती और लोकतांत्रिक परिपक्वता की असली कसौटी है।

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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)