लिमटी की लालटेन 742
महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा भूचाल,भाजपा का परचम लहराया
महाराष्ट्र के नतीजों के बाद राहुल गांधी को विचार करना होगा कि उनके सलाहकार कहीं उन्हें . . .
शिवसेना को खड़ा करने कितनी मेहनत की बालासाहेब ने, उसे एक झटके में सड़क पर ला दिया ठाकरे बंधुओं ने
इस आलेख को साई न्यूज चेनल पर वीडियो में देखने के लिए क्लिक कीजिए . . .
(लिमटी खरे)
महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों में जिस तरह के परिणाम आए हैं, उन्होंने सबको चौंका दिया है। महाराष्ट्र की राजधानी और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में मुंबई महानगर पालिका निगम (बीएमसी) शिवसेना को जमीन चटाना बहुत आसान काम नहीं था, पर देवेंद्र फड़नवीस जिन्हें लोग प्यार से देवा भाऊ कहकर बुलाते हैं के द्वारा यह कर दिखाया। महाराष्ट्र के नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा ने 29 में से 25 निकायों में परचम लहराया है। सबसे अहम बात यह है कि मुंबई में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।
बीएमसी के चुनावों को ठाकरे बंधुओं के लिए अस्तित्व का प्रश्न माना जा रहा था, देवा भाऊ की कुशल रणनीति से बाला साहेब ठाकरे द्वारा एक एक ईंट जोड़कर बहुत मेहनत से बनाया अंतिम किला भी उनके पुत्र उद्धव एवं भतीजे राज ठाकरे के कदमतालों के कारण ध्वस्त हो गया। लगभग तीन दशकों से मुंबई पर शिवसेना का राज था, कहा जाता था कि बीएमसी मतलब शिवसेना, पर अब ये मायने बदल चुके हैं। जून 2022 में शिवसेना के विभाजन के बाद उसका यह तीसरा चुनाव था, पर इस बार शिवसेना औंधे मुंह ही गिरी दिख रही है।
कहा जाता है कि बाला साहेब ठाकरे के पूर्वज मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के थे। वे एक कार्टूनिस्ट थे और उनके द्वारा 19 जून 1966 को शिवसेना की स्थापना की गई थी। 17 नवंबर 2012 को बालासाहेब के अवसान के उपरांत शिवसेना में बालासाहेब के असली उत्ताराधिकारी की जंग चली। शिवसेना दो भागों में विभक्त हुई। एक का नेतृत्व बालासाहेब के पुत्र उद्धव कर रहे थे तो दूसरी का उनके भतीजे राज ठाकरे। बाला साहेब के हिन्दुत्व के एजेंडे को दरकिनार कर उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस से हाथ मिलाकर 2019 में सरकार बनाई जो 2022 तक ही चली क्योंकि 10 अक्टूबर 2022 को शिवसेना दो फाड़ हो गई।
उद्धव की शिवसेना को यकीन था कि मराठी वोटर्स को लुभाने के लिए वे गैर मराठी लोगों पर सख्ती का कार्ड चलेंगे और उन्हें सफलता हासिल होगी। उनके द्वारा अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से गले मिलकर उनकी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को साथ लिया। राज ठाकरे के बारे में कहा यही जा रहा था कि वे नफरत की राजनीति को ही पोषित करते आए हैं। उनके द्वारा चुनाव के दौरान भी भाषाओं को लेकर जमकर जहर उगला गया।
उधर, भाजपा के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के द्वारा नपे तुले कदमों से बिना किसी तरह के प्रपोगंडे के कदम बढ़ाए जाते रहे। उनके द्वारा एकनाथ शिंदे की शिवसेना को साथ लिया गया, क्योंकि वे जानते थे कि शिवसेना का मूल सिंबाल धनुष बाण उनके पास है, एवं उद्धव के पास तो मशाल ही है। शिवसेना का वोटर धनुष बाण को ही जानता है। इन चुनावों में विपक्ष पूरी तरह से बिखरा नजर आया। विपक्ष एक साथ मिलकर चुनाव लड़ता तो आज परिदृश्य शायद कुछ ओर होता।
वैसे इस पूरे मामले में कांग्रेस के लिए यह आत्म मंथन का वक्त है। इसका कारण यह है कि अब तक के जितने भी चुनावों में राहुल गांधी के द्वारा गठबंधन किए गए हैं, उनमें कांग्रेस को बहुत बुरी तरह से पराजय का सामना करना पड़ा है। राहुल गांधी को यह विचार जरूर करना चाहिए कि कहीं उनके रणनीतिकार और सलाहकारों के द्वारा इस तरह की परिस्थितियां तो उतपन्न नहीं की जा रही हैं कि राहुल गांधी पर एक छाप लग जाए कि वे जिन भी पार्टियों के साथ भी गठबंधन करते हैं वे पार्टीज पराजय का मुंह देखने पर मजबूर हो जाती है। कहीं राहुल गांधी को कांग्रेस के अंदर ही हाशिए पर ढकेलने की यह सोची समझी रणनीति पर तो काम नहीं हो रहा है, क्योंकि जबसे राहुल गांधी ने फैसले लेना आरंभ किए उसके बाद से कांग्रेस का सियासी ग्राफ बुरी तरह डगमगाता दिख रहा है। इस तरह का ग्राफ तो हृदयाघात वाले मरीज के ईसीजी का भी शायद होता हो!
विपक्ष को इस बात पर विचार करना होगा कि भाजपा के पास नरेंद्र मोदी जैसा एक चेहरा है, जिसे राजनैतिक तौर पर घेरने में कांग्रेस और विपक्ष के अन्य नेता पूरी तरह असफल ही साबित होते आए हैं। भाजपा सत्ता में है, उसके पास संघ जैसा पितृ संगठन माना जा सकता है। भाजपा का सोशल मीडिया बहुत तगड़ा है। इससे उलट कांग्रेस का सेवादल जिसे संघ के मुकाबले खड़ा करने का प्रयास किया गया था, वह सिर्फ और सिर्फ नेताओं के आगमन पर सलामी देने लेने तक सिमट कर रह गया है। कांग्रेस का सोशल मीडिया सेल बहुत ही कमजोर साबित हो रहा है। राहुल गांधी जिस काकस से घिरे हैं, शायद वही उनको वास्तविक स्थितियों से दो चार नहीं होने दे रहा है। इसका कारण क्या है यह कहना बहुत मुश्किल ही है।
वैसे विपक्ष को अगर लगता है कि ईवीएम सेट है तो चुनाव मैदान में उतरने का क्या औचित्य! चुनाव न लड़ने का फैसला क्यों नहीं लेता विपक्ष, बिना विपक्ष के एक बार सत्ताधारी दल के सभी प्रत्याशियों को बिना मतदान के अनअपोज जीत जाने दिया जाए, तब जनता के सामने हकीकत आ सकेगी। दूसरी बात यह कि मतदान के बाद तो विपक्ष खामोश रहता है पर जैसे ही चुनाव परिणाम आते हैं और विपक्ष धूल में गिरा दिखाई देता है वैसे ही ईवीएम का रोना आरंभ हो जाता है। विपक्ष भूल जाता है कि यह सोशल मीडिया का जमाना है और सभी को सब कुछ पता है।
कुल मिलाकर महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों को एक सबक के रूप में देखा जा सकता है। भाजपा की विजय पतका लेकर चलने वाला अवश्मेध यज्ञ का घोड़ा बिना किसी रूकावट के तेजी से दौड़ रहा है। उसकी टॉप की आवाज वीराने को चीरती हुई साफ सुनाई दे रही है। इसे पकड़ने अथवा रोकने का साहस कोई जुटा नहीं पा रहा है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों से अगर विपक्ष ने सबक नहीं लिया तो आने वाले समय में जनता उन्हें रोतला अर्थात सैदव रोने वाला करार अगर दे दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए . . .
लिमटी की लालटेन के 742वें एपीसोड में फिलहाल इतना ही। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया की साई न्यूज में लिमटी की लालटेन अब हर रोज सुबह 07 बजे प्रसारित की जा रही है। आप समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया की वेब साईट या साई न्यूज के चेनल पर जाकर इसे रोजाना सुबह 07 बजे देख सकते हैं। अगर आपको लिमटी की लालटेन पसंद आ रही हो तो आप इसे लाईक, शेयर व सब्सक्राईब अवश्य करें। हम लिमटी की लालटेन का 743वां एपीसोड लेकर जल्द हाजिर होंगे, तब तक के लिए इजाजत दीजिए . . .
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों के हालिया परिणामों ने पूरे राज्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी गहरा संदेश दिया है। वर्षों से शिवसेना का गढ़ माने जाने वाली मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना किसी राजनीतिक चमत्कार से कम नहीं है। देवेंद्र फड़नवीस—जिन्हें प्यार से देवा भाऊ कहा जाता है—की रणनीतिक सूझबूझ और सांगठनिक मजबूती ने ऐसा कर दिखाया, जिसे असंभव माना जा रहा था।
29 में से 25 निकायों में भाजपा की विजय ने विपक्ष को निर्णायक रूप से कमजोर किया है। इन परिणामों ने न केवल शिवसेना के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगाया है, बल्कि कांग्रेस की रणनीति पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
शिवसेना का ढहता किला—एक इतिहास का अंत?
मुंबई में बीएमसी का नाम आते ही वर्षों से शिवसेना की सत्ता का ख्याल आता था। कहा जाता था—“बीएमसी मतलब शिवसेना।” बालासाहेब ठाकरे द्वारा रचा गया यह किला लगभग तीन दशकों तक अजेय खड़ा रहा।
लेकिन 2022 में हुए विभाजन के बाद से शिवसेना की जमीन धीरे-धीरे खिसकती चली गई। इस चुनाव में यह खिसकन और गहरी हो गई, जहां उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की राजनीतिक दिशा और नेतृत्व पर सवाल उठ खड़े हुए।
शिवसेना के बिखराव की वजहें—विश्लेषण
- विभाजन का असर: 2022 में एकनाथ शिंदे द्वारा अलग होने से शिवसेना दो भागों में बंट गई—‘धनुष-बाण’ और ‘मशाल’।
- सीमित जनाधार: शिवसेना की राजनीति मराठी बनाम गैर-मराठी तक सीमित होती चली गई।
- गठजोड़ की गलत रणनीति: उद्धव का कांग्रेस और अन्य दलों से हाथ मिलाना मूल शिवसेना वोटरों को रास नहीं आया।
- राज ठाकरे का विवादित भाषण: भाषाई मुद्दों पर आक्रामक बयानबाजी ने गैर-मराठी वोटरों को उनसे दूर किया।
- फडणवीस की शांत रणनीति: बिना शोर-शराबे के भाजपा ने जमीनी स्तर पर अपना नेटवर्क मजबूत किया।
देवा भाऊ की रणनीति—शांत,सधी हुई और गहरी
देवेंद्र फडणवीस पिछले एक दशक से महाराष्ट्र की भाजपा राजनीति का सबसे मजबूत चेहरा बनकर उभरे हैं।
उनकी रणनीति का केंद्र तीन बिंदुओं पर था—
- शिंदे गुट को साथ लेना (क्योंकि उनके पास शिवसेना का मूल चुनाव चिह्न धनुष-बाण था)
- संगठन को बारीकी से तैयार करना
- विपक्ष के भ्रम और फूट का लाभ उठाना
फडणवीस ने बिना किसी बड़े राजनीतिक बयान या टकराव के चुनावी रणनीति को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया और जब परिणाम आए तो भाजपा महाराष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी।
राहुल गांधी और कांग्रेस—पराजय के पीछे छिपे सवाल
इन चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता, उनके सलाहकारों की भूमिका और गठबंधन रणनीति पर बड़ी बहस खड़ी हो रही है।
क्यों उठ रहे हैं ये सवाल?
- राहुल गांधी जिन भी दलों के साथ गठबंधन कर रहे हैं, उन दलों को जीत नहीं मिल रही।
- कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में एक धारा ऐसी भी है जिसे राहुल के फैसलों पर भरोसा नहीं।
- सोशल मीडिया और पार्टी संगठन की कमजोरी भी पराजय का बड़ा कारण बनी।
- विपक्षी दलों में तालमेल का अभाव और ईगो क्लैश ने चुनावी समीकरण बिगाड़ दिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी को अपने रणनीतिकारों पर गहराई से विचार करना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें पार्टी के अंदर ही हाशिए पर धकेलने की सुनियोजित कोशिश चल रही हो।
कांग्रेस का संगठन—सिर्फ औपचारिकताएँ,जमीन से दूरी
भाजपा के पास जहां संघ का सशक्त आधार है, वहीं कांग्रेस का सेवादल केवल औपचारिकताओं तक सिमटकर रह गया है।
सोशल मीडिया पर भी कांग्रेस की पकड़ कमजोर है, जबकि भाजपा का डिजिटल नेटवर्क अत्यंत शक्तिशाली है।
चुनाव अभियान में डिजिटल उपस्थिति, डेटा-आधारित चुनाव प्रबंधन और प्रोफेशनल कम्युनिकेशन की आवश्यकता थी, जिसमें कांग्रेस पिछड़ गई।
विपक्ष का कमजोर मोर्चा—एकजुटता का अभाव
इन निकाय चुनावों में विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ था।
यदि कांग्रेस, उद्धव शिवसेना, NCP और अन्य दल एक साथ चुनाव लड़ते तो तस्वीर शायद कुछ और होती।
लेकिन तीन समस्याएँ लगातार आड़े आती रहीं—
- नेतृत्व का अभाव
- आपसी अविश्वास
- स्थानीय स्तर पर जमीनी तालमेल की कमी
ईवीएम बहस—परिणाम आने के बाद ही क्यों?
चुनाव से पहले विपक्ष ईवीएम को लेकर कोई गंभीर मुद्दा नहीं उठाता, लेकिन जैसे ही परिणाम आते हैं, ईवीएम का मुद्दा छेड़ दिया जाता है।
यदि विपक्ष को सच में लगता है कि चुनाव मशीनों से प्रभावित होते हैं, तो चुनाव लड़ने का औचित्य क्या?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह सिर्फ हार की निराशा से जन्मी प्रतिक्रिया होती है, न कि कोई ठोस तर्क।
महाराष्ट्र चुनाव—विपक्ष के लिए बड़ा सबक
इन स्थानीय निकाय चुनावों ने यह संदेश साफ कर दिया है कि—
- भाजपा का संगठन मजबूत, सक्षम और विस्तारवादी है
- विपक्ष में अभी भी नेतृत्व और रणनीति की कमी है
- शिवसेना का अस्तित्व संकट में है
- कांग्रेस के लिए यह अंतिम चेतावनी की तरह है
- जनता भाजपा के विकास पैकेज, स्थिर नेतृत्व और तय एजेंडे को प्राथमिकता दे रही है
भाजपा का ‘अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा’ अब लगातार आगे बढ़ रहा है और विपक्ष की पकड़ कमजोर हो रही है।
यदि विपक्ष ने अपने ढांचे, रणनीति और नेतृत्व शैली में तत्काल बदलाव नहीं किया, तो आने वाले चुनावों में उन्हें और बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
8️⃣ Conclusion /निष्कर्ष
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव केवल एक राज्य के परिणाम नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का स्पष्ट संकेत हैं। भाजपा ने अपनी कार्यशैली, संगठन शक्ति और समन्वित रणनीति के दम पर शिवसेना का किला ढहा दिया। वहीं कांग्रेस और विपक्ष को अपनी कमजोरियों, बिखराव और नेतृत्व संकट पर गंभीरता से विचार करना होगा। यदि विपक्ष अभी भी नहीं जागा तो आने वाले समय में उसकी राजनीतिक जमीन और संकरी होती जाएगी।
(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

लगभग 16 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के सिवनी ब्यूरो के रूप में लगभग 12 सालों से कार्यरत हैं.
समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया देश की पहली डिजीटल न्यूज एजेंसी है. इसका शुभारंभ 18 दिसंबर 2008 को किया गया था. समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया में देश विदेश, स्थानीय, व्यापार, स्वास्थ्य आदि की खबरों के साथ ही साथ धार्मिक, राशिफल, मौसम के अपडेट, पंचाग आदि का प्रसारण प्राथमिकता के आधार पर किया जाता है. इसके वीडियो सेक्शन में भी खबरों का प्रसारण किया जाता है. यह पहली ऐसी डिजीटल न्यूज एजेंसी है, जिसका सर्वाधिकार असुरक्षित है, अर्थात आप इसमें प्रसारित सामग्री का उपयोग कर सकते हैं.
अगर आप समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को खबरें भेजना चाहते हैं तो व्हाट्सएप नंबर 9425011234 या ईमेल samacharagency@gmail.com पर खबरें भेज सकते हैं. खबरें अगर प्रसारण योग्य होंगी तो उन्हें स्थान अवश्य दिया जाएगा.





