लिमटी की लालटेन 739 – सरकारी व्यवस्था की एक और परत उघड़ने का मामला
(लिमटी खरे)
मध्यप्रदेश शासन और उसके विभिन्न विभागों में पिछले पच्चीस वर्षों से चला आ रहा एक बड़ा प्रशासनिक गड़बड़झाला अब सामने आया है। सरकारी कार्यालयों में उपयोग किए जा रहे अनुबंधित वाहनों की व्यवस्था, जो कभी सरकारी खर्च कम करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, वह वर्षों बाद खुद एक विशाल समस्या बनकर उभरी है। हाल ही में सरकार द्वारा जारी आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि अब तक हजारों वाहनों का उपयोग बिना आवश्यक दस्तावेजों और वैधता के किया जाता रहा। यह खुलासा सिर्फ अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
पृष्ठभूमि: क्यों शुरू हुई थी किराए के वाहनों की व्यवस्था?
करीब चार दशक पहले से ही मध्यप्रदेश का वित्तीय ढांचा कमजोर पड़ने लगा था। सरकारी खर्च बढ़ रहा था और संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा था। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में सरकारी वाहनों को ‘सफेद हाथी’ मानते हुए खर्च कम करने की नीति अपनाई गई।
इस नीति के अनुसार—
- विभागों को सरकारी वाहन खरीदने की बजाय किराए पर वाहन लेने चाहिए
- टेक्सी कोटे में पंजीकृत वाहनों का ही अनुबंध किया जा सकता है
- बीमा, परमिट, फिटनेस, पीयूसी सब अनिवार्य
- चालक के पास वैध बैच और लाइसेंस होना जरूरी
वित्त विभाग का वर्ष 2006 का परिपत्र भी यही पुष्टि करता है।
लेकिन सवाल है—
क्या इन नियमों का पालन हुआ?
जवाब है—नहीं।
25सालों से नियमों की अनदेखी–कैसे चला अवैध वाहन सिस्टम?
लगभग पच्चीस वर्षों से अनुबंधित वाहनों की वैधता सिर्फ कागजों पर थी। व्यवहार में—
- निजी वाहन को ही अनुबंधित बताकर उपयोग किया जाता रहा
- टेक्सी परमिट की अनिवार्यता पूरी तरह दरकिनार
- फिटनेस और बीमा जैसे दस्तावेजों की किसी ने भी जांच नहीं की
- चालक के बैच और गणवेश की व्यवस्था नाममात्र रही
- हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट तक नहीं लगी
ये सभी नियम आम नागरिकों पर सख्ती से लागू होते हैं, लेकिन सरकारी तंत्र पर वही नियम ढीले पड़ जाते हैं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के सिद्धांतों को ठेस पहुंचाने वाला स्पष्ट उदाहरण है।
ताज़ा आदेश: अब बिना दस्तावेज कोई वाहन सरकारी कार्यालय में नहीं चलेगा
सरकार ने अब आदेश जारी किया है कि—
- बिना टेक्सी परमिट
- बिना बीमा
- बिना फिटनेस
- बिना वैध चालक बैच
कोई भी वाहन सरकारी कार्यालयों में नहीं लगाया जाएगा।
लेकिन यह आदेश अपने आप में पिछले 25 सालों की असफल व्यवस्था की पुष्टि कर देता है। यदि पहले से नियम थे, तब इनका पालन कराने में इतना लंबा समय क्यों लगा?
प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्न
यह मामला यह भी पूछता है—
1.ऑडिट में यह गड़बड़ी क्यों नहीं पकड़ी गई?
प्रत्येक विभाग का हर साल ऑडिट होता है।
अगर हजारों वाहन अवैध रूप से संचालित हो रहे थे, तो—
- क्या ऑडिट सतही तौर पर किया गया?
- क्या जानबूझकर अनदेखी की गई?
उत्तर जो भी हो, गलती तो हुई है।
2.क्या विभागीय अधिकारी जिम्मेदार नहीं हैं?
वाहन अनुबंध की राशि पाना वित्त विभाग का काम है।
वाहन वैधता जांचना परिवहन और पुलिस विभाग का।
फिर 25 साल तक किसने जिम्मेदारी निभाई?
3.क्या शासन में दोहरे मानदंड हैं?
आम नागरिक के निजी वाहन के लिए हर दस्तावेज़ अनिवार्य।
लेकिन सरकारी अनुबंधित वाहन बिना किसी वैधता के चल रहा है।
यह व्यावहारिक दोहरा मापदंड शासन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है।
वाहनों का खेल: निजी फायदों का आरोप
एक और गंभीर आरोप यह है कि—
- कई अधिकारी अपने मित्रों या रिश्तेदारों के नाम पर वाहन किश्तों पर खरीदते हैं
- फिर वही वाहन सरकारी कार्यालय में किराए पर लगा दिया जाता है
- उसकी किस्तें सरकारी भुगतान से भरती जाती हैं
- जैसे ही वाहन की किश्तें पूरी होती हैं, वह निजी उपयोग में चला जाता है
इस तरह के वाहनों की जांच अनिवार्य है।
चालकों की स्थिति–क्या बैच और परमिट थे?
अनुबंधित वाहनों में चालक रखने की जगह कई विभाग—
- अपने स्टाफ से ही वाहन चलवाते रहे
- क्योंकि वाहन टेक्सी परमिट के नहीं थे
- परिणामस्वरूप वैध चालक की अनिवार्यता भी गायब
यह स्थिति कानून के विपरीत है और दुर्घटना की स्थिति में गंभीर परिणाम दे सकती है।
सामाजिक और प्रशासनिक असर
1.सरकारी धन का दुरुपयोग
अनुबंधित वाहनों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं।
यदि वाहन ही वैध नहीं था, तो यह धन किस आधार पर जारी हुआ?
2.पारदर्शिता पर आघात
यह मामला दिखाता है कि सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही कितनी कमजोर है।
3.जनता का भरोसा प्रभावित
अवैध वाहन व्यवस्था का 25 साल तक जारी रहना आमजन में सरकारी तंत्र के प्रति अविश्वास पैदा करता है।
क्या विपक्ष ने कभी सवाल उठाया?
विपक्ष का मौन भी कई सवाल खड़ा करता है।
यदि हजारों अवैध वाहन सरकारी कार्यालयों में चल रहे थे, तो—
- किसी ने बड़ा सवाल क्यों नहीं उठाया?
- क्या विपक्ष भी इस व्यवस्था से अनजान था?
- या यह मुद्दा कभी प्राथमिकता ही नहीं बना?
जांच आवश्यक–लेकिन क्या होगी?
यदि सरकार सच में सुधार चाहती है, तो उसे—
- पिछले 25 सालों के अनुबंधों की जांच
- वाहन मालिकों की जांच
- विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही तय
- ऑडिट प्रक्रिया की समीक्षा
- अनुबंधित वाहनों के रिकॉर्ड की जांच
सब अनिवार्य करना होगा।
अन्यथा यह नया आदेश भी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि सरकार पारदर्शिता और सुशासन की दिशा में ठोस कदम उठाती है—
- विभागीय जवाबदेही बढ़ेगी
- भ्रष्टाचार में कमी आ सकती है
- अनियमितताओं पर रोक लगेगी
- जनता का विश्वास बढ़ेगा
परंतु यदि व्यवस्था पहले जैसी ही रही, तो यह सुधार भी mere paperwork बनकर रह जाएगा।
8️⃣ निष्कर्ष
पच्चीस वर्षों तक सरकारी कार्यालयों में अवैध अनुबंधित वाहनों का संचालन न केवल गंभीर प्रशासनिक चूक है, बल्कि शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गहरी चोट है। सरकार का हालिया आदेश सराहनीय है, लेकिन यह तभी सफल हो पाएगा जब पिछली गलतियों का ठोस विश्लेषण, जांच और जिम्मेदारी तय की जाए। नए नियम तभी प्रभावी साबित होंगे जब उन पर ईमानदारी और कठोरता से अमल किया जाए। अन्यथा यह निर्णय भी महज एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
लिमटी की लालटेन 739
. . . मतलब 25 सालों से सरकारी कार्यालयों में चल रहे थे अवैध अनुबंधित वाहन!
अब बिना वैध दस्तावेज कोई भी वाहन सरकारी कार्यालय में नहीं चलेगा! मतलब अभी तक चल रहे थे!
पच्चीस सालों से जारी है गड़बड़झाला, नियमों की अनदेखी और जवाबदेही का अभाव!
(लिमटी खरे)
कहा जाता है कि सरकार में बैठे जिम्मेदारों की कथित अनदेखी, लापरवाही, सुविधाओं, गैर जरूरी चीजों में पैसा उड़ाने के चलते लगभग चार दशक पहले से ही मध्य प्रदेश का खजाना धीरे धीरे खाली होता जा रहा था। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में सरकारी वाहनों को सफेद हाथी मानकर उन पर होने वाले खर्च को कम करने के उद्देश्य से वाहनों को किराए पर लेने की नीति बनाई गई। उस दौर में चुनिंदा विभाग के वाहनों को ही किराए पर लिए जाने के आदेश जारी किए गए थे। पर यह बिल्कुल स्पष्ट था कि जब भी वाहन किराए पर लिया जाएगा, वह टेक्सी कोटे में पंजीकृत, वैध बीमा होना, परिवहन कर अदा होना, फिटनेस, पीयूसी आदि का होना जरूरी था। वित्त विभाग के वर्ष 2006 के एक परिपत्र से इसकी पुष्टि की जा सकती है।
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लगभग पच्चीस साल से यह व्यवस्था पूरी तरह कागजों पर ही दिखाई देती रही। व्यवहारिक तौर पर इसकी अनदेखी ही होती रहीै। लगभग 25 सालों बाद सरकार को इसकी सुध आई और हाल ही में एक आदेश जारी किया गया है कि अब बिना वैध दस्तावेज के सरकारी कार्यालयों में वाहन नहीं चल सकेंगे। इसके लिए बीमा फिटनेस और परमिट आदि की अनिवार्यता रखी गई है। यह आदेश अपने आप में यह साबित करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है कि लगभग 25 सालों से यह व्यवस्था पूरी तरह असफल ही रही है।
यक्ष प्रश्न यही है कि जब वित्त विभाग और परिवहन विभाग के द्वारा नियम पहले से ही तय किए गए थे तो उनके पालन हेतु 25 सालों का समय क्यों लग गया! वित्त विभाग का मूल दायित्व है कि वह अनुबंधित वाहन के लिए राशि जारी करते समय इन शर्तों को देखे, परिवहन और पुलिस विभाग का दायित्व है कि वह अवैध वाहनों के संचालन पर रोक लगाए। अगर आपका निजी वाहन है तो आपको न जाने कितने कागज दिखाने होते हैं, पर अगर वही वाहन अनुबंधित है और टेक्सी कोटे में नहीं है तब भी आप मीर बनकर सड़कों का सीना रौंद सकते हैं। किराए के वाहनों में टेक्सी परमिट की अनिवार्यता है और यह परमिट एक वैध चालक के रहने पर ही मिलता है, चालक को बाकायदा एक बैच दिया जाता है, आज कितने अनुबंधित वाहनों में चालक अपने गणवेश में रहते हैं और बैच धारित किए हुए होते हैं। आप पाएंगे कि अनुबंधित वाहनों की नंबर प्लेट भी टेक्सी कोटे वाली काली पीली के बजाए निजि वाहनों की तरह ही होती है। और तो और इन वाहनों पर हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट तक नहीं होती है।
हर विभाग का हर साल आडिट होता है। क्या आडिट के दौरान यह अनियमितता नहीं पकड़ी गई! क्या जानबूझकर इसकी अनदेखी की गई! या सतही तौर पर आडिट की रस्म अदायगी की गई। जो भी हो गलति तो हुई है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है और इन गलतियों से पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर प्रश्नचिन्ह लगना लाजिमी है।
यह स्थिति यह भी दर्शाती है कि शासन में नियमों का पालन आम नागरिकों से तो सख्ती से कराया जाता है, परंतु जब वही नियम शासकीय तंत्र पर लागू होते हैं, तो वे लचीले हो जाते हैं। यह दोहरा मापदंड लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा के विपरीत है।
सरकार द्वारा अब जारी किया गया आदेश स्वागतयोग्य है, लेकिन इसे सुधार कहना तभी उचित होगा जब इसके साथ पिछली विफलताओं की जिम्मेदारी भी तय की जाए। जिन विभागों ने अनुबंध किए, जिन अधिकारियों ने सत्यापन नहीं किया, जिन एजेंसियों ने नियमों की अनदेखी की, उन सभी की भूमिका की जांच होनी चाहिए। अन्यथा यह सुधार भी केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
एक अनुमान के अनुसार हजारों की तादाद में आज निजि वाहन अनुबंध पर सरकारी कार्यालयों में चल रहे हैं। आरोप तो यहां तक भी हैं कि अधिकारियों के द्वारा अपने मित्रों, रिश्तेदारों आदि के नाम पर वाहन किश्तों पर खरीद लिया जाता है और उसके बाद उसे अनुबंध पर अपने ही कार्यालय में लगा दिया जाता है। इसके बाद उसकी किश्तें सरकार से भरवाकर जैसे ही किश्तें पूरी होती हैं, वह वाहन उनके घर की शोभा बढ़ाता नजर आता है। इस तरह के वाहनों की भी जांच की जाना चाहिए कि जो वाहन सरकारी कार्यालय में संलग्न थे वे वहां से हटने के बाद कहां चल रहे हैं और किसके नाम पर पंजीकृत हैं।
इसके अलावा जो वाहन अब तक अनुबंधित थे, उनके चालकों के पास वैध बैच था या नहीं, क्योंकि आरोप तो यह भी है कि चूंकि वाहन को अनुबंधित तो कर लिया जाता है पर वे टेक्सी परमिट के नहीं होते हैं इसलिए उस विभाग के चालकों से ही वाहन चलवाकर वाहन चालक का वेतन भी बचा लिया जाता है।
अंततः यह मामला केवल वाहनों के दस्तावेजों का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का है। जब पच्चीस वर्षों तक एक स्पष्ट अवैध व्यवस्था चलती रही और किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो दोष केवल निजी एजेंसियों का नहीं बल्कि पूरे सरकारी तंत्र का है। यदि सरकार सच में सुशासन की ओर बढ़ना चाहती है, तो उसे केवल नए आदेश जारी नहीं करने चाहिए, बल्कि पुरानी गलतियों का लेखा-जोखा भी सार्वजनिक करना चाहिए। तभी यह सुधार विश्वसनीय और टिकाऊ बन सकेगा।
यह सरकारी फरमान तो जारी कर दिया गया है पर इस आदेश का कितनी ईमानदारी से इसका पालन हो पाएगा इस पर संशय बरकरार ही है, क्योंकि सरकारी आदेश जारी होने के बाद उस पर अमल हो रहा है अथवा नहीं, यह देखने सुनने की फुर्सत किसी को भी नहीं रहती है। यहां तक कि विपक्ष भी इस तरह के मामलों में अपना मौन नहीं तोड़ता अथवा तोड़ना नहीं चाहता यह जुदा बात ही है। बहरहाल इस तरह की सरकारी पहल का स्वागत किया जाना चाहिए पर यह कारगर या स्वागतयोग्य तभी होगा जब इस पर ईमानदारी से अमल हो पाएगा . . .
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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

43 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. दिल्ली, मुंबई, नागपुर, सिवनी, भोपाल, रायपुर, इंदौर, जबलपुर, रीवा आदि विभिन्न शहरों में विभिन्न मीडिया संस्थानों में लम्बे समय तक काम करने का अनुभव, वर्तमान में 2008 से लगातार “समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया” के ‘संस्थापक संपादक’ हैं. 2002 से लगातार ही अधिमान्य पत्रकार (Accredited Journalist) हैं एवं नई दिल्ली में लगभग एक दशक से अधिक समय तक पत्रकारिता के दौरान भी अधिमान्य पत्रकार रहे हैं.
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