भारत की गली-मोहल्लों में कॉमेडी किसी स्टेज की मोहताज नहीं होती।
यहाँ रोज़मर्रा की छोटी-छोटी घटनाएँ ही सबसे बड़े जोक्स बन जाती हैं।
जैसे उस दिन… जब कुछ बच्चे सड़क पर अपने पटाखे जलाने में व्यस्त थे।
एक बच्चे ने जैसे ही पटाखे में चिंगारी लगाई, सामने से एक आंटी आती दिखीं।
बच्चों की टोली घबरा गई और एक सुर में चिल्लाने लगी—
“आंटी पटाखा है…आंटी पटाखा है…आंटी पटाखा है!”
आंटी रुकीं, मुस्कराईं और बड़े ठंडे दिमाग से बोलीं—
“नहीं रे पगलो,अब पहले जैसी बात कहाँ!”
बस फिर क्या, बच्चों के साथ-साथ आसपास खड़े लोग भी हँसी नहीं रोक पाए। 😄
यही तो देसी हास्य है—न कोई तैयारी, न कोई स्क्रिप्ट… सीधा दिल से!
घर पहुँचे तो वही किस्सा शुरू—
पति-पत्नी जोक:
पत्नी: आज गली में इतनी हँसी क्यों थी?
पति: पटाखे कम और डायलॉग ज़्यादा फूट रहे थे।
दोस्तों के बीच चर्चा और तेज़—
दोस्त-दोस्त जोक:
दोस्त1: भाई, आज का सबसे बड़ा पटाखा कौन था?
दोस्त2: आवाज़ वाला नहीं, जवाब वाला!
स्कूल में भी बच्चों की क्रिएटिविटी कम नहीं—
टीचर-स्टूडेंट जोक:
टीचर: शोर क्यों कर रहे हो?
स्टूडेंट: सर, सिलेबस नहीं… पटाखे जल रहे हैं!
ऑफिस में त्योहारी मूड—
बॉस-कर्मचारी जोक:
बॉस: आज काम पर ध्यान क्यों नहीं?
कर्मचारी: सर, दिमाग अभी भी गली में अटका है।
देसी जोक्स की कुछ खास बातें:
- मासूम शरारत, बिना बुरी नीयत
- जवाब छोटा, असर बड़ा
- गली का माहौल, दिल से निकली हँसी
- हर उम्र के लिए फैमिली-फ्रेंडली मज़ा
यही वजह है कि ऐसे किस्से वायरल हो जाते हैं और हर चेहरे पर मुस्कान छोड़ जाते हैं।
- Conclusion (निष्कर्ष)
निष्कर्ष यही है कि हँसी के लिए बड़े मंच नहीं, देसी मौके काफी होते हैं।
और याद रखिए—
पटाखे तो एक पल में बुझ जाते हैं,लेकिन मजेदार जवाब देर तक गूंजते हैं!😂
कुछ बच्चे सड़क पर अपने पटाखे जला रहे थे..
अभी एक पटाखे में चिंगारी लगाई ही थी की सामने से एक आंटी आती दिखी . .
सब चिल्लाने लगे . . .
आंटी पटाखा है . . .
आंटी पटाखा है . . .
आंटी पटाखा है . . .
आंटी मुस्कराई और बोली :
नहीं रे पगलो,अब पहले जैसी बात कहां!
(साई फीचर्स)

लंबे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं प्रीति भोसले, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली आदि में पत्रकारिता करने के साथ ही समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से जुड़ी हुई हैं, प्रीति भोसले ….
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