मध्यप्रदेश में मातृ–शिशु स्वास्थ्य क्रांति : गर्भवती माताओं का पंजीयन और टेलीमेडिसिन मॉडल पर राज्य सरकार का जोर

उप मुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने कहा है कि राज्य सरकार का लक्ष्य हर नागरिक को समय पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराना है। मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए गर्भवती माताओं का पंजीयन शत प्रतिशत सुनिश्चित करने, टेलीमेडिसिन को लोकप्रिय बनाने, एवं स्वास्थ्य-केन्द्रों में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने पर बल दिया गया। संक्षिप्त में, घर-घर सम्पर्क, पंजीयन, सुविधा पहुँच, चिकित्सकीय देख-रेख, यही फोकस है।

(ब्यूरो कार्यालय)

रीवा (साई)।उप मुख्यमंत्री एवं प्रभारी मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने रीवा विराट सभागार में आयोजित स्वास्थ्य समीक्षा बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए कि प्रदेश के प्रत्येक नागरिक को समय पर, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा मिले। इस दिशा में विशेष रूप से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाना सरकार की प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी तथा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की दिशा में निरंतर प्रयास जारी हैं।

मूल चुनौतियाँ : मातृ-शिशु स्वास्थ्य पर नजर

राज्य की स्वास्थ्य तस्वीर में सुधार हुआ है — लेकिन अभी बहुत-कुछ किया जाना बाकी है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश की मातृ मृत्यु दर (MMR) 159 प्रति 1 लाख जीवित प्रसव तक पहुँच चुकी है, जो देश में सर्वाधिक है।
इसी तरह, शिशु मृत्यु दर व नवजन्मशोक (Infant Mortality Rate, IMR) भी राष्ट्रीय औसत से ऊपर बनी हुई है।
इन आंकड़ों के पीछे कई कारण काम कर रहे हैं: गर्भवती महिलाओं का पंजीयन कम होना, समय- पर जांच न होना, आपात प्रसव देखभाल (emergency obstetric care) की कमी, ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य-संरचना का असम-वितरण।
इसीलिए, राज्य सरकार ने अब ‘पंजीयन-घर-घर सम्पर्क’, ‘टेलीमेडिसिन’, और स्वास्थ्य-केन्द्रों के साधनों को मजबूत करने जैसे उपायों पर विशेष बल देने का निर्णय लिया है।

मुख्य उपाय और दिशा-निर्देश

  1. गर्भवती माताओं का पंजीयन शत-प्रतिशत सुनिश्चित करना

उप मुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने कहा कि मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए सबसे पहला कदम है कि गर्भवती माताओं का पंजीयन शत-प्रतिशत सुनिश्चित हो।
उसने संकेत दिया कि आम-गांव तक पहुंचने में घर-घर संपर्क की भूमिका अहम है। विशेष रूप से, ASHA Worker एवं मोबिलाइज़र को हर मां-बेबी तक पहुँच तय करनी होगी।
इसके अंतर्गत मदर-चाइल्ड सुरक्षा कार्ड जारी करना, चार गर्भपरीक्षण (ANC) अनिवार्य रूप से कराना, हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान करना तथा उन्हें महीने के 9 व 25 तारीख को विशेषज्ञ चिकित्सक से देखना शामिल है।
उप मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल तथा आवश्यकतानुसार अशासकीय चिकित्सकों की मदद ली जाए।

  1. टेलीमेडिसिन सेवा को लोकप्रिय बनाना

राज्य सरकार ने यह भी निर्देश दिए कि टेलीमेडिसिन सेवा का व्यापक उपयोग किया जाए। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) एवं उप स्वास्थ्य केंद्रों (UPHCs) से मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पतालों के चिकित्सकों से टेली-कन्सल्टेशन संभव किया जाए।
ग्राम-पंचायत और जनभागीदारी स्तर पर इस सेवा का प्रचार-प्रसार किया जाए ताकि ग्रामीण इलाकों में भी टेलीमेडिसिन की सुविधा आम-जन तक पहुंचे।
इस रणनीति से दो-मुख्य लाभ हैं: (1) विशेषज्ञ की कमी वाले क्षेत्रों में तुरंत सलाह मिल सकेगी, (2) महिलाओं को घर से दूर-दराज अस्पतालों तक जाने की आवश्यकता कम होगी।

  1. स्वास्थ्य-केन्द्रों में सुविधाओं का लाभ आम जनमानस तक पहुँचाना

उप मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य संस्थाओं में जो सुविधाएँ उपलब्ध हैं, उनका लाभ आम जनमानस को मिलना चाहिए। इसके लिए शासन द्वारा आउटसोर्स कर्मचारियों की पूर्ति के नियम सरल किए गए हैं; भर्ती-प्रक्रिया तेजी से पूरी होनी चाहिए।
चिकित्सक एवं स्टाफ को मरीजों के प्रति संवेदनशील व्यवहार के साथ समय का पालन करना होगा। इमरजेंसी कक्ष में डॉक्टर एवं पैरामेडिकल स्टाफ की सतत उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी।
बैठक में निर्माणाधीन स्वास्थ्य-प्रकल्पों की समीक्षा की गई और निर्माण एजेंसी को समय-सीमा सहित कार्य पूरा करने के निर्देश दिए गए।

प्रभाव और अपेक्षित लाभ

इन पहलों से निम्नलिखित सकारात्मक परिणाम अपेक्षित हैं:

  • गर्भवती माताओं का समय पर पंजीयन एवं देखभाल → गर्भावस्था के दौरान जटिलताओं में कमी, प्रसव के बाद बेहतर मॉनिटरिंग।
  • टेलीमेडिसिन के माध्यम से विशेषज्ञ सलाह का विस्तार → दूरदराज व ग्रामीण इलाकों में विशेषज्ञ-क्षमता पहुँचाना, मरीजों के समय-बचत व यात्रा-चिंता में कमी।
  • स्वास्थ्य-सुविधाओं का अधिकतम उपयोग → अस्पतालों व केंद्रों में संसाधनों का बेहतर उपयोग, स्वास्थ्य-सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार।
  • मृत्यु दरों में कमी → जब अधिक महिलाओं तक सेवाएँ पहुँचेंगी, गर्भकालीन जटिलताओं का समय-पर इलाज होगा, तो माँ-शिशु मृत्यु दर में निरंतर कमी आ सकती है।
    इसके अतिरिक्त, चिकित्सक एवं स्वास्थ्य-कर्मी समाज में सेवा-भावना के साथ कार्य करेंगे, जिससे रोगियों का भरोसा बढ़ेगा और स्वास्थ्य-प्रणाली तक पहुंच बेहतर होगी।

चुनौतियाँ और आगे की राह

हालाँकि दिशा-निर्देश स्पष्ट हैं, लेकिन वास्तविकता में कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं:

  • ग्रामीण व आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य-संरचना की कमी व प्रशिक्षण का अभाव।
  • गर्भवती महिलाओं का समय-पर पंजीयन न कराना या चार ANC जांचें न कराना।
  • विशेषज्ञ चिकित्सक व आपात प्रसव देखभाल की कमी; अस्पतालों में संसाधनों का अपर्याप्त होना।
  • सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक बाधाएँ; महिलाओं तक जानकारी व सेवा पहुँच न होना।
  • टेलीमेडिसिन मॉडल को ग्राम-स्तर पर लागू करना तथा ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं (इंटरनेट, बिजली, उपकरण) का अभाव।
    इन चुनौतियों का सामना करने के लिए सरकार, स्वास्थ्य विभाग तथा स्थानीय प्रतिनिधियों के समन्वित प्रयास जरूरी होंगे। आशा-कार्यकर्ता, ग्राम-पंचायत, जन-संगठन और स्वास्थ्य-कर्मियों को मिलकर काम करना होगा।

गृहकार्य-सूची (Check-List)

  • प्रत्येक गर्भवती महिला का पंजीयन करें।
  • उसे मदर-चाइल्ड सुरक्षा कार्ड जारी करें।
  • सभी चार गर्भ जांच (ANC) सुनिश्चित करें।
  • हाई-रिस्क गर्भवती को चिन्हित कर महीने के 9 व 25 तारीख को विशेषज्ञ देखभाल सुनिश्चित करें।
  • टेलीमेडिसिन से विशेषज्ञ सलाह उपलब्ध कराएं।
  • स्वास्थ्य-केंद्रों व अस्पतालों की सुविधाओं का निरंतर निरीक्षण करें।
  • चिकित्सक एवं स्टाफ को सेवा-भावना व समय-पालन के प्रति प्रेरित करें।
  • ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में जानकारी-प्रसार (IEC) अभियान चलाएं।
  • हेल्थ-डाटा ट्रैकिंग व मॉनिटरिंग करें, ताकि mortality & morbidity में गिरावट दिख सके।

स्थिति की ताज़ा तस्वीर

  • मध्यप्रदेश की MMR = 159 प्रति 1 लाख जीवित प्रसव (2020-22) और अभी भी भारत में सबसे अधिक।
  • प्रदेश में बच्चों की मृत्यु दर (IMR) भी 40 प्रति 1 000 से ऊपर रही है।
    ये आंकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि स्वास्थ्य-प्रणाली को और बेहतर बनाने की जरूरत है। यही कारण है कि आज घोषित दिशा-निर्देश समसामयिक और महत्वपूर्ण हैं।

सफलता के गुण और वक्त की मांग

आज के दौर में, सिर्फ नीति-निर्देश देना पर्याप्त नहीं है; उनकी अनुपालन-प्रक्रिया, संसाधनों की उपलब्धता, मॉनिटरिंग, और स्थानीय सहभागिता भी निर्णायक होंगे। यदि एक-एक गाँव, एक-एक महिला तक पहुँच सुनिश्चित की जाए, तो परिणाम रूप में मातृ-शिशु मृत्यु दर में वास्तविक कमी दिख सकती है।
टेलीमेडिसिन जैसे आधुनिक माध्यम से विशेषज्ञ सलाह सीधे ग्रामीण स्वास्थ्य-केन्द्र से संलग्न हो सकती है — यह एक बदलाव का मॉडल बन सकता है। साथ ही, चिकित्सक एवं स्वास्थ्य-कर्मी को सेवा-भाव के साथ संवेदनशीलता से कार्य करना होगा क्योंकि उप मुख्यमंत्री ने कहा: चिकित्सक को समाज भगवान के रूप में देखती है,चिकित्सक भी उसी अनुरूप जनसेवा में जुटें।
इस नजरिए से देखा जाए, तो यह केवल स्वास्थ्य अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का अवसर है। जब स्वास्थ्य-सेवा तक पहुँच आसान हो जाएगी, जागरूकता बढ़ेगी, तब असमय मृत्यु दर में गिरावट संभव है।

निष्कर्ष

आज की बैठक से यह स्पष्ट हुआ कि मध्यप्रदेश सरकार ने मातृ-शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में ठोस कदम उठाने का संकल्प लिया है। गर्भवती महिलाओं का पंजीयन शत-प्रतिशत सुनिश्चित करना, टेलीमेडिसिन सेवा को लोकप्रिय बनाना और स्वास्थ्य-केन्द्रों की सुविधाओं का लाभ आम जनमानस तक पहुँचाना — ये तीन हेरीओ रूप में सामने हैं।
यदि आशा-कार्यकर्ता घर-घर सम्पर्क कर गर्भवती माताओं का करायें पंजीयन, यदि टेलीमेडिसिन मॉडल गाँव-गाँव तक पहुंचे, यदि स्वास्थ्य-केन्द्रों में मौजूद सुविधाओं का उपयोग सही तरीके से हो, तो मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में निश्चित रूप से कमी आएगी।
उप मुख्यमंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल के दिशा-निर्देश इस दिशा में एक मजबूत शुरुआत हैं। लेकिन असली परिवर्तन तब होगा जब हर महिला, हर माता-बेबी, हर गाँव-समुदाय तक यह पहुंच सुनिश्चित हो जाए।

चलो,इस अभियान को बदलते स्वास्थ्य-परिदृश्य की दिशा में मिलकर आगे बढ़ाएंभविष्य का हर नया जीवन सुरक्षित,स्वस्थ और सशक्त होगी।