सिवनी पुलिस हवाला कांड: जब वर्दी पर लगा हवाला रकम हड़पने का आरोप, उजागर हुआ एक करोड़ 45 लाख का रहस्य

मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में पहली बार ऐसा मामला सामने आया है जब खुद पुलिस पर हवाला की रकम हड़पने के आरोप लगे हैं। एसडीओपी पूजा पांडे और बंडोल थाना प्रभारी अर्पित भैरम के खिलाफ कार्रवाई के बाद पुलिस विभाग और जनता दोनों में हलचल मची हुई है। सवाल यह है कि वर्दी में छिपे कौन हैं जो कानून के नाम पर हवाला का खेल खेल रहे थे?

सिवनी के इतिहास में पहली बारपुलिससे हवाला की रकम की जप्त कीपुलिसने!

एसडीओपी पूजा पाण्डे व बंडोल थाना प्रभारी अर्पित भैरम द्वारा प्रस्तुत करने पर जप्त हुई एक करोड़45 लाख रूपए की रकम

(लिमटी खरे)

प्रदेश के संभवतः सबसे पिछड़े जिले सिवनी के इतिहास में पहली बार इस तरह की घटना घटी है कि सिवनी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर जमकर उछला है। सोशल मीडिया पर लोगों के द्वारा जिस घटना को पुलिस की डकैती निरूपित किया जा रहा है वह वास्तव में कठोर कार्यवाही के योग्य है, इसकी सिर्फ निंदा करने से काम नहीं चलने वाला।

पुलिस सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताई जानकारी के अनुसार जो कहानी सामने आ रही है उसके मुताबिक (इस पूरे घटनाक्रम अथवा कहानी का आधार सूत्रों के द्वारा दी गई जानकारी ही है) पूरा घटनाक्रम कटनी और नागपुर के बीच का है। कटनी से क्रिकेट सट्टे के ऑनलाईन बुकी विक्की नामक व्यक्ति के हवाला के दो करोड़ 96 लाख 50 हजार रूपए लेकर सोहन परमार नामक व्यक्ति अपने तीन चार साथियों के साथ 08 व 09 अक्टूबर की दर्मयानी रात अपनी कार क्रमांक एमएच 13 ईके 3430 में सवार होकर रात एक से दो बजे के बीच सिवनी से होकर गुजरता है।

इसी बीच इस बात की टिप या तो बण्डोल थाना प्रभारी अर्पित भैरम अथवा अनुविभागीय अधिकारी पुलिस सिवनी पूजा पाण्डेय को लगती है और उनके द्वारा सिवनी से नागपुर की ओर सीलादेही के पास इस कार को रोका जाता है। इसके बाद कार को अंदर जंगल की ओर ले जाया जाता है और वहां सोहन परमार व पुलिस के बीच कुछ डील होती है।

इस डील में सोहन परमार के पास रखी पूरी रकम पुलिस के अधिकारियों द्वारा अपने कब्जे में ले ली जाती है और इसी बीच वहां एक महिला अधिकारी के द्वारा किसी से फोन पर बात भी की जाती है, जिसे वे सर कहकर संबोधित करती है। इसके उपरांत सोहन परमार व उसके साथियों के साथ मारपीट कर उन्हें मौके से भगा दिया जाता है।

सोहन परमार के द्वारा नागपुर पहुंचने पर जिसे दो करोड़ 96 लाख 50 हजार रूपए की डिलेवरी देना था उसे पूरा घटनाक्रम बताया जाता है, जिस पर वहां मौजूद व्यक्ति जिसे डिलेवरी लेना था वह सोहन परमार को उल्टे पैर वापस सिवनी जाकर या तो पैसा वापस लाने या पुलिस में डकैती की शिकायत दर्ज कराने की बात कड़ाई से कही जाती है।

सोहन परमार वापस सिवनी लौटता है और कोतवाली पहुंचकर उसके द्वारा वहां मौजूद अफसर से कहा जाता है कि बीति रात उसके साथ तीन करोड़ की लूट की गई है। लूट करने वाले पुलिस की वर्दी में थे और उनका नेतृत्व एक महिला कर रही थी जिसके कंधे पर तीन सितारे थे। उक्त अधिकारी के द्वारा तत्काल ही सिवनी एसडीओपी पूजा पाण्डेय की फोटो उसे दिखाई जाती है, जिसको देखकर सोहन परमार उनकी पहचान कर लेता है। उक्त अधिकारी के द्वारा इस बात की जानकारी अपने अधिकारी को दी जाती है और अंत में उसे एसडीओपी पूजा पाण्डेय के कार्यालय भेज दिया जाता है।

इसके बाद एसडीओपी कार्यालय में सोहन परमार और महिला अधिकारी के बीच डीलिंग होती है और कथित तौर पर जप्त की गई रकम में से एक करोड़ 45 लाख रूपए निकाले जाकर शेष लगभग एक करोड़ पचास लाख 50 हजार रूपए की राशि उसे सौंप दी जाती है। वह उसे लेकर वहां से रवाना होता है पर वह वापस लौटकर पूरी राशि की मांग करने लगता है।

इसी बीच यह बात मीडिया के बीच में लीक हो जाती है और दोपहर लगभग दो बजे से ही मीडिया के सक्रिय पत्रकारों के द्वारा सिवनी शहर में शुक्रवारी स्थिति एसडीओपी कार्यालय में डेरा डाल दिया जाता है। पत्रकारों के द्वारा जब एसडीओपी सिवनी पूजा पाण्डेय से इस बारे में पूछताछ की जाती है तो उनके द्वारा इस तरह की किसी घटना के घटने से ही इंकार कर दिया जाता है।

वहीं, किसी पत्रकार के द्वारा इसकी जानकारी उप पुलिस महानिरीक्षक छिंदवाड़ा राकेश कुमार सिंह को दी जाती है। उनके द्वारा जब सिवनी के वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब तलब किया जाता है तो किसी भी अधिकारी को कुछ जानकारी न होने पर उनके द्वारा अनिभिज्ञता प्रकट किए जाने के बाद डीआईजी के द्वारा तत्काल कार्यवाही करने के निर्देश दिए जाने के बाद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक दीपक मिश्रा उसी वक्त एसडीओपी कार्यालय में जाकर डेरा डाल देते हैं। एसडीओपी कार्यालय में फरियादी भी मौजूद थे और पुलिस अधिकारी भी।

जैसे जैसे यह खबर सोशल मीडिया की सुर्खियां बनती है वैसे वैसे भोपाल स्थित पुलिस मुख्यालय में भी सरगर्मियां बढ़ जाती हैं। भोपाल के वरिष्ठ पत्रकारों के द्वारा पुलिस मुख्यालय के आला अधिकारियों से इस बारे में जानकारी हासिल करना आरंभ कर दिया जाता है, वहीं पुलिस के गुप्तचर सूत्र सक्रिय होते हैं और वास्तविक जानकारी जैसे ही पुलिस महानिरीक्षक जबलपुर जोन प्रमोद वर्मा के पास पहुंचती है उनके द्वारा तत्काल ही एसडीओपी कार्यालय एवं बंडोल थाना प्रभारी सहित कुछ कर्मचारियों को निलंबित कर दिया जाता है। इसकी जांच जबलपुर के अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक को सौंप दी जाती है। वे देर रात तक जांच करते हैं और वास्तविक तथ्यों को लेकर पुलिस महानिरीक्षक केे समक्ष रख देते हैं।

यह था ब्रहस्पतिवार का घटनाक्रम, शुक्रवार को जब मीडिया में सिवनी की पुलिस की इस कथित डकैती की खबरें स्थान पाती हैं, उसके बाद पुलिस मुख्यालय से अनुविभागीय अधिकारी पुलिस पूजा पाण्डेय का निलंबन आदेश जारी कर दिया जाता है। शुक्रवार को दोपहर तक न तो हवाला की रकम का ही अता पता था और न ही कहीं मामला ही कायम हो पाया था।

शाम होते होते समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को एक जानकारी मिलती है जिसमें 09 अक्टूबर को नगर पुलिस अधीक्षक पूजा पाण्डेय और उप निरीक्षक एवं बण्डोल थाना प्रभारी अर्पित भैरम के द्वारा एक बोरी में टेप से लिपटे हुए 29 बण्डल जिसमें प्रत्येक में पांच पांच सौ के नोट की दस गड्डियां इस पर एक बंडल में पांच लाख रूपए, कुल 29 बण्डल में एक करोड 45 लाख रूपए हैं। प्लास्टिक की बोरी में 05 रूपए की सिक्का से सील कर थाना कोतवाली के मालखाने में सुरक्षित रखा जाता है जो कि सीएसपी कार्यलय सिवनी से सीएसपी पूजा पाण्डेय और उप निरीक्षक अर्पित भैरम के द्वारा प्रस्तुत किए जाने पर प्राप्त किए गए हैं का उल्लेख किया गया है।

इस पूरे घटनाक्रम में विभाग में यह चर्चा भी जोरों पर है कि यह पहला मामला नहीं था जबकि इस तरह की कार्यवाही की गई हो, इसके पहले भी इस तरह की कार्यवाही को अंजाम दिया जाता रहा है, किन्तु यह पहली बार ही था जबकि मामला उजागर हुआ है। इस मामले के उजागर होने के बाद अब अन्य पीड़ित भी सामने आने लगें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

यह तो था सूत्रों के द्वारा दिए गए टिप्स पर संभावित घटनाक्रम, अब यक्ष प्रश्न जो खड़े हुए हैं उनके अनुसार

1. एसडीओपी सिवनी पूजा पाण्डेय के द्वारा अगर वाहन चेकिंग शीलादेही में लगाई गई थी, तो अपना थाना क्षेत्र छोड़कर बण्डोल थाना प्रभारी अर्पित भैरम वहां क्या कर रहे थे! वे कितनी देर उपस्थित रहे यह उनके एवं उनके मातहतों के जो उनके साथ रहे होंगे के उस वक्त के मोबाईल लोकेशन से दरयाफ्त किया जा सकता है।

2. पुलिस के द्वारा छोटी मोटी चोरी, सट्टा आदि पकड़े जाने पर प्रेस विर्ज्ञिप्त जारी कर वाहवाही बटोरी जाती है एवं बड़ी घटनाओं में सफलता हासिल किए जाने पर पत्रकार वार्ता ली जाती है, पर इस मामले में अब तक पुलिस पूरी तरह मौन ही नजर क्यों आ रही है!

3. दो करोड़ 96 लाख रूपए अगर सोहन परमार कटनी से लेकर आ रहा था और महाराष्ट्र जा रहा था, तो यह पैसा कटनी में किसका था और महाराष्ट्र में किसे देना था!

4. 08 व 09 अक्टूबर की दर्मयानी रात लगभग 01 से 02 बजे के बीच अगर एसडीओपी सिवनी ने इतनी बड़ी रकम जप्त की तो उसकी जानकारी अपने अधिकारियों से क्यों छिपाई और मीडिया के द्वारा जानकारी चाहने पर इस तरह के घटनाक्रम से इंकार क्यों किया!

5. घटनास्थल शीलादेही, जिस भी थानांतर्गत आता है, उसके थाना प्रभारी को मौके पर बुलाने के बजाए मौके पर घटनास्थल से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित बण्डोल के थाना प्रभारी की उपस्थिति क्या दर्शाती है!

6. सोहन परमार अगर 09 अक्टूबर को कोतवाली पहुंचा और उसने पुलिस की वर्दी में लूट की बात बताई तो यह बात कोतवाली पुलिस के द्वारा अपने उच्चाधिकारियों मसलन पुलिस अधीक्षक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को तत्काल क्यों नहीं बताई गई।

7. सोहन परमार को अगर वाहन चेकिंग के दौरान एसडीओपी ने शीलादेही में पकड़ा तो उसके बाद उसके वाहन और मोबाईल की लोकेशन चेक की जाना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि उसका वाहन खवासा और मनसर टोल से आगे गया है कि नहीं, और अगर गया है तो उसे छोड़ क्यों दिया गया।

8. एसडीओपी सिवनी के द्वारा जप्त की गई रकम 02 करोड़ 96 लाख 50 हजार रूपए अथवा एक करोड़ 45 लाख रूपए जो भी सही हो, को चौबीस घंटों तक कहां और क्यों रखा गया!

🧩 जब पुलिस ही सवालों के घेरे में आई

मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में 9 अक्टूबर 2025 की रात कुछ ऐसा हुआ जिसने न केवल स्थानीय पुलिस बल्कि पूरे राज्य के पुलिस महकमे की साख को हिला दिया।
जहाँ एक ओर पुलिस अपराध रोकने का दावा करती है, वहीं इस बार आरोप उन्हीं पर है कि उन्होंने हवाला की करोड़ों की रकम “बरामद” करने के बाद अपने कब्जे में रख ली।

यह मामला इतना गंभीर है कि इसे सिवनी पुलिस के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला कहा जा रहा है।
इसमें शामिल हैं — एसडीओपी पूजा पांडे (नगर पुलिस अधीक्षक सिवनी) और बंडोल थाना प्रभारी अर्पित भैरम, जिन पर हवाला रकम की कथित हेराफेरी का आरोप है।

🕵️‍♀️ घटनाक्रम की पृष्ठभूमि: एक रात,एक कार और दो करोड़96लाख की हवाला राशि

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, 8 और 9 अक्टूबर की दरम्यानी रात कटनी से एक कार क्रमांक MH 13 EK 3430 सिवनी से होकर नागपुर की ओर जा रही थी।
कार में सवार था सोहन परमार, जिसके पास कथित तौर पर ₹2.96करोड़ की हवाला रकम थी — यह रकम क्रिकेट सट्टेबाज़ी से जुड़ी बताई जा रही है।

रात लगभग 1:30 बजे के आसपास सिवनी जिले के सीलादेही क्षेत्र में पुलिस ने इस कार को रोक लिया।
सूत्र बताते हैं कि यह कार्रवाई “टिप” मिलने के बाद की गई, और मौके पर एसडीओपी पूजा पांडेथाना प्रभारी अर्पित भैरम स्वयं पहुंचे।

⚠️ कहानी का मोड़: जंगल के अंदर की डील

जानकारी के अनुसार, कार को रोकने के बाद पुलिस टीम ने वाहन को सड़क से हटाकर जंगल के भीतर ले जाया।
यहीं कथित रूप से डील हुई — हवाला की रकम का बड़ा हिस्सा पुलिस के कब्जे में ले लिया गया और कार सवारों को “छोड़” दिया गया।

सूत्र बताते हैं कि मौके पर एक महिला अधिकारी (संभवत: एसडीओपी) ने किसी “सर” से फोन पर बात की, जिसके बाद कार्रवाई का रुख बदल गया।
यह घटना एक सामान्य वाहन चेकिंग की नहीं, बल्कि रात के अंधेरे में हुई आर्थिक सौदेबाज़ी की तरह दिखी।

📞 नागपुर पहुंचकर खुलासा:वर्दी वाले लुटेरेका आरोप

रात का यह रहस्य तब खुला जब हवाला रकम लेकर जा रहा व्यक्ति सोहन परमार नागपुर पहुंचा।
वहाँ उसने अपने “क्लाइंट” को बताया कि रकम पुलिस ने छीन ली।
क्लाइंट ने उसे तुरंत सिवनी लौटकर या तो रकम वापस लाने या “डकैती की रिपोर्ट” दर्ज कराने का निर्देश दिया।

परमार वापस सिवनी पहुँचा और कोतवाली थाने में बयान दिया —

“रात को पुलिस की वर्दी में कुछ लोगों ने हमारी गाड़ी रोकी, महिला अधिकारी ने नेतृत्व किया और करीब तीन करोड़ रुपये लूट लिए।”

जब पुलिस अधिकारियों ने उससे पूछताछ की, तो उसने एसडीओपी पूजा पांडे की तस्वीर देखकर पहचान की पुष्टि कर दी।

🧾 अंदर की हलचल: ऊपर तक पहुँची खबर

शुरुआत में सिवनी पुलिस ने मामले को “नकार” दिया।
परंतु जब जानकारी उप पुलिस महानिरीक्षक (DIG)छिंदवाड़ा राकेश कुमार सिंह तक पहुँची, तो पूरा घटनाक्रम बदल गया।

डीआईजी ने तत्काल अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP)दीपक मिश्रा को जांच के लिए भेजा।
मीडिया पहले से सक्रिय थी — एसडीओपी कार्यालय के बाहर पत्रकारों की भीड़ जमा थी।

एसडीओपी पूजा पांडे ने प्रेस से कहा —

“इस तरह की कोई घटना घटित नहीं हुई है, अफवाहों पर ध्यान न दें।”

लेकिन इसी दौरान एक रिपोर्ट लीक हुई, जिसमें बताया गया कि 9 अक्टूबर को 1करोड़45लाख रुपये की रकम को बोरी में सील कर कोतवाली मालखाने में जमा किया गया।

💰 1करोड़45लाख की बरामदगी: सवाल ज़्यादा,जवाब कम

यह रकम “जप्त” बताई गई, पर इस जप्ती की कोई आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति या केस रजिस्टर एंट्री नहीं थी।
यही बात इस मामले को संदिग्ध बनाती है।

“अगर वाकई यह हवाला रकम कानूनी रूप से जप्त की गई थी,
तो इतनी बड़ी कार्रवाई की आधिकारिक जानकारी अगले दिन तक क्यों नहीं दी गई?”

यह वही रकम थी जो कथित रूप से “2.96 करोड़” में से कुछ हिस्से के रूप में वापस दी गई थी।
अंदरखाने सूत्रों का दावा है कि बाकी रकम निजी स्तर परसेटलकर दी गई

🔍 आंतरिक जांच और निलंबन: पहला बड़ा एक्शन

जैसे ही यह मामला मीडिया की सुर्खियों में आया, भोपाल स्थित पुलिस मुख्यालय (PHQ) सक्रिय हो गया।
मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने तत्काल एसडीओपी पूजा पांडे को निलंबित कर दिया।
उनके साथ बंडोल थाना प्रभारी अर्पित भैरम को भी जांच के दायरे में लिया गया।

जबलपुर ज़ोन के आईजी प्रमोद वर्मा ने मामले की जांच एडिशनल आईजी को सौंपी।
कहा गया कि “रात से सुबह तक जांच चली, और रिपोर्ट उसी रात आईजी के पास पहुंचा दी गई।”

🧠 इन्वेस्टिगेटिव प्रश्न: जिनका जवाब अब तक नहीं मिला

पत्रकारों और विश्लेषकों ने इस मामले में कई गंभीर प्रश्न उठाए हैं —

  1. अगर चेकिंग “सीलादेही” क्षेत्र में हुई, तो बंडोल थाना प्रभारी को वहाँ बुलाने की क्या आवश्यकता थी?
  2. एसडीओपी पूजा पांडे ने जप्ती की सूचना अगले दिन तक अपने वरिष्ठों को क्यों नहीं दी?
  3. अगर ₹2.96करोड़ की रकम पकड़ी गई थी, तो केवल₹1.45करोड़ ही जमा क्यों किए गए?
  4. कोतवाली पुलिस ने शिकायत दर्ज करने में विलंब क्यों किया?
  5. जब “वर्दी में डकैती” का आरोप लगा, तो तत्काल क्राइम ब्रांच याCID को क्यों नहीं सौंपा गया?

🧩 जनता और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया

जैसे ही खबर फैली, सोशल मीडिया पर #SeoniPoliceScam और #PoojaPandeyCase जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।
लोगों ने इसे “पुलिस द्वारा पुलिस की डकैती” करार दिया।

कई यूज़र्स ने लिखा —

“जब अपराधी और पुलिस में फर्क मिटने लगे, तो न्याय की उम्मीद कहाँ से?”

वहीं कुछ लोग सावधानी बरतते हुए बोले —

“पूरा सच सामने आने दीजिए, एकतरफा बयान से निष्कर्ष न निकालें।”

⚖️ कानूनी स्थिति और जांच की वर्तमान स्थिति

मामले की जांच अब जबलपुर ज़ोन के वरिष्ठ अधिकारियों के हाथ में है।
माना जा रहा है कि SIT (Special Investigation Team) गठित की जा सकती है।

सूत्र बताते हैं कि हवाला रकम से जुड़ी बैंक लेन-देन की ट्रेल और फोन लोकेशन डेटा खंगाला जा रहा है।
इससे यह पता चल सकेगा कि उस रात वास्तव में कौन-कौन मौके पर था।

🧱 पुलिस व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह

यह घटना केवल एक व्यक्ति या थाना स्तर का मामला नहीं है —
बल्कि यह सवाल उठाती है कि क्या पुलिस के भीतर जवाबदेही की प्रणाली कमजोर हो चुकी है?

अगर एक अधिकारी करोड़ों की रकम “अपने विवेक से” संभाल सकता है, तो सिस्टम में पारदर्शिता कहाँ है?

राज्य के एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा —

“यह मामला केवल निलंबन तक नहीं रुकना चाहिए, इसे CBI या EOW से जांच कराई जानी चाहिए।”

📚 ऐतिहासिक संदर्भ: सिवनी जिले में पहली बार इस स्तर की घटना

सिवनी जिला आमतौर पर शांत माना जाता है, पर यह पहली बार है जब वर्दीधारी अधिकारी पर हवाला डील में शामिल होने का आरोप लगा है।
पूर्व में यहाँ केवल छोटे स्तर पर सट्टा, अवैध परिवहन, और शराब पकड़ने की खबरें आती थीं।

यह घटना पुलिस और प्रशासन दोनों के लिए विश्वसनीयता की परीक्षा बन गई है।

💬 मीडिया कवरेज और पारदर्शिता की मांग

मध्यप्रदेश के कई वरिष्ठ पत्रकारों ने खुलकर लिखा कि —

“यह केवल हवाला की कहानी नहीं, यह सिस्टम के भीतर की सड़ांध की झलक है।”

कई पोर्टल्स और चैनलों ने इसे “सिवनी की सबसे बड़ी पुलिस डील” बताया है।
सवाल अब केवल रकम का नहीं, बल्कि पुलिस की साख और भरोसे का है।

📊 संभावित प्रभाव: पुलिस सुधार की जरूरत

इस घटना ने यह साबित किया कि

  • निगरानी व्यवस्था कमजोर है,
  • चेकिंग अभियानों में कोई डिजिटल रिकॉर्डिंग नहीं होती,
  • और पुलिस जांच की पारदर्शिता केवल “कागज़ों” तक सीमित है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब जरूरत है कि
हर बड़ी कार्रवाई की Live GPS Tracking,
Body Camera Footage,
और Instant Reporting Protocol लागू हो।

📢 सरकारी प्रतिक्रिया और भविष्य की दिशा

भोपाल पुलिस मुख्यालय ने बयान जारी किया —

“विभाग शून्य सहनशीलता की नीति पर काम कर रहा है।
किसी भी दोषी अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा।”

वहीं विपक्ष ने इसे “राज्य सरकार की विफलता” बताते हुए विधानसभा में उठाने की घोषणा की है।
कुछ जनप्रतिनिधियों ने यहाँ तक कहा कि

“अगर इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह भविष्य में पुलिस अपराधों का ब्लूप्रिंट बन जाएगा।”

🧩 निष्कर्ष (Conclusion):

सिवनी का यह “हवाला कांड” केवल एक थाने या अधिकारी की कहानी नहीं है,
बल्कि यह सवाल उठाता है —
जब कानून लागू करने वाले ही कानून तोड़ें,तो न्याय कहाँ खोजा जाए?

वर्दी पर लगा यह दाग केवल एक जिले का नहीं, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र के विश्वास का प्रतीक बन गया है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या यह मामला भी “फाइलों में दब” जाएगा
या सिस्टम की सफाई की दिशा में पहला कदम बनेगा

(साई फीचर्स)