(ब्यूरो कार्यालय)
भोपाल (साई)। मध्य प्रदेश में जंगलों से लगे खेतों की सुरक्षा के लिए लगाए जा रहे बिजली के तार वन्यजीवों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। फसलों को जंगली जानवरों से बचाने के उद्देश्य से कुछ स्थानों पर तारों में अवैध रूप से करंट प्रवाहित किए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसकी चपेट में आने से छोटे वन्यजीवों के साथ बाघ, तेंदुए और चीतल जैसे वन्यप्राणी भी अपनी जान गंवा रहे हैं। यह स्थिति वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा और कानून के पालन से जुड़ी गंभीर चुनौती बन गई है।
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से जुड़े धमोखर परिक्षेत्र के महामन गांव में करीब दो वर्ष के एक चीतल की करंट लगने से मौत का मामला इस खतरे को सामने लाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, खेत में लगाए गए जीआई तार में करंट प्रवाहित किया गया था। जंगल से भटककर खेत में पहुंचे चीतल की इसकी चपेट में आने से मौत हो गई। वन विभाग ने मामले की जांच शुरू की और खेत के मालिक की पहचान करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
वन विभाग की रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 से 2026 के बीच प्रदेश में फंदों और बिजली के करंट से वन्यजीवों के शिकार या मौत से जुड़े लगभग 1,000 प्रकरण दर्ज किए गए। इनमें जंगली सूअर, नीलगाय, तेंदुए, चीतल, सांभर, भालू, बाघ और मोर सहित कई वन्यप्राणी शामिल हैं। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर औसतन प्रतिवर्ष लगभग 80 वन्यजीवों की मौत करंट और फंदों से होने की बात सामने आई है।
ये आंकड़े केवल वन्यजीवों की मौत का विवरण नहीं हैं, बल्कि जंगलों के आसपास मानव गतिविधियों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास के बीच बढ़ते टकराव की ओर भी ध्यान आकर्षित करते हैं।
मध्य प्रदेश में वन्यजीवों के लिए जानलेवा बन रहे बिजली के तार
मध्य प्रदेश देश के महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्रों में शामिल है। यहां बाघ, तेंदुए, चीतल, सांभर, नीलगाय और भालू सहित अनेक प्रजातियां जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों में पाई जाती हैं। वन्यजीवों की आवाजाही कई बार जंगलों से लगे खेतों और ग्रामीण बस्तियों तक भी होती है।
ऐसे क्षेत्रों में किसान अपनी फसलों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए अलग-अलग उपाय अपनाते हैं। लेकिन जब खेतों की सुरक्षा के लिए लगाए गए तारों में अवैध रूप से बिजली का करंट प्रवाहित किया जाता है, तो यह उपाय वन्यजीवों के लिए घातक बन सकता है।
करंट का खतरा इस कारण भी गंभीर है कि बिजली प्रवाहित तारों को देखकर वन्यजीव हमेशा खतरे का अनुमान नहीं लगा सकते। रात के समय या कम दृश्यता वाली परिस्थितियों में खेतों से गुजरने वाले जानवर तारों की चपेट में आ सकते हैं।
इस तरह की घटनाओं में केवल संरक्षित प्रजातियों को ही नुकसान नहीं पहुंचता, बल्कि अन्य वन्यजीव भी प्रभावित होते हैं। एक बार किसी क्षेत्र में ऐसे तार लगाए जाने पर वहां से गुजरने वाले अलग-अलग प्रजातियों के जानवरों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
यह समझना जरूरी है कि फसलों को बचाना किसानों की वास्तविक आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए अपनाए जाने वाले उपाय कानूनसम्मत और सुरक्षित होने चाहिए। वन्यजीवों की जान जोखिम में डालने वाले तरीके समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं।
2014 से 2026 के बीच लगभग 1,000 प्रकरण दर्ज
वन विभाग से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 से 2026 के बीच मध्य प्रदेश में फंदों और करंट से वन्यजीवों के शिकार या मौत के लगभग 1,000 प्रकरण दर्ज किए गए।
इन आंकड़ों में विभिन्न प्रजातियों के वन्यजीव शामिल हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार:
- जंगली सूअर — 322
- नीलगाय — 118
- तेंदुए — 101
- चीतल — 82
- सांभर — 50
- भालू — 36
- बाघ — 39
- मोर — 17
इन सूचीबद्ध श्रेणियों का कुल योग 765 होता है। यह संख्या बताए गए लगभग 1,000 प्रकरणों से कम है, इसलिए अन्य प्रजातियों या मामलों का पूरा विवरण उपलब्ध कराए गए आंकड़ों में शामिल नहीं है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ये आंकड़े करंट और फंदों से जुड़े मामलों का संयुक्त विवरण हैं। इसलिए सूची में शामिल प्रत्येक वन्यजीव की मौत केवल बिजली का करंट लगने से हुई, ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
इसी तरह, लगभग 1,000 प्रकरणों का अर्थ आवश्यक रूप से 1,000 अलग-अलग मौतें भी नहीं है, जब तक रिपोर्ट में मामलों और मृत वन्यजीवों की संख्या का स्पष्ट अंतर न दिया गया हो।
फिर भी, उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि अवैध करंट और फंदों से वन्यजीवों को नुकसान पहुंचने की समस्या पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।
हर साल औसतन 80 वन्यजीवों की मौत का क्या अर्थ है?
उपलब्ध जानकारी में करंट और फंदों से वन्यजीवों की मौत के मामलों का औसत लगभग 80 प्रतिवर्ष बताया गया है। यह आंकड़ा समस्या की गंभीरता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी सही व्याख्या करने के लिए रिपोर्ट की अवधि और मामलों की श्रेणियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
वर्ष 2014 से 2026 तक का अंतराल लगभग 12 वर्ष है, जबकि दोनों अंतिम वर्षों को शामिल करने पर यह 13 कैलेंडर वर्षों को समेटता है। इसलिए सटीक वार्षिक औसत निकालने के लिए मूल रिपोर्ट में प्रयुक्त अवधि और कुल मामलों की परिभाषा की पुष्टि आवश्यक है।
फिर भी, यदि बड़ी संख्या में वन्यजीव लगातार करंट और फंदों की चपेट में आ रहे हैं, तो यह संरक्षण व्यवस्था के सामने एक दीर्घकालीन चुनौती को दर्शाता है।
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल दुर्घटना के बाद कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। उन क्षेत्रों की पहचान करना भी जरूरी है जहां खेतों की सुरक्षा के लिए अवैध करंट का इस्तेमाल होने की आशंका है।
यदि नियमित निगरानी, स्थानीय स्तर पर सूचना तंत्र और कानून के प्रभावी पालन को प्राथमिकता दी जाए, तो संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों में समय रहते कार्रवाई की जा सकती है।
बाघों के लिए भी बड़ा खतरा, इस साल करंट से छह मौतों का उल्लेख
मध्य प्रदेश के जंगलों में बाघों की सुरक्षा वन्यजीव संरक्षण का महत्वपूर्ण विषय है। उपलब्ध विवरण में वन विभाग की एक पूर्व रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि चार महीने की अवधि में करंट लगने से छह बाघों की मौत दर्ज की गई थी।
इसी रिपोर्ट में नौ बाघों की मौत आपसी संघर्ष के कारण होने की जानकारी भी सामने आई थी। रिपोर्ट की अवधि और कुल मौतों के आधार पर करंट से हुई मौतों का अनुपात लगभग 21 प्रतिशत बताया गया है।
इन आंकड़ों का सही अर्थ समझने के लिए रिपोर्ट में शामिल अवधि, कुल बाघों की मौतों की संख्या और प्रत्येक मौत के सत्यापित कारणों को देखना जरूरी है। चार महीने की रिपोर्ट को पूरे वर्ष का आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।
बाघों की मौत का हर मामला संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। बाघ खाद्य शृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और उनके संरक्षण के लिए बड़े वन क्षेत्रों, सुरक्षित आवास और पर्याप्त शिकार प्रजातियों की उपलब्धता जरूरी है।
यदि जंगलों के आसपास अवैध करंट और फंदों का खतरा बना रहता है, तो बाघों के साथ दूसरे वन्यजीव भी जोखिम में रहते हैं। इसलिए संरक्षण प्रयासों में केवल टाइगर रिजर्व के भीतर की निगरानी पर्याप्त नहीं है; आसपास के क्षेत्रों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
जंगल से खेतों तक पहुंचने वाले वन्यजीव क्यों बन रहे हैं शिकार?
जंगलों से लगे गांवों और खेतों में वन्यजीवों की आवाजाही कई कारणों से हो सकती है। भोजन और पानी की तलाश, प्राकृतिक आवास की परिस्थितियां तथा स्थानीय भूगोल इसके कुछ संभावित कारण हैं।
कई क्षेत्रों में खेत जंगलों के काफी करीब स्थित होते हैं। ऐसे में जंगली सूअर, नीलगाय और चीतल जैसे जानवर फसलों वाले क्षेत्रों तक पहुंच सकते हैं। बड़े वन्यजीव भी कभी-कभी जंगल की सीमा से बाहर दिखाई दे सकते हैं।
किसानों के लिए फसल को नुकसान से बचाना आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। लेकिन जब इस समस्या से निपटने के लिए अवैध रूप से करंट वाले तार लगाए जाते हैं, तो वन्यजीवों के साथ ग्रामीणों और घरेलू पशुओं के लिए भी खतरा पैदा हो सकता है।
बिजली से जुड़े असुरक्षित उपाय दुर्घटनाओं का कारण बन सकते हैं। इसलिए खेतों की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण के बीच ऐसा संतुलन जरूरी है, जिसमें फसल को नुकसान से बचाने के उपाय किसी की जान के लिए खतरा न बनें।
इसके लिए वन विभाग, स्थानीय प्रशासन, बिजली विभाग और ग्रामीण समुदाय के बीच समन्वय महत्वपूर्ण हो सकता है।
शिकार रोकने के लिए चलाया गया ऑपरेशन वाइल्ड ट्रैप
करंट और फंदों से होने वाले अवैध शिकार पर अंकुश लगाने के लिए वन विभाग ने ऑपरेशन वाइल्ड ट्रैप चलाया था। उपलब्ध विभागीय जानकारी के अनुसार, ऑपरेशन वाइल्ड ट्रैप-द्वितीय को 10 जनवरी से 15 फरवरी 2026 तक मिशन मोड में संचालित करने की योजना बनाई गई थी।
इस अभियान के तहत वन क्षेत्रों में दिन और रात के समय गश्त, संदिग्ध स्थानों की तलाशी तथा डॉग स्क्वॉड की सहायता से निगरानी करने के निर्देश दिए गए थे।
इससे पहले 1 दिसंबर 2024 से 31 जनवरी 2025 तक चलाए गए अभियान के संबंध में विभागीय जानकारी में 931 प्रकरण दर्ज होने और 429 आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने का उल्लेख है।
इन आंकड़ों की सही व्याख्या के लिए यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि 931 प्रकरण किन-किन श्रेणियों से संबंधित थे और उनमें से कितने सीधे करंट तथा फंदों से जुड़े अवैध शिकार के मामले थे। इसी तरह गिरफ्तारियों की संख्या को दोषसिद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता।
ऐसे अभियान अवैध गतिविधियों की पहचान करने, संदिग्ध स्थानों पर निगरानी बढ़ाने और कानून का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने में उपयोगी हो सकते हैं।
हालांकि, किसी अभियान की दीर्घकालीन सफलता का आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उसके बाद संबंधित क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं में कितनी कमी आई और निगरानी कितनी प्रभावी बनी रही।
महामन गांव में चीतल की मौत, खेत मालिक की पहचान की प्रक्रिया
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से जुड़े धमोखर परिक्षेत्र के महामन गांव में करीब दो वर्ष के चीतल की करंट लगने से मौत का मामला सामने आने के बाद वन विभाग ने जांच शुरू की।
धमोखर परिक्षेत्र अधिकारी सचिन सिंह के अनुसार, खेत के मालिक की पहचान की जा रही थी। उपलब्ध जानकारी में यह भी बताया गया कि मृत चीतल का पोस्टमार्टम कराने के बाद नियमानुसार अंतिम संस्कार कर दिया गया।
इस घटना से स्पष्ट होता है कि जंगलों के आसपास स्थित खेतों में अवैध रूप से करंट प्रवाहित तार वन्यजीवों के लिए कितना गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।
हालांकि, जांच पूरी होने और जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका स्थापित होने से पहले किसी विशेष व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं है। मामले में जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किया जाना चाहिए।
वन विभाग के लिए ऐसे मामलों में घटनास्थल की जांच, तारों की स्थिति का रिकॉर्ड, उपलब्ध साक्ष्यों का संरक्षण और जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान महत्वपूर्ण कदम होते हैं।
यदि जांच में कानून का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
किसानों की फसल सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन
जंगलों के आसपास खेती करने वाले किसानों के सामने फसलों को जंगली जानवरों से बचाने की चुनौती रहती है। वन्यजीवों की आवाजाही से फसल को नुकसान होने पर किसान आर्थिक परेशानी का सामना कर सकते हैं।
लेकिन अवैध रूप से बिजली के तारों में करंट प्रवाहित करना इस समस्या का सुरक्षित या स्वीकार्य समाधान नहीं है। इससे वन्यजीवों के अलावा खेत में काम करने वाले लोगों, आसपास से गुजरने वाले ग्रामीणों और घरेलू पशुओं की जान भी खतरे में पड़ सकती है।
समस्या का स्थायी समाधान खोजने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप सुरक्षित और नियमसम्मत उपायों को बढ़ावा देना जरूरी है। इनमें जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान, वन विभाग से समय पर संपर्क, सुरक्षित खेत सुरक्षा उपायों के बारे में मार्गदर्शन और वन्यजीवों की आवाजाही की जानकारी साझा करना शामिल हो सकता है।
जहां फसल नुकसान की समस्या लगातार बनी रहती है, वहां संबंधित सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत उपलब्ध सहायता या मुआवजे के प्रावधानों की जानकारी भी किसानों तक पहुंचाई जानी चाहिए।
इस तरह किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझते हुए वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में काम किया जा सकता है।
वन विभाग के सामने निगरानी और जागरूकता की चुनौती
वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए कानून और गश्त महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके साथ स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी आवश्यक है। जंगलों के आसपास रहने वाले लोग वन्यजीवों की आवाजाही और संदिग्ध गतिविधियों के बारे में समय रहते जानकारी दे सकते हैं।
इसके लिए ग्रामीणों को यह समझाना जरूरी है कि अवैध करंट वाले तार वन्यजीवों के साथ मानव जीवन के लिए भी खतरा पैदा करते हैं। जागरूकता कार्यक्रमों में सुरक्षित फसल सुरक्षा उपायों और संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी जा सकती है।
वन विभाग और बिजली विभाग के बीच समन्वय भी महत्वपूर्ण है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां बिजली के असुरक्षित उपयोग की आशंका हो।
इसके अलावा, संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित गश्त, घटनाओं का रिकॉर्ड, संदिग्ध स्थानों की जांच और पूर्व में दर्ज मामलों की समीक्षा की जा सकती है।
इन प्रयासों का उद्देश्य केवल घटना होने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों को पहले ही रोकना होना चाहिए जिनसे वन्यजीवों और ग्रामीणों की जान को खतरा हो।
आगे की राह: सुरक्षित खेत, संरक्षित वन्यजीव
मध्य प्रदेश में करंट और फंदों से वन्यजीवों की मौत से जुड़े मामलों को रोकने के लिए निरंतर और समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। केवल सीमित अवधि के अभियान चलाने से समस्या का स्थायी समाधान सुनिश्चित नहीं होता, जब तक जोखिम वाले क्षेत्रों में नियमित निगरानी और प्रभावी कार्रवाई जारी न रहे।
आगे की रणनीति में कुछ प्रमुख कदम उपयोगी हो सकते हैं:
- जंगलों से लगे संवेदनशील खेतों और गांवों की पहचान करना।
- अवैध करंट और फंदों की सूचना मिलने पर शीघ्र जांच करना।
- किसानों को सुरक्षित और नियमसम्मत फसल सुरक्षा उपायों की जानकारी देना।
- वन विभाग, बिजली विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय मजबूत करना।
- वन्यजीवों की मौत के मामलों का सही रिकॉर्ड रखना और नियमित समीक्षा करना।
- कानून का उल्लंघन प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई करना।
- स्थानीय समुदायों को वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों में सहभागी बनाना।
इन उपायों से वन्यजीवों के लिए खतरा कम करने और किसानों की फसल सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं का संतुलित समाधान तलाशने में मदद मिल सकती है।
करंट के अवैध जाल पर रोक लगाना जरूरी
मध्य प्रदेश में खेतों की सुरक्षा के लिए लगाए गए तारों में अवैध करंट प्रवाहित किए जाने की घटनाएं वन्यजीव संरक्षण के सामने गंभीर चुनौती पेश करती हैं। उपलब्ध विभागीय जानकारी में वर्ष 2014 से 2026 के बीच करंट और फंदों से जुड़े लगभग 1,000 प्रकरणों का उल्लेख है। इनमें बाघ, तेंदुए, चीतल, नीलगाय और अन्य वन्यजीवों से संबंधित मामले शामिल हैं।
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से जुड़े महामन गांव में चीतल की मौत इस खतरे का ताजा उदाहरण है। ऑपरेशन वाइल्ड ट्रैप जैसे अभियानों के माध्यम से निगरानी और कार्रवाई की कोशिश की गई है, लेकिन समस्या को नियंत्रित करने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।
किसानों की फसल बचाने की जरूरत वास्तविक है, परंतु इसका समाधान ऐसा होना चाहिए जो वन्यजीवों और ग्रामीणों की जान को खतरे में न डाले। सुरक्षित उपायों, स्थानीय जागरूकता, प्रभावी निगरानी और कानून के निष्पक्ष पालन से इस दिशा में सुधार संभव है।
वन्यजीवों की सुरक्षा केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रशासन, ग्रामीण समुदाय और संबंधित विभागों के साझा प्रयासों से जुड़ा विषय है। जंगलों के आसपास सुरक्षित खेती और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना ही इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।