BRICS Summit में पीएम मोदी की ताबड़तोड़ Diplomacy, तीन दिन में 15 द्विपक्षीय बैठकें; शी चिनफिंग-पुतिन और UN चीफ से अहम चर्चा

तीन दिन, 15 बैठकें और भारत की सक्रिय कूटनीति

(ब्यूरो कार्यालय)
नई दिल्ली (साई)। नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कूटनीतिक कार्यक्रम बेहद व्यस्त रहा। सम्मेलन के तीन दिनों में उन्होंने विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार के प्रमुखों के साथ 15 द्विपक्षीय बैठकें कीं। इसके अलावा कई अन्य वैश्विक नेताओं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ भी उनकी अलग-अलग बातचीत हुई।

इन मुलाकातों का दायरा केवल BRICS देशों तक सीमित नहीं रहा। प्रधानमंत्री ने रूस, चीन, ईरान, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, खाड़ी क्षेत्र और मध्य एशिया से जुड़े प्रमुख नेताओं के साथ बातचीत की। बैठकों में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ व्यापार, निवेश, रक्षा, ऊर्जा, कनेक्टिविटी, तकनीक और जरूरी खनिज जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

यह सक्रिय कूटनीतिक प्रयास ऐसे समय में हुआ जब भारत 2026 में अपनी अध्यक्षता के तहत BRICS Summit की मेजबानी कर रहा था। ऐसे में सामूहिक मंच पर वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के साथ-साथ अलग-अलग देशों के साथ भारत की अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने का अवसर भी मिला।

BRICS मंच के साथ द्विपक्षीय कूटनीति पर भी जोर

BRICS का विस्तार होने के बाद इस समूह में अलग-अलग भौगोलिक और रणनीतिक हित रखने वाले देशों की भागीदारी बढ़ी है। ऐसे में सामूहिक बैठकों के अलावा द्विपक्षीय मुलाकातें भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की 15 द्विपक्षीय बैठकों ने भारत को अलग-अलग देशों के साथ उनकी विशिष्ट जरूरतों और साझा हितों पर सीधे बातचीत का अवसर दिया।

इन चर्चाओं में कई ऐसे विषय रहे जो भारत की दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों से सीधे जुड़े हैं। इनमें सप्लाई चेन की स्थिरता, जरूरी खनिजों की उपलब्धता, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और वैश्विक व्यापार प्रमुख हैं।

इस तरह BRICS Summit भारत के लिए केवल बहुपक्षीय सम्मेलन नहीं रहा, बल्कि कई देशों के साथ संबंधों को एक साथ आगे बढ़ाने का कूटनीतिक मंच भी बना।

पहला दिन: पुतिन, पेजेशकियन और UN महासचिव से मुलाकात

सम्मेलन के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ अलग-अलग बैठकें कीं। इसी दिन उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से भी मुलाकात की।

पुतिन के साथ भारत-रूस संबंधों की समीक्षा

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई बातचीत में भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।

दोनों नेताओं ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीक, जरूरी खनिज और सिविल न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा की।

भारत और रूस के संबंध लंबे समय से रणनीतिक महत्व रखते हैं। बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच दोनों देशों के लिए ऊर्जा, रक्षा और व्यापार सहयोग को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण माना जाता है।

बैठक में रूस-यूक्रेन संघर्ष का मुद्दा भी उठा। इसके अलावा पश्चिम एशिया की स्थिति और समुद्री व्यापार पर पड़ रहे प्रभावों पर चर्चा हुई। भारतीय समुद्री यात्रियों यानी सीफेयरर्स की सुरक्षा भी बातचीत का हिस्सा रही।

इससे यह संकेत मिलता है कि भारत की विदेश नीति में क्षेत्रीय संघर्षों के प्रत्यक्ष प्रभावों के साथ-साथ व्यापार और समुद्री सुरक्षा जैसे व्यावहारिक मुद्दों को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

ईरान के राष्ट्रपति से पश्चिम एशिया पर चर्चा

प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से भी बातचीत की। इस बैठक में भारत-ईरान संबंधों के साथ BRICS सहयोग और पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर चर्चा हुई।

भारत ने बातचीत और कूटनीति के जरिए समस्याओं के समाधान के समर्थन को दोहराया। साथ ही पश्चिम एशिया में लंबे समय तक शांति और स्थिरता की जरूरत पर जोर दिया गया।

ईरान भारत के लिए पश्चिम एशिया और व्यापक क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिहाज से महत्वपूर्ण साझेदार है। ऐसे में क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता के बीच दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद का महत्व बढ़ जाता है।

UN महासचिव से मुलाकात

पहले दिन प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से भी मुलाकात की। इस बातचीत ने प्रधानमंत्री के BRICS कार्यक्रम में एक बहुपक्षीय आयाम जोड़ा।

इस मुलाकात का महत्व इसलिए भी रहा क्योंकि BRICS जैसे मंच पर वैश्विक दक्षिण, बहुपक्षीय संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से जुड़े मुद्दे लगातार चर्चा के केंद्र में रहे हैं।

दूसरा दिन: शी चिनफिंग से मुलाकात पर दुनिया की नजर

12 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी की कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठकें हुईं। इनमें इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम, UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ बातचीत प्रमुख रही।

इन बैठकों में आर्थिक सहयोग से लेकर क्षेत्रीय रणनीतिक मुद्दों तक विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई।

शी चिनफिंग के साथ भारत-चीन संबंधों पर बातचीत

प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच बैठक सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित मुलाकातों में शामिल रही।

दोनों नेताओं ने भारत-चीन संबंधों से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा की। इनमें सीमा से संबंधित प्रश्न, सीमा पर शांति, आर्थिक एवं व्यापारिक संबंध, सप्लाई चेन और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क प्रमुख रहे।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान इस बात पर जोर दिया कि मतभेदों को विवाद में नहीं बदलना चाहिए। उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने में आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और साझा हितों के महत्व को रेखांकित किया।

भारत और चीन एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। इसलिए दोनों देशों के बीच संबंधों का प्रभाव केवल द्विपक्षीय स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी पड़ता है।

ऐसे में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच सीधा संवाद अपने आप में महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम है।

मलेशिया, इथियोपिया और UAE के साथ आर्थिक सहयोग पर जोर

मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बैठक में व्यापार और निवेश के अलावा रक्षा, सेमीकंडक्टर, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इकोनॉमी, ऊर्जा और फिनटेक जैसे क्षेत्रों पर चर्चा हुई।

इन क्षेत्रों का महत्व तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच और अधिक बढ़ गया है। सेमीकंडक्टर और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत की आर्थिक रणनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है।

इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली के साथ बातचीत में द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने और अफ्रीका के साथ भारत के जुड़ाव को बढ़ाने पर जोर रहा।

वहीं UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ हुई बैठक में भारत-UAE रणनीतिक साझेदारी पर चर्चा हुई। रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, जरूरी खनिज और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्र बातचीत के प्रमुख विषय रहे।

भारत और UAE के बीच ऊर्जा, निवेश और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में सहयोग का व्यापक महत्व है। ऐसे में BRICS Summit के दौरान हुई यह बैठक आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण रही।

तीसरा दिन: अफ्रीका से मध्य एशिया तक भारत की पहुंच

13 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने अफ्रीका, मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़े कई देशों के नेताओं के साथ बैठकें कीं।

उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, कजाख राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट टोकायेव, फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड आर. मार्कोस जूनियर, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी और बुरुंडी के राष्ट्रपति एवरिस्टे नदायिशिमिये से बातचीत की।

इसके अलावा युगांडा और नाइजीरिया के नेतृत्व के साथ भी बैठकें हुईं।

इन मुलाकातों ने भारत की कूटनीतिक पहुंच के विभिन्न आयामों को सामने रखा। अफ्रीका में भारत के संबंधों से लेकर मध्य एशिया में संपर्क और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ रणनीतिक एवं आर्थिक सहयोग तक कई मुद्दे इन बैठकों में शामिल रहे।

दक्षिण अफ्रीका के साथ BRICS सहयोग

दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा के साथ बैठक विशेष महत्व रखती है। दक्षिण अफ्रीका BRICS के शुरुआती सदस्य देशों में शामिल रहा है और ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों पर भारत का महत्वपूर्ण साझेदार है।

दोनों देशों के बीच बातचीत BRICS के व्यापक एजेंडे के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण रही। भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मुद्दों को वैश्विक मंच पर अधिक मजबूती से रखने की कोशिश कर रहा है।

अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों पर जोर

मिस्र और बुरुंडी के साथ हुई बैठकों ने अफ्रीका के साथ भारत की कूटनीतिक पहुंच को और विस्तार दिया।

भारत के लिए अफ्रीका केवल राजनीतिक साझेदारी का क्षेत्र नहीं है। व्यापार, निवेश, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक और विकास सहयोग जैसे विषय भी भारत-अफ्रीका संबंधों में महत्वपूर्ण हैं।

ऐसे में BRICS Summit के दौरान अफ्रीकी नेताओं के साथ लगातार बातचीत भारत की व्यापक विदेश नीति का हिस्सा दिखाई देती है।

मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया पर भी नजर

कजाख राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट टोकायेव के साथ बैठक ने मध्य एशिया के साथ भारत के संबंधों को महत्व दिया। वहीं फिलीपींस और मलेशिया के नेतृत्व के साथ हुई बातचीत ने दक्षिण-पूर्व एशिया के आयाम को मजबूत किया।

कनेक्टिविटी, ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग जैसे मुद्दे भारत के लिए इन क्षेत्रों में विशेष महत्व रखते हैं।

15 बैठकों से क्या संकेत मिलता है?

प्रधानमंत्री मोदी की तीन दिनों में 15 द्विपक्षीय बैठकों को केवल बैठकों की संख्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इनके जरिए भारत ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी प्राथमिकताओं को सीधे नेताओं के सामने रखने का अवसर हासिल किया।

इन मुलाकातों से कुछ प्रमुख संदेश सामने आते हैं—

  • भारत अपनी BRICS अध्यक्षता को सक्रिय कूटनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।
  • रूस के साथ रणनीतिक और ऊर्जा संबंधों को महत्व दिया जा रहा है।
  • चीन के साथ संवाद और सीमा पर शांति को प्राथमिकता दी जा रही है।
  • पश्चिम एशिया की स्थिरता और कूटनीतिक समाधान पर भारत का जोर कायम है।
  • अफ्रीका के साथ भारत की साझेदारी का दायरा बढ़ रहा है।
  • मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ आर्थिक एवं रणनीतिक संपर्क को आगे बढ़ाने पर ध्यान है।
  • जरूरी खनिज, ऊर्जा और सप्लाई चेन जैसे मुद्दे भारत की आर्थिक सुरक्षा के केंद्र में हैं।

भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की रणनीति

प्रधानमंत्री मोदी की इन बैठकों का समय भी महत्वपूर्ण है। दुनिया इस समय कई स्तरों पर भू-राजनीतिक अनिश्चितता का सामना कर रही है।

रूस-यूक्रेन संघर्ष का प्रभाव ऊर्जा और वैश्विक व्यापार पर दिखाई देता है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता समुद्री मार्गों और ऊर्जा बाजारों के लिए चुनौती बन सकती है।

इसी तरह वैश्विक सप्लाई चेन में किसी भी बड़े व्यवधान का सीधा असर व्यापार, विनिर्माण और महंगाई पर पड़ सकता है।

ऐसे वातावरण में भारत के लिए अलग-अलग देशों के साथ संवाद बनाए रखना और अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा करना महत्वपूर्ण है। BRICS Summit के दौरान हुई द्विपक्षीय बैठकों ने इसी व्यापक रणनीति को आगे बढ़ाने का अवसर दिया।

व्यापार और निवेश के लिए भी महत्वपूर्ण मंच

प्रधानमंत्री की बैठकों में व्यापार और निवेश से जुड़े विषय बार-बार सामने आए। आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में देशों के बीच संबंध केवल राजनीतिक या सुरक्षा सहयोग तक सीमित नहीं हैं।

सेमीकंडक्टर, डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, जरूरी खनिज, इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्र आने वाले वर्षों में रणनीतिक महत्व रखने वाले हैं।

भारत के लिए इन क्षेत्रों में विश्वसनीय साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाना आर्थिक विकास और सप्लाई चेन सुरक्षा दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

भविष्य में क्या असर पड़ सकता है?

इन बैठकों का वास्तविक प्रभाव आगे होने वाले समझौतों, व्यापारिक फैसलों, निवेश और नीतिगत सहयोग में दिखाई देगा। शीर्ष नेताओं की बातचीत किसी भी द्विपक्षीय संबंध के लिए राजनीतिक दिशा तय करने में मदद करती है, लेकिन उसे ठोस परिणामों में बदलने के लिए संबंधित मंत्रालयों और संस्थाओं के स्तर पर लगातार काम करना पड़ता है।

आने वाले समय में भारत की प्राथमिकता निम्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की हो सकती है—

  1. ऊर्जा सुरक्षा और विविधीकरण
  2. जरूरी खनिजों की आपूर्ति
  3. सेमीकंडक्टर और तकनीकी सहयोग
  4. डिजिटल अर्थव्यवस्था
  5. रक्षा और सुरक्षा सहयोग
  6. व्यापार एवं निवेश
  7. समुद्री और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी
  8. ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर समन्वय

नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन दिनों में 15 द्विपक्षीय बैठकों ने भारत की सक्रिय कूटनीतिक रणनीति को सामने रखा। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से लेकर चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस तक हुई बातचीत ने सम्मेलन को व्यापक कूटनीतिक आयाम दिया।

इसके अलावा अफ्रीका, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और खाड़ी क्षेत्र के नेताओं के साथ हुई बैठकों में भारत ने व्यापार, निवेश, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक, जरूरी खनिज और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर अपने हितों को आगे बढ़ाया।

विशेष रूप से भारत-चीन संबंधों, रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी और पश्चिम एशिया की स्थिति पर हुई चर्चाएं मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण हैं।

कुल मिलाकर, BRICS अध्यक्षता के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का व्यस्त द्विपक्षीय कार्यक्रम यह दिखाता है कि भारत सामूहिक बहुपक्षीय मंचों के साथ-साथ सीधे द्विपक्षीय संवाद को भी अपनी विदेश नीति का अहम साधन बना रहा है। अब इन बैठकों से निकले संवाद को ठोस आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक परिणामों में बदलना भारत के लिए अगली बड़ी प्राथमिकता होगी।