सिवनी से एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट
(ब्यूरो कार्यालय)
भोपाल (साई)। मध्य प्रदेश को देश का ‘टाइगर स्टेट‘ कहा जाता है और इस पहचान को मजबूत बनाने में सिवनी जिले स्थित पेंच टाइगर रिजर्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। घने जंगल, समृद्ध जैव विविधता और विश्व प्रसिद्ध द जंगल बुक से जुड़े इस क्षेत्र में हर वर्ष बाघों के संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और आवास विकास पर बड़ी राशि खर्च की जाती है।
इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक कारणों, क्षेत्रीय संघर्ष, करंट और अन्य घटनाओं के चलते कई बाघों की मौत भी सामने आई हैं। इससे यह सवाल लगातार उठता रहा है कि संरक्षण पर बढ़ते निवेश के बावजूद चुनौतियाँ क्यों बनी हुई हैं।
महत्वपूर्ण सूचना: इस रिपोर्ट में उल्लिखित कुछ वित्तीय एवं मृत्यु संबंधी आँकड़े विभिन्न सार्वजनिक दस्तावेज़ों, मीडिया रिपोर्टों और उपलब्ध सूचनाओं के संकलन पर आधारित अनुमानित हैं। इनका पाँच वर्षीय समेकित आधिकारिक सत्यापन एक ही सरकारी दस्तावेज़ में उपलब्ध नहीं है।
स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवाल और संरक्षण व्यवस्था पर बहस
बाघ संरक्षण पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर संरक्षण व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों का दावा है कि संरक्षण योजनाओं में स्थानीय समुदाय की भागीदारी अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ पाई है।
कुछ संरक्षण कार्यकर्ताओं का यह भी आरोप है कि सिवनी में मानसेवी वाइल्ड लाइफ वार्डन (Honorary Wildlife Warden) की नियुक्ति लंबे समय से लंबित है। उनका कहना है कि संबंधित वन अधिकारियों द्वारा अनुशंसा किए जाने के बावजूद नियुक्ति नहीं होने से स्थानीय स्तर पर वन्यजीव संरक्षण को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है। हालांकि, इस संबंध में नियुक्ति लंबित रहने के कारणों पर संबंधित विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।
इसी प्रकार कुछ स्थानीय संगठनों ने यह भी चिंता जताई है कि पेंच टाइगर रिजर्व के आसपास कुछ क्षेत्रों में बढ़ती पर्यटन एवं अन्य व्यावसायिक गतिविधियाँ वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर दबाव बढ़ा सकती हैं। उनका मानना है कि यदि पर्यटन गतिविधियों का वैज्ञानिक और संतुलित प्रबंधन नहीं किया गया तो भविष्य में वन्यजीवों के व्यवहार और आवास पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
वहीं, कुछ सामाजिक संगठनों ने संरक्षण योजनाओं के क्रियान्वयन और सरकारी धन के उपयोग में अधिक पारदर्शिता तथा स्वतंत्र निगरानी तंत्र की आवश्यकता भी बताई है। इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और वन विभाग की ओर से इन सभी दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।
पेंच टाइगर रिजर्व का महत्व
सिवनी और छिंदवाड़ा जिलों में फैला पेंच टाइगर रिजर्व देश के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में शामिल है। यहाँ प्रोजेक्ट टाइगर के तहत नियमित गश्त, कैमरा ट्रैप निगरानी, वन्यजीव संरक्षण, जल स्रोत विकास, घासभूमि प्रबंधन तथा ईको-विकास समितियों के माध्यम से संरक्षण कार्य किए जाते हैं।
यह रिजर्व महाराष्ट्र के पेंच लैंडस्केप से भी जुड़ा है, जिससे बाघों की आवाजाही बनी रहती है और आनुवंशिक विविधता को लाभ मिलता है।
पिछले पाँच वर्षों में संरक्षण बजट की तस्वीर
प्रोजेक्ट टाइगर और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष वार्षिक कार्ययोजना (Annual Plan of Operations) के आधार पर राशि स्वीकृत की जाती है।
उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं के आधार पर अनुमानित वित्तीय आवंटन इस प्रकार बताया जाता है—
| वर्ष | अनुमानित आवंटन |
| 2020–21 | ₹18.50 करोड़ |
| 2021–22 | ₹16.20 करोड़ |
| 2022–23 | ₹15.80 करोड़ |
| 2023–24 | ₹21.50 करोड़ |
| 2024–25 | ₹22.00 करोड़ (लगभग) |
इन आँकड़ों के आधार पर पाँच वर्षों में लगभग ₹90–95करोड़ के संरक्षण निवेश का अनुमान लगाया जाता है।
नोट: यह कुल राशि आधिकारिक समेकित सरकारी आँकड़ा नहीं है, बल्कि उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के संकलन पर आधारित अनुमान है।
किन कार्यों पर होता है खर्च?
संरक्षण बजट का उपयोग मुख्य रूप से निम्न कार्यों में किया जाता है—
- एंटी-पोचिंग गश्त
- वन रक्षक एवं सुरक्षा दल
- कैमरा ट्रैप मॉनिटरिंग
- वन्यजीव आवास सुधार
- जल स्रोत निर्माण
- घासभूमि विकास
- ईको-विकास समितियाँ
- ग्रामीण जागरूकता कार्यक्रम
- वन्यजीव बचाव एवं उपचार
इन गतिविधियों का उद्देश्य बाघों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना होता है।
पाँच वर्षों में बाघों की मौतें
उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों और मीडिया में प्रकाशित जानकारी के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि सिवनी जिले तथा पेंच के कोर, बफर एवं आसपास के वन क्षेत्रों में पिछले पाँच वर्षों के दौरान लगभग 22से25बाघों की मौत दर्ज हुई।
अनुमानित वर्षवार स्थिति—
| वर्ष | अनुमानित संख्या |
| 2020 | 4 |
| 2021 | 5 |
| 2022 | 6 |
| 2023 | 4 |
| 2024–25 | 4–5 |
महत्वपूर्ण: ये आँकड़े आधिकारिक पाँच-वर्षीय समेकित सूची नहीं हैं। वास्तविक संख्या अलग हो सकती है।
मौतों के प्रमुख कारण
- क्षेत्रीय संघर्ष
विशेषज्ञों के अनुसार बाघों की बढ़ती संख्या के साथ नर बाघों के बीच क्षेत्रीय संघर्ष भी बढ़ता है। कई मामलों में यह संघर्ष जानलेवा साबित होता है।
- प्राकृतिक मृत्यु
वृद्धावस्था, बीमारी और प्राकृतिक कारण भी कई बाघों की मृत्यु का कारण बनते हैं। प्रसिद्ध बाघिन ‘कॉलरवाली‘ (T-15) की मृत्यु भी वृद्धावस्था से हुई थी।
- करंट और मानव गतिविधियाँ
कुछ घटनाओं में खेतों के आसपास लगाए गए बिजली के तार, अवैध करंट या अन्य मानवीय गतिविधियाँ भी बाघों के लिए घातक साबित हुई हैं।
क्या बढ़ता बजट पर्याप्त है?
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बजट बढ़ाने से संरक्षण की सफलता सुनिश्चित नहीं होती। प्रभावी निगरानी, प्रशिक्षित मानव संसाधन, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
स्थानीय समुदाय की भूमिका
पेंच के आसपास रहने वाले ग्रामीण संरक्षण प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ईको-विकास समितियों के माध्यम से वैकल्पिक रोजगार, जागरूकता और वन संसाधनों पर निर्भरता कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समुदाय की सक्रिय भागीदारी से मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम किया जा सकता है।
भविष्य की चुनौतियाँ
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौतियाँ होंगी—
- वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा
- अवैध शिकार पर नियंत्रण
- करंट से होने वाली दुर्घटनाओं की रोकथाम
- बढ़ती बाघ आबादी के लिए पर्याप्त आवास
- स्थानीय समुदाय के साथ बेहतर समन्वय
यदि इन क्षेत्रों में लगातार सुधार किया जाता है, तो संरक्षण निवेश का प्रभाव और बेहतर दिखाई दे सकता है।
पेंच टाइगर रिजर्व देश के महत्वपूर्ण बाघ संरक्षण क्षेत्रों में शामिल है, जहाँ हर वर्ष संरक्षण गतिविधियों पर उल्लेखनीय संसाधन लगाए जाते हैं। उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं से संकेत मिलता है कि पिछले पाँच वर्षों में संरक्षण कार्यों के लिए पर्याप्त वित्तीय निवेश हुआ, वहीं इसी अवधि में कई बाघों की मौतें भी दर्ज की गईं। हालांकि, इस रिपोर्ट में प्रयुक्त कुछ बजट और मृत्यु संबंधी आँकड़े अनुमानित संकलन हैं और उनकी पाँच-वर्षीय समेकित आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इन आँकड़ों को अंतिम सरकारी रिकॉर्ड के बजाय विश्लेषणात्मक संदर्भ के रूप में देखा जाना चाहिए। आने वाले समय में अधिक पारदर्शी और समेकित सार्वजनिक डेटा उपलब्ध होने से संरक्षण प्रयासों का मूल्यांकन और अधिक सटीक ढंग से किया जा सकेगा।

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