कहाँ है जलावर्धन योजना के ठेकेदार की प्रयोगशाला!

बिना प्रयोगशाला कैसे हो गया 46 करोड़ रूपये का भुगतान!

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। केंद्रीय इमदाद से सिवनी शहर की जलापूर्ति हेतु बिछायी जा रही भूमिगत पाईप लाईन एवं अन्य कामों के लिये प्रयोगशाला का अता-पता नहीं है और नगर पालिका के तकनीकि अमले के द्वारा किये गये सत्यापन के बाद ठेकेदार को 62 करोड़ 55 लाख रूपये में से 46 करोड़ रूपये का भुगतान कर भी दिया गया है।

नगर पालिका के उच्च पदस्थ सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि नगर पालिका में भर्राशाही का आलम है। सरकारी अधिकारियों के द्वारा मनमाने तरीके से काम कराया जाता रहा है। अधिकारियों की मनमानी पर भाजपा के नेत्तृत्व वाली चुनी हुई परिषद के कारिंदों ने भी कभी प्रश्न चिन्ह लगाने की जहमत नहीं उठायी, जिससे जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को जमकर हवा में ही उड़ा दिया गया।

सूत्रों का कहना है कि इस योजना का काम कर रहे महाराष्ट्र के कोल्हापुर की मेसर्स लक्ष्मी सिविल इंजीनियरिंग सर्विसेस प्राईवेट लिमिटेड के द्वारा निविदा की शर्तों और कार्यादेश की शर्तों का खुला उल्लंघन किया जाता रहा, पर पालिका में किसी के द्वारा भी इस ओर ध्यान देना भी मुनासिब नहीं समझा गया।

इसके साथ ही सूत्रों ने कहा कि ठेकेदार के द्वारा शहर भर में स्थान – स्थान पर बेतरतीब तरीके से पाईप रखकर आवागमन को बाधित किया जा रहा है। इसके अलावा ठेकेदार का जहाँ मन हुआ वहाँ सड़क को बुरी तरह से खोदकर रख दिया गया है। काम करने के बाद ठेकेदार के द्वारा सड़क का समतलीकरण भी नहीं कराया गया है।

दो तीन सालों से लगातार ही लोगों को आने – जाने में हो रही असुविधा के कारण अब लोग नगर पालिका को कम भारतीय जनता पार्टी को ज्यादा कोसते दिख रहे हैं। लोगों का यह भी कहना है कि पता नहीं किस दबाव के चलते सिवनी के सांसद विधायकों ने भी इस ओर से मुँह मोड़ रखा है।

पिछले साल 08 फरवरी को मुख्य नगर पालिका अधिकारी नवनीत पाण्डेय के द्वारा इस योजना के तहत चल रहे काम का सतही निरीक्षण के दौरान अनेक विसंगतियां पाये जाने पर तत्कालीन जिलाधिकारी गोपाल चंद्र डाड को पत्र लिखकर विशेषज्ञ समिति से इसकी जाँच करवाने की बात कही थी।

इसके बाद तत्कालीन जिलाधिकारी ने 13 मार्च को लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कार्यपालन यंत्री की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जाँच समिति गठित कर इसकी जाँच एक पखवाड़े में करने के निर्देश दिये गये थे। लगभग तीन चार माह बाद इस जाँच समिति के प्रतिवेदन पर जिलाधिकारी के द्वारा ठेकेदार से एक करोड़ रूपये से ज्यादा की राशि वसूलने के आदेश दिये गये थे।

पालिका के सूत्रों की मानें तो जिला स्तरीय विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा को दरकिनार करते हुए गुपचुप तरीके से जाँच करने आयी प्रदेश स्तरीय समिति के द्वारा ऑल इज वेल की तर्ज पर ठेकेदार को क्लीन चिट प्रदाय कर दी गयी और ठेकेदार को भुगतान की अनुशंसा भी कर दी गयी। सवाल आज भी वही खड़ा हुआ है कि जब ठेकेदार के द्वारा प्रयोगशाला की स्थापना ही नहीं की गयी थी तो इस योजना का काम किस आधार पर गुणवत्ता युक्त ठहराया जा सकता है!

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