जानिये क्यों मनाया जाता है दशहरा!

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। अपराजिता पूजा को विजयादशमीं का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है, हालाँकि इस दिन अन्य पूजाओं का भी प्रावधान है।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जब सूर्यास्त होता है और आसमान में कुछ तारे दिखने लगते हैं तो यह अवधि विजय मुहूर्त कहलाती है। इस समय कोई भी पूजा या कार्य करने से अच्छा परिणाम प्राप्त होता है। कहते हैं कि भगवान श्रीराम ने दुष्ट रावण को हराने के लिये युद्ध का प्रारंभ इसी मुहूर्त में किया था।

इसी समय शमी नामक पेड़ ने अर्जुन के गाण्डीव नामक धनुष का रूप लिया था। दशहरे का दिन साल के सबसे पवित्र दिनों में से एक माना जाता है। यह साढ़े तीन मुहूर्त में से एक है (साल का सबसे शुभ मुहूर्त – चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, अश्विन शुक्ल दशमीं, वैशाख शुक्ल तृतीया, एवं कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (आधा मुहूर्त))। यह अवधि किसी भी चीज की शुरूआत करने के लिये उत्तम है। हालांकि कुछ निश्चित मुहूर्त किसी विशेष पूजा के लिये भी हो सकते हैं।

क्षत्रिय, योद्धा एवं सैनिक इस दिन अपने शस्त्रों की पूजा करते हैं; यह पूजा आयुध, शस्त्र पूजा के रूप में भी जानी जाती है। वे इस दिन शमी पूजन भी करते हैं। पुरातन काल में राजशाही के लिये क्षत्रियों के लिये यह पूजा मुख्य मानी जाती थी। ब्राह्मण इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करते हैं। वैश्य अपने बहीखाते की आराधना करते हैं।

कई स्थानों पर होने वाली नवरात्रि रामलीला का समापन भी आज के दिन होता है। रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाथ का पुतला जलाकर भगवान राम की जीत का जश्न मनाया जाता है। ऐसा विश्वास है कि माँ भगवती जगदम्बा का अपराजिता स्त्रोत करना बड़ा ही पवित्र माना जाता है। बंगाल में माँ दुर्गा पूजा का त्यौहार भव्य रूप में मनाया जाता है।

दशहरा की कथा : पौराणिक मान्यता के अनुसार इस त्यौहार का नाम दशहरा इसलिये पड़ा क्योंकि इस दिन भगवान पुरूषोत्तम राम ने दस सिर वाले आतातायी रावण का वध किया था, तभी से दस सिरों वाले रावण के पुतले को हर साल दशहरा के दिन इस प्रतीक के रूप में जलाया जाता है ताकि हम अपने अंदर के क्रोध, लालच, भ्रम, नशा, ईर्ष्या, स्वार्थ, अन्याय, अमानवीयता एवं अहंकार को नष्ट करें।

महाभारत की कथा के अनुसार दुर्याेधन ने जुए में पाण्डवों को हरा दिया था। शर्त के अनुसार पाण्डवों को 12 वर्षों तक निर्वासित रहना पड़ा, जबकि एक साल के लिये उन्हें अज्ञातवास में भी रहना पड़ा। अज्ञातवास के दौरान उन्हें हर किसी से छुपकर रहना था और यदि कोई उन्हें पा लेता तो उन्हें दोबारा 12 वर्षों का निर्वासन का दंश झेलना पड़ता।

इस कारण अर्जुन ने उस एक साल के लिये अपनी गांडीव धनुष को शमी नामक वृक्ष पर छुपा दिया था और राजा विराट के लिये एक ब्रिहन्नला का छद्म रूप धारण कर कार्य करने लगे। एक बार जब उस राजा के पुत्र ने अर्जुन से अपनी गाय की रक्षा के लिये मदद माँगी तो अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने धनुष को वापिस निकालकर दुश्मनों को हराया था।

एक अन्य कथानुसार जब भगवान श्रीराम ने लंका की चढ़ायी के लिये अपनी यात्रा का श्रीगणेश किया तो शमी वृक्ष ने उनके विजयी होने की घोषणा की थी।

 

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