वैश्यालय की मिट्टी से निर्मित होती है देवी प्रतिमा!

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। वैश्या का नाम लेना भी जहाँ सभ्य समाज में अच्छा नहीं माना जाता है वहीं आपको जानकर हैरानी होगी कि नवरात्र में माँ दुर्गा की प्रतिमा के निर्माण के लिये वैश्यालय की मिट्टी लायी जाती है। इस मिट्टी को मिलाकर देवी की प्रतिमा का निर्माण किया जाता है। इस बात का जिक्र कुछेक फिल्मों में भी किया गया है।

जानकारों का कहना है कि दुर्गा, हमारी अंर्तचेतना की उस परम क्षमता का नाम है, जो हमारी कर्मजनित दुर्गति को आमूलचूल नष्ट करने की ऊर्जा से लबरेज है, जबकि नवरात्र पर्व शक्ति को बाहर पण्डालों में स्थापित करने से अधिक अपनी बिखरी हुए ऊर्जा को स्वयं में समेटने, सहेजने का समय है। इसके लिये नवरात्रि पर देवी की प्रतिमा की स्थापना पूर्णतः वैज्ञानिक है जो जगत में सामाजिक सुधारों की पताका लिये किसी मिशन की तरह है।

जानकारों की मानें तो ग्रंथों में दुर्भाग्य को दूर करने के लिये प्राचीन काल में अहोरात्रि के नाम से प्रचलित आज की नवरात्रि में शक्ति की वैज्ञानिक पूजा का उल्लेख प्राप्त होता है। इसमें पूजन के लिये विशिष्ट प्रतिमा के निर्माण का उल्लेख मिलता है, जिसके समक्ष मंत्रजप और सप्तशती के सस्वर पाठ की स्वर लहरियां कर्ण से मस्तिष्क में प्रविष्ट होकर अपार मानसिक बल और आत्मविश्वास संचार करते हैं। इसके साथ ही यह हमारे विराट आभा मण्डल का भी निर्माण करते हैं।

बताया जाता है कि शारदातिलकम, महामंत्र महार्णव, मंत्रमहोदधि जैसे ग्रंथ और कुछ पारम्परिक मान्यताएं इसकी पुष्टि करते हैं। बांग्ला मान्यताओं के अनुसार गोबर, गौमूत्र, लकड़ी व जूट के ढांचे, धान के छिलके, सिंदूर, विशेष वनस्पतियां, पवित्र नदियों की मिट्टी और जल के साथ निषिद्धों पाली के रज के समावेश से निर्मित शक्ति की प्रतिमा और यंत्रों की विधि पूर्वक उपासना को लौकिक और पारलौकिक उत्थान की ऊर्जा से सराबोर माना गया है।

वहीं, निषिद्धो पाली वैश्याओं के घर या क्षेत्र को कहा जाता है। कोलकाता का कुमरटली इलाके में भारत की सर्वाधिक देवी प्रतिमा का निर्माण होता है। वहाँ निषिद्धांें पाली के रज के रूप में सोनागाछी की मिट्टी का इस्तेमाल होता है। सोनागाछी का इलाका कोलकाता में देह व्यापार का गढ़ माना जाता है। तन्त्रशास्त्र में निषिद्धो पाली के रज के सूत्र काम और कामना से जुड़े हैं।

कहा गया है कि तंत्र यानी प्राचीन विज्ञान। तन का आनंद या दैहिक सुख तांत्रिय उपासना के मुख्य उद्देश्य हैं। आध्यात्म में कामचक्र को ही कामना का आधार माना जाता है। यदि काम से जुड़े विकारों को दुरुस्त कर लिया जाये और ऊर्जा प्रबंधन ठीक कर लिया जाये तो भौतिक कामनाओं की पूर्ति का मार्ग सहज हो जाता है।

जानकारों का कहना है कि आध्यात्म के इन सूत्रों को जानकर व्यक्ति चाहे तो अपनी ऊर्जा कामचक्र पर खर्च कर यौन आनन्द प्राप्त कर ले, चाहे तो उसी चक्र को सक्रिय कर अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति कर लें। दैवीय प्रतिमा में निषिद्धो पाली की मिट्टी के प्रयोग की परंपरा स्वयं में सामाजिक सुधार के सूत्र भी सहेजे दिखायी देती हैं। यह परंपरा पुरुषों की भूल की सजा भुगतती स्त्री के उत्थान और सम्मान की प्रक्रिया का हिस्सा भी प्रतीत होती है।

 

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