विभाग को नहीं पता कितनी तादाद है राज्यपक्षी की!

 

 

 

 

(ब्यूरो कार्यालय)

भोपाल (साई)। दूधराज (सुल्ताना बुलबुल) को मप्र का राज्यपक्षी घोषित हुए 34 साल हो रहे हैं, लेकिन प्रदेश में इस पक्षी की संख्या कितनी है, राज्य सरकार से लेकर वन विभाग तक किसी को पता नहीं है।

राज्यपक्षी होने के बावजूद सरकार और विभाग ने इसके संरक्षण पर कभी ध्यान नहीं दिया। यहाँ तक कि पक्षी के रहनसहन को लेकर भी अध्ययन नहीं कराया गया। अब पड़ोसी राज्य राजस्थान के राज्यपक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) की दुर्दशा देखकर सरकार आकलन (गणना) की तैयारी कर रही है। दूधराज को 1985 में मध्य प्रदेश का राज्यपक्षी घोषित किया गया है।

वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संकटाग्रस्त प्रजातियों की सूची में दूधराज को कम चिंता वाले पक्षियों की श्रेणी में रखा गया है। हालांकि पक्षी प्रेमी बताते हैं कि यह पक्षी आमतौर पर मप्र के सभी संरक्षित क्षेत्रों (नेशनल पार्क, अभयारण्य) में मिल जाता है, लेकिन आसानी से देखने को नहीं मिलता है। इसलिए यह कहना एकदम उचित नहीं होगा कि यह प्रजाति पूरी तरह से सुरक्षित है और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सुदेश वाघमारे कहते हैं कि वैसे अभी कोई संकट नहीं है, लेकिन राज्यपक्षी होने के नाते दूधराज को भी देखरेख की जरूरत है।

दूधराज की संख्या को लेकर वन अफसरों का अपना तर्क हैं। वे कहते हैं पक्षियों की गिनती नहीं हो सकती। जबकि पक्षी विशेषज्ञ एवं रिटायर्ड वन अफसर एमएस हसन कहते हैं कि ये बहानेबाजी है। अफसर चाहें, तो पक्षियों की गिनती भी हो सकती है। जैसे गिद्धों की गिनती की गई है। ठीक वैसे ही दूधराज की संख्या का भी आकलन किया जा सकता है। वे कहते हैं कि प्रदेश में वाइल्ड लाइफ ट्रेंड अफसर नहीं हैं, इसलिए ऐसी बातें कर रहे हैं। ऐसे अफसर किताबों पर निर्भर हैं। गिनती कैसे नहीं हो सकती है।

एमएस हसन का कहना है कि अफसरों को दंड के तौर पर वाइल्ड लाइफ में पोस्टिंग न दी जाये, जो वाइल्ड लाइफ से प्रेम रखता हो, उसे इस शाखा में रखा जाये तो कोई समस्या नहीं आ सकती। वे कहते हैं कि वर्ष 1979 में सोनचिरैया को लेकर सर्वे किया था। तब करेरा और घाटीगांव में पांच पक्षी मिले थे। तभी दोनों को अभयारण्य बनाया गया था। दोनों को अभयारण्य बनाने में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विशेष रुचि ली थी।

अब 10 लाख रुपए खर्च करेगा विभाग : इधर, अब दूधराज की संख्या पता करने और उसके रहन-सहन का अध्ययन करने पर विभाग 10 लाख रुपए खर्च करेगा। पिछले दिनों सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। फिलहाल केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जायेगा। वहां से मंजूरी के बाद अध्ययन शुरू होगा।

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