पिछली बार 2583 में से 1897 थे निर्दलीय

 

(ब्यूरो कार्यालय)

भोपाल (साई)। इस बार के चुनाव में सवर्ण आंदोलन से उपजी सपाक्स पार्टी के असर से निर्दलियों की संख्या पर खासा असर पड़ेगा, क्योंकि बीते चुनाव में निर्दलियों में ज्यादातर सवर्ण और ओबीसी जातियों से ही थे, इसलिये सपाक्स का प्लेटफॉर्म मिलने से इस बार निर्दलियों की संख्या में कमी आ सकती है।

प्रदेश की सत्ता और विपक्ष भले ही भाजपा और काँग्रेस के दो धुर्वों में बंटा हो, लेकिन चुनावी समर में छोटी पार्टियों के अलावा बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार सत्ता के खेल को बनाते और बिगाड़ते हैं। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों ने 686 प्रत्याशी मैदान में थे। वहीं निर्दलीय की संख्या इनसे लगभग तीन गुना अधिक थी। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों पर कुल 2583 प्रत्याशियों ने किस्मत आजमायी थी, इनमें से 1897 निर्दलीय थे।

हालांकि इनमें से सिर्फ तीन निर्दलीय ही जीतने में कामयाब रहे। 230 विधानसभा सीटों पर कुल 226 उम्मीदवार ऐसे भी थे जो काँग्रेस और भाजपा को छोड़कर किसी तीसरे राजनीतिक दल के बैनर तले चुनावी रण में उतरे थे। इनमें सीपीआई, सीपीएम, बीएसपी और एनसीपी जैसे राष्ट्रीय दलों के साथ ही समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, समानता दल जैसी क्षेत्रीय दल भी शामिल थे।

भाजपा काँग्रेस के अलावा तीसरे दल से सिर्फ बहुजन समाजवादी पार्टी के 04 उम्मीदवार ही जीत का स्वाद चख पाने में कामयाब रहे थे। इस बार के चुनाव में सवर्ण आंदोलन से उपजी सपाक्स पार्टी के असर से निर्दलियों की संख्या पर खासा असर पड़ेगा।

गौरतलब है कि बीते चुनाव में निर्दलियों में ज्यादातर सवर्ण और ओबीसी जातियों से ही थे। सपाक्स के कारण इन जातियों में इस बार सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के प्रति भारी गुस्सा है। सपाक्स का प्लेटफॉर्म मिलने से इस बार निर्दलियों की संख्या में कमी आ सकती है।

तीन निर्दलीय ही जीतने में रहे कामयाब : पिछले विधानसभा चुनाव में सिवनी से दिनेश राय (मुनमुन), सीहोर से सुरेश राय और थांदला (झाबुआ) से कलसिंह भावर ही चुनाव जीत सके थे। बसपा के ये 04 प्रत्याशी जीते थे : बलबीर दण्डौतिया, दिमनी (मुरैना), सत्य प्रकाश सखवार, अंबाह (मुरैना), ऊषा चौधरी, रैगाँव (सतना), शीला त्यागी, मनगवां (रीवा)।

मैदान में थे राजनीतिक पार्टियों के 10 उच्च शिक्षित प्रत्याशी, लेकिन तीन ही जीत पाये : राजनीतिक पार्टियों से लड़ने वाले 10 प्रत्याशी ऐसे भी थे, जो हाईली क्वालीफाइड (उच्च शिक्षित) यानी पोस्ट ग्रेजुएट के साथ ही साथ एमफिल और डॉक्टरेट की डिग्रीधारी भी थे। हालांकि इनमें से सिर्फ 03 ही जीतने में कामयाब रहे, जबकि 07 को हार का मुँह देखना पड़ा।

हारने वालों में दो भाजपा के और पाँच काँग्रेस के थे। 150 उम्मीदवार पोस्ट ग्रेजुएट और 140 ग्रेजुएट थे। 127 उम्मीदवार 12वीं और 71 उम्मीदवार 10वीं तक ही पढ़े लिखे थे। एक उम्मीदवार निरक्षर और 24 साक्षर थे, जबकि 42 उम्मीदवार पाँचवीं तक और 37 आठवीं तक पढ़े लिखे थे।

 

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