बर्बाद होते जल संसाधन

 

 

जरूरी मुद्दों पर खामोशी और वक्त रहते उनकी चिंता न करना हमारी प्रकृति में इस कदर घुल-मिल चुका है कि बार-बार बजता अलार्म भी हम नहीं सुन रहे। पानी ऐसा ही बड़ा मुद्दा है, जिसकी अनदेखी अब भारी पड़ने वाली है। लगातार कम होती गई हमारी जल भंडारण क्षमता ने इसे भयावह बना दिया है। 1968 के बाद से कोई नया बांध न बनने का नतीजा है कि वर्षा जल पूरी तरह समुद्र में समा जा रहा है। विश्व बैंक भी पाकिस्तान द्वारा अपने जलस्रोतों की उपेक्षा से होने वाले नुकसान के प्रति आगाह करता रहा है।

इस सब पर गौर करें, तो यही समझ में आता है कि हमारे आर्थिक कर्णधारों ने बर्बादी बुलाने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। कई रिपोर्टों में पानी और पानी पर निर्भर पारिस्थितिक तंत्र, यानी नदियों, झीलों, तालाबों और सिंधु डेल्टा के पर्यावरणीय नतीजों की अनदेखी की चेतावनी दी जा चुकी है, लेकिन कभी उन्हें तवज्जो नहीं मिली। यह समझना ही नहीं चाहा कि इन स्रोतों का क्षरण जैव-विविधता के लिए तो घातक है ही, मीठे पानी के भंडारण और सदाबहार जंगलों के लिए भी नुकसानदेह साबित हुआ है।

बार-बार बताया गया है कि जल संसाधन प्रबंधन के कुप्रबंधन और जल वितरण की खराब व्यवस्था ने जल सुरक्षा के मूलभूत सिद्धांतों की उपेक्षा की। सिंचाई और जल निकासी के कुप्रबंधन ने इसमें इजाफा किया। रिपोर्ट कहती है कि डाटा संग्रह और उसके विश्लेषण की कोई कारगर व्यवस्था न होने से नतीजों तक पहुंचने और उनके आधार पर भविष्य की कोई तैयारी करने में असमर्थता के कारण भी संकट बढ़ा। हालात के मद्देनजर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जलवायु परिवर्तन के प्रति अनदेखी के कारण आने वाले दिनों में हमें बाढ़ और सूखा, दोनों संकटों के नए और भयावह रूप देखने को तैयार रहना चाहिए। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिंचाई और शहरी जल-व्यवस्था को सामान्य बनाए रखना है, पर सबसे बड़ी चुनौती तो खराब और अपर्याप्त कानूनी ढांचे और नीतियों के जमीनी क्रियान्वयन की है। (द एक्सप्रेस ट्रिब्यून, पाकिस्तान से साभार)

(साई फीचर्स)

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