भंवर में फंसा अन्नदाता!

 

 

(शरद खरे)

जिले में अन्नदाता किसान की सुध लेने वाला सालों से कोई भी नहीं दिख रहा है। अन्नदाता किसान कितनी मेहनत से फसल उगाता है इस बात का अंदाजा कार्यालय में बैठे अधिकारी और कर्मचारी नहीं लगा सकते हैं। दिन रात मेहनत कर किसान उपज पैदा करता है।

कुछ सालों से हुक्मरानों के द्वारा किसानों की फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदना आरंभ किया गया है। यह योजना किसानों के हित की मानी जा सकती है किन्तु किसानों को अपनी ही फसल बेचने और उसका वाजिब मूल्य प्राप्त करने में कितनी परेशानी का सामना करना पड़ता है, इस ओर अब तक किसी के द्वारा भी ध्यान नहीं दिया गया है।

किसानों के गाढ़े पसीने से सिंचित फसल को जब सरकारी स्तर पर खरीदकर उसे खुले में रख दिया जाता है और पानी, ओलों की मार के बाद वह अंकुरित होने लगती है तो किसानों पर क्या बीतती होगी इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। भले ही किसान को उस फसल का मूल्य मिल जाता हो पर अन्न की इस तरह से होने वाली बर्बादी से किसान की आत्मा आँसू अवश्य ही बहाती होगी।

हाल ही में किसानों की फसल की सरकारी खरीदी बंद होने के पहले कुछ किसान जिनकी फसल की तुलाई नहीं हो पायी थी उन्हें टोकन प्रदाय कर दिये गये हैं। किसान अपनी फसल लेकर खरीद केंद्र में बैठे हैं। दिन-रात उन्हें इस बात की चिंता सताती है कि कहीं उनकी फसल चोरी न हो जाये। मौसम की अनिश्चितता के चलते भी किसानों को यह भय सताता है कि अगर पानी गिर गया तो उनकी फसल गीली हो जायेगी और उसके बाद उनकी फसल को सरकार शायद ही खरीदे।

आज की संचार क्रांति के युग में भी अधिकारियों के द्वारा किसानों को दिये गये टोकन के बाद फसल खरीदने के लिये मुख्यालय स्तर से आने वाले आदेश की प्रतीक्षा है। जिले में चार विधायक और दो सांसद हैं। ये सभी मिलकर अगर एक बार संबंधित उच्चाधिकारी से बात कर किसानों की फसलें खरीदने के आदेश जारी करवा दें तो किसानों को राहत मिल सकती है, पर हो सकता है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों के पास किसानों की इस पीड़ा का निदान करने से भी जरूरी दीगर मामले सुलझाने हों, वरना क्या कारण है कि इस तरह के संवेदनशील मामले में सांसद, विधायक मौन साधे बैठे हैं।

किसानों की पीड़ा को समझा जा सकता है। किसान अपना सारा काम छोड़कर दिन रात अपनी फसल की सुरक्षा को लेकर ही चिंतित है। वह सप्ताह भर से अधिक समय से अपने घर से बाहर खरीद केंद्र में ही अपना डेरा बनाये हुए होगा। गरीब किसान वहाँ किस तरह खाना पीना और अन्य काम कर दिनचर्या को संपादित कर रहा होगा, इस बात को सोचने देखने की फुर्सत किसी को नहीं है।

इस मामले में काँग्रेस और भाजपा के संगठनों ने भी अपना मौन नहीं तोड़ा है। संवेदनशील जिलाधिकारी प्रवीण सिंह से जनापेक्षा है कि इस संवेदनशील मामले में वे ही स्वसंज्ञान से पहल करते हुए किसानों को दिये गये टोकन के एवज में जल्द से जल्द अनाज की खरीदी के आदेश जारी करवायें ताकि किसानों को इस तरह की समस्या से मुक्ति मिल सके।

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