जर्जर शाला भवनों में नौनिहाल!

 

(शरद खरे)

सरकारी शालाओं में अधिकांश शालाओं के भवन बुरी तरह जर्जर हो चुके हैं। इन शाला भवनों की सुध लेने की फुर्सत न तो सांसदों को दिख रही है और न ही विधायकों को। रही बात शिक्षा और आदिवासी विकास विभाग की तो इनके द्वारा महज कागजी खानापूर्ति ही की जा रही प्रतीत हो रही है।

एक समय था जब एक जुलाई से शैक्षणिक सत्र की शुरूआत होती थी। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नये-नये प्रयोगों से अब अप्रैल माह से ही शैक्षणिक सत्र का आगाज कर दिया जाता है। इसके बाद कुछ दिनों का अवकाश और फिर जून से पुनः शालाएं आरंभ करवा दी जाती हैं।

वातानुकूलित कक्षों में बैठकर विद्यार्थियों के लिये योजनाएं बनाने वाले केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय एवं प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों को शायद जमीनी हकीकतें नहीं पता हैं। कहाँ कैसी भौगोलिक स्थिति है, कहाँ किस तरह का मौसम है? कहाँ किस तरह से अध्ययन-अध्यापन किया जाना चाहिये, इस बात से हाकिमों को कोई लेना-देना प्रतीत नहीं होता है। सब धान एक पसेरी की कहावत को चरितार्थ करते हुए कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक ही नीति को लागू कर दिया जाता है।

भोपाल और दिल्ली में बैठे हाकिमों को इस बात की जानकारी नहीं है कि देश-प्रदेश में सरकारी स्कूलों के क्या हाल हैं। शाला भवन जर्जर हो चुके हैं। कहीं-कहीं तो ब्रितानी हुकूमत काल के शाला भवनों में अपनी जान हथेली पर रखकर विद्यार्थियों द्वारा शिक्षा अर्जन का काम किया जा रहा है।

सिवनी जिले में भी अनेक शालाओं के भवन ऐसे हैं जो जर्जरावस्था को प्राप्त हो चुके हैं। शहर के अंदर ही हिन्दी मेनबोर्ड स्कूल हो या लखनवाड़ा की शाला हर जगह एक सा आलम है। जर्जर भवन की टपकती शालाओं में बच्चे किस तरह पढ़ रहे होंगे, इस बात को समझा जा सकता है।

शालाओं की दुरावस्था को रोकने के लिये स्कूल शिक्षा विभाग के द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी और आदिवासी विकास विभाग की शालाओं के लिये सहायक संचालक आदिवासी विकास का पद सृजित किया गया था। इन दोनों ही विभागों में पर्याप्त अमला होने के बाद भी सालों से जर्जर शाला भवनों की मरम्मत न हो पाना भी आश्चर्य से कम नहीं माना जा सकता है।

देखा जाये तो सांसद – विधायकों का भी यह दायित्व है कि वे भी अपने संसदीय क्षेत्र और विधान सभा क्षेत्र के जर्जर शाला भवनों के स्थान पर नये भवनों के निर्माण के प्रस्ताव संबंधित मंत्री के माध्यम से वित्त विभाग को भिजवाएं एवं इसके लिये बजट प्रावधान किया जाये, इस हेतु प्रयास करें।

संवेदनशील जिला कलेक्टर गोपाल चंद्र डाड के द्वारा भी अब तक शिक्षा विभाग की ओर विशेष ध्यान नहीं केंद्रित किया गया है।  जन प्रतिनिधियों की कथित उदासीनता के बाद अब उनसे ही जनापेक्षा की जा सकती है कि वे ही इस दिशा में कारगर कदम उठाते हुए इस तरह के जर्जर भवनों की सूची बनाकर संबंधित विभाग को भेजने की कार्यवाही करते हुए बजट में प्रावधान करवाने की दिशा में पहल करेंगे।

 

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