देर रात तक चलने वालीं शल्य क्रियाएं

 

(शरद खरे)

हाल ही में छपारा में आधी रात तक ठण्ड में ठिठुरती हुई महिलाओं को इंतजार था कि नसबंदी शिविर में कब चिकित्सक आयेंगे और उनके ऑपरेशन होंगे। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में इस तरह की परिस्थितियां वाकई अमानवीय परिदृश्य से कम नहीं है। इस मामले में विचार करना नितांत जरूरी है।

सिवनी जिले में नसबंदी ऑपरेशन्स के लिये महज तीन चिकित्सक ही प्रशिक्षित बताये जाते हैं। एक हैं सिवनी शहर के वरिष्ठ निजि चिकित्सक डॉ.महेंद्र नारायण त्रिवेदी, दूसरे लखनादौन के डॉ.प्रसाद और तीसरे डॉ.विनोद कुमार नावकर। इनमें से डॉ.नावकर को छोड़ शेष दोनों निजि तौर पर चिकित्सा व्यवसाय में हैं।

डॉ.नावकर को एक साल पहले शासन के द्वारा जिला चिकित्सालय का सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक नियुक्त किया गया था। इसके बाद तत्कालीन सिविल सर्जन डॉ.राजेंद्र कुमार श्रीवास्व के द्वारा सीएस का प्रभार उन्हें नहीं दिये जाने से वे एक साल बाद इस पद पर बैठ पाये।

यह प्रशासनिक विफलता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण ही माना जा सकता है कि स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों ने विभाग में पदस्थ महिला या पुरूष चिकित्सकों को नसबंदी ऑपरेशन के लिये प्रशिक्षण देना मुनासिब ही नहीं समझा। शल्य क्रिया (सर्जरी) करने वाले चिकित्सकों को अगर समय रहते प्रशिक्षण दिलवा दिया जाता तो इस तरह की स्थिति शायद निर्मित नहीं हो पाती।

इसके अलावा एक साल पूर्व 21 दिसंबर 2017 को जब राज्य शासन के द्वारा डॉ.विनोद नावकर को सिविल सर्जन बनाने के आदेश जारी किये गये थे तब ही मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी का प्रभार देख रहे डॉ.के.सी. मेश्राम को उनके स्थान पर वैकल्पिक व्यवस्था करना आरंभ कर देना चाहिये था।

कहा जाता है कि नसबंदी की शल्य क्रिया के लिये महज एक सप्ताह या पखवाड़े भर का प्रशिक्षण पर्याप्त होता है। यक्ष प्रश्न आज भी यही खड़ा है कि क्या एक साल मेें 52 सप्ताह और 26 पखवाड़े होते हैं, क्या साल भर में किसी अन्य चिकित्सक को प्रशिक्षण के लिये नहीं भेजा जा सकता था!

चौदहवीं विधान सभा के समय जिले के चारों विधायकों को इस बारे में चिंता करने की फुर्सत नहीं मिल पायी। किसी ने भी इस दिशा में ध्यान नहीं दिया, या देना मुनासिब नहीं समझा। कहा जाता है कि विधायकों के हाथ में उस विधान सभा क्षेत्र के मतदाता पाँच सालों के लिये अपना भविष्य सौंपते हैं, इसके बाद भी अगर इस तरह की अराजक स्थिति आज भी निर्मित हो रही है तो यह निंदनीय ही माना जा सकता है।

हर मामले में जिला कलेक्टर का ध्यान आकर्षित करवाना उचित नहीं है क्योंकि हर विभाग के पास जिला प्रमुख का पद होता है और जिला प्रमुख का काम अपने विभाग की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संपादित करने का होता है पर जब विभाग प्रमुख ही अपने दायित्वों के निर्वहन में असफल रहे हों तब संवेदनशील जिला कलेक्टर गोपाल चंद्र डाड से ही जनापेक्षा की जा सकती है कि इस मामले में वे ही स्वसंज्ञान से कार्यवाही करते हुए व्यवस्थाओं को पटरी पर लाने के मार्ग प्रशस्त करें।

 

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