मवेशियों का अवैध परिवहन

 

(शरद खरे)

जिले में मवेशियों का अवैध परिवहन सतत जारी है। पुलिस की सक्रियता से यदा कदा परिवहन में लगे वाहन तो पकड़े जा रहे हैं पर आरोपियों को पकड़ने में पुलिस नाकाम रहती आयी है। जिले से होकर मवेशियों को नागपुर ले जाये जाने की बात ही ज्यादातर सामने आ रही है।

जिले से गुजरने वाले हर वाहन को रोककर उसकी तलाशी लेना शायद संभव नहीं है, पर अनुभवी पुलिस अधिकारी इस बात को बताते आये हैं कि जिस भारी वाहन में मवेशी भरे होते हैं उसकी चाल ही अलग होती है। उस वाहन का डाला (ट्रक का पिछला हिस्सा) आम वाहनों से हटकर कुछ अलग तरह से हिलता नजर आता है।

सबसे ज्यादा आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि मेटेवानी स्थित एकीकृत जाँच चौकी से होकर मवेशी ले जाने वाले वाहन किस तरह पार हो जाते हैं जबकि मेटेवानी में परिवहन विभाग के अलावा अन्य विभागों का भारी अमला तैनात है और वह वाहनों में भरी सामग्री की जाँच बारीकी से करता है।

अगर मेटेवानी जाँच चौकी से मवेशी के वाहन गुजर रहे हैं तो इसका साफ मतलब है कि दाल में कुछ काला अवश्य है। इस जाँच चौकी में कुरई पुलिस के कर्मचारी भी तैनात रहते हैं। जाहिर है कि मेटेवानी जाँच चौकी में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों की शह पर ही मवेशी का परिवहन करने वाले वाहन यहाँ से पार हो रहे हैं।

हाल ही में लखनादौन पुलिस के द्वारा एक सप्ताह में तीन ऐसे वाहनों को पकड़ा गया है जिसमें मवेशियों का परिवहन किया जा रहा था। जिले में प्रवेश पर लखनादौन के अलावा धूमा, छपारा, बण्डोल, डूण्डा सिवनी, कोतवाली, लखनवाड़ा और कुरई थानों से होकर ये वाहन गुजरते हुए नागपुर की ओर जाते होंगे।

मार्ग में पड़ने वाले इन थानों के अधिकारी कर्मचारियों के सूचना संकलन पर भी प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है। बताते हैं तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक रमन सिंह सिकरवार के द्वारा पुलिस के कुछ कर्मचारियों के मोबाईल नंबर्स के आधार पर सीडीआर निकलवाकर उन्हें ताकीद किया गया था कि उनके नंबर्स से अनेक संदिग्ध नंबर्स पर लगातार बातचीत हो रही है। इसके बाद जिले में अवैध रूप से मवेशी का परिवहन मानो थम सा गया था।

अवैध रूप से पशु परिवहन के दौरान अनेक पशु मृत अवस्था में भी पाये गये हैं, जो चिंता का विषय है। सोशल मीडिया का जादू जब सिर चढ़कर बोल रहा है तब जिला एवं पुलिस प्रशासन को चाहिये कि वे व्हाट्सएप के कुछ इस तरह के नंबर्स को सार्वजनिक करें जिन पर नागरिक इस तरह की गुप्त सूचनाएं दे सकें।

पूर्व में तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक तरूण नायक की व्यक्तिगत दिलचस्पी के चलते सिवनी पुलिस का एक एप विकसित किया गया था। इस एप की आज क्या स्थिति है यह बात शायद ही कोई बता सकता हो। दरअसल, किसी अधिकारी के द्वारा जिस भी विषय में दिलचस्पी ली जाती है उनके स्थानांतरण के उपरांत उनके सक्सेसर की प्राथमिकता कुछ और हो जाती है और पहले के अधिकारी के द्वारा की जाने वाली कवायद को बलात हाशिये पर ढकेल दिया जाता है। जिला पुलिस अधीक्षक ललित शाक्यवार से जनापेक्षा है कि वे पुलिसिंग को चुस्त दुरूस्त और जनहितैषी बनाने की दिशा में पहल अवश्य करेंगे ताकि अपराधों पर विराम लग सके।

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