पालिका को अभयदान कब तक!

 

(शरद खरे)

सिवनी जिले में महज एक नगर पालिका और दो नगर पंचायतें हैं। गिनती की पालिका और नगर पंचायत पर भी अगर प्रशासनिक नियंत्रण नहीं हो पाये तो इसे क्या माना जायेगा। नगर पालिका या नगर पंचायत का मुख्य दायित्व आखिर है क्या! देखा जाये तो नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाना ही पालिका का प्रमुख दायित्व है।

सिवनी शहर में नागरिकों को कभी पानी मिल पाता है तो कभी नहीं। जब मिलता है तो वह भी बदबूदार और गंदा पानी, जिसे पीकर नागरिक पेट की बीमारियों से जूझ रहे हैं। नवीन जलावर्धन योजना भ्रष्टाचार और अराजकता की भेंट चढ़ चुकी है। जगह-जगह खुदी सड़कें इसकी कहानी बयां कर रहीं हैं।

मॉडल रोड भी बीरबल की खिचड़ी बन चुकी है। सालों से बन रही मॉडल रोड अब तक पूरी नहीं हो पायी है। मॉडल रोड पर मनमाने डिवाईडर अपने आप में अजूबे से कम नहीं है। इस सड़क पर जनपद पंचायत कार्यालय के सामने हुए गड्ढों पर किसी की नजर नहीं पड़ रही है।

शहर में आवारा मवेशी घूम रहे हैं। बारिश के मौसम में आवारा कुत्तों की टोली लोगों को परेशान किये हुए हैं। नागरिक हलाकान हैं। सुबह शाला जाने वाले छोटे बच्चों के पीछे ये श्वान लपकते हैं। जिला अस्पताल में इनकी तादाद देखकर लगता है कि इन पर पालिका का कोई बस नहीं रह गया है।

शहर में खाली पड़े प्लाट्स में पानी भरा हुआ है। स्थान-स्थान पर गाजर घास ऊग चुकी है। मच्छरों से सभी हलाकान हैं। पालिका की फॉगिंग मशीन कहाँ चल रही है यह बात शायद ही कोई जानता हो। मच्छरों के शमन के लिये पालिका के द्वारा खरीदे जाने वाले रसायनों को कहाँ बहाया जा रहा है, यह शोध का ही विषय है।

चौक-चौराहों सहित शहर भर में आवारा मवेशियों का डेरा साफ दिखायी देता है। पुलिस भी इन जानवरों से तंग आ चुकी है। वरना क्या कारण है कि पुलिस के द्वारा इन आवारा मवेशियों के सींगों पर रेडियम चिपकाने का अभियान चलाया गया। इसके बाद भी सड़कों पर से मवेशी हट नहीं पा रहे हैं।

इस तरह के अनेक मामले हैं जो सीधे-सीधे नागरिकों से जुड़े हैं। भारतीय जनता पार्टी शासित नगर पालिका परिषद के द्वारा अगर इन सब पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और यह सब देखते सुनते हुए सांसद बोध सिंह भगत और विधायक दिनेश राय मौन हैं तो इसे क्या माना जाये!

पालिका में काँग्रेस-भाजपा सहित निर्दलीय चुने हुए पार्षद भी खतो खिताब की सियासत में लगे हैं। वे ज्ञापन तो सौंप देते हैं पर इस तरह के रसायन आदि के देयक जब पास होते हैं तो इसके खिलाफ कोई शायद ही प्रतिकार करता हो। निश्चित तौर पर पालिका की यह बेढंगी चाल शहर में भाजपा और काँग्रेस के परंपरागत मतदाताओं को इन दलों से दूर कर रही होगी।

संवेदनशील जिला कलेक्टर गोपाल चंद्र डाड से जनापेक्षा है कि पालिका की बेढंगी चाल पर अंकुश लगाने के लिये किसी तेज तर्रार उप जिलाध्यक्ष को पालिका का प्रभारी अधिकारी बनायें ताकि लोग राहत महसूस कर सकें।

 

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