यहां बिखरे पड़े हैं 1500 वर्ष पुराने शिवलिंग

 

छत्‍तीसगढ के कवर्धा जिला मुख्यालय से 55 और चिल्फीघाटी से पांच किमी दूर सीमा पर ग्राम बेंदा में सदियों पुरानी शिवलिंग के अवशेष बिखरे पड़े हैं। विभागीय उपेक्षा के चलते यहां की कलाकृतियां धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो रहीं हैं। जबकि यहां के पुरातात्विक धरोहर को सहेजकर रखने में की आवश्यकता है।

जानकारी के अनुसार 600 से 800 ईस्वी के बीच निर्मित इन मूर्तियों में से कई मूर्तियां चोरी भी हो गई हैं। बावजूद इसके इनकी सुरक्षा व संरक्षण को लेकर प्रशासन गंभीर नहीं है। जबकि इसकी जानकारी क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, शासन प्रशासन सभी को है।

खुले आसमान के नीचे रखे जाने की वजह से धूल व ओस के पानी से मूर्तियों का क्षरण हो रहा है। आने वाले समय में इसका रखरखाव नहीं किया गया तो ये विलुप्त हो जाएंगे। समय-समय पर गांव के लोग साफ-सफाई करते तो हैं, लेकिन सही रखरखाव के अभाव में मूर्तियों का अस्तित्व खतरे में है।

ग्रामीण शिवलिंग को सहेजकर रख तो रहे हैं पर आसपास बखरे तरह-तरह की अन्य कलाकृति, मूर्तियों का क्षरण होने से ये मूर्तियां का अस्तित्व खत्म हो रहा है। शिवलिंग के आसपास रखी कलाकृति प्राचीन मूर्तियां जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़ा है।

जिले के पुरातात्विक महत्व में शामिल होने के बावजूद इस प्राचीन शिवलिंग व कलाकृतियों का रखरखाव नहीं किया जा रहा है। प्रशासन की अनदेखी के चलते पुरातत्व व ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को पहचान नहीं मिल पा रही है। जबकि जिले में स्थित प्रसिद्ध मंदिर भोरमदेव का अभिन्न अंग है। जो फणिनागवंशी द्वारा निर्मित कराया गया था। इसी का भी अंग पचराही में स्थित पुरातात्विक मूर्तियां है।

घने जंगलों के बीच होने से लोगों का आना जाना कम होता है। 20 से 25 वर्ष पहले की बात करें तो लोग पिकनिक के रूप में घूमने आते थे। लेकिन अब यह स्थल विलुप्त होने की कगार पर है।

जबकि वर्षों पुरानी प्राचीन कलाकृति मूर्तियां विद्यमान है। गांव के बुजुर्गों ने बताया कि 50 से 60 साल पहले शिवलिंग के पास स्थित चकिये (जिससे दाल, गेहूं पीसा जाता है) की आवाज अचानक रात के समय सुनाई देती थी। ऐसा लगता था मनो कोई चक्की चला रहा हो। अगर इस क्षेत्र को पुरातत्व व पर्यटन का दर्जा मिल जाए तो जिले को एक और दार्शनिक स्थल मिल जाएगा।

(साई फीचर्स)

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