दांव पर संघ मशीनरी

(हरि शंकर व्यास)

मध्य प्रदेश की प्रदेश कांग्रेस और कमल नाथ ने आरएसएस की मशीनरी को सक्रिय बनवाया है। संघ परिवार के तमाम संगठन भाजपा की जीत के लिए शिद्दत से एक्टीव है। यों अपनी थीसिस है कि संघ और उसकी मशीनरी को राजनीति व चुनावी मायने में अनावश्यक अधिक महत्व दिया जाता है। उसकी ताकत बढ़ चढ़ कर आंकी जाती है। संगठन में उतनी ताकत नहीं है जितनी लोग मानते है। जीत होती है तो संघ वाले अपने सिर सेहरा बंधवा लेते हैं और हारते हैं तो ठिकरा भाजपा के नेताओं, सत्ता पर फोड़ते है। बावजूद इसके कार्यकर्तांओं की संख्या की हकीकत अपनी जगह है। पहले इन कार्यकर्ताओं में असंख्य मध्य प्रदेश में 15 साल की एंटी- इनकंबेसी के चलते विधायकों, शिवराज सरकार की वापसी के लिए पसीना बहाने के मूड में नहीं थे। मगर कांग्रेसी घोषणापत्र में संघ शाखाओं पर पाबंदी और उसके बाद की घटनाओं ने कार्यकर्ताओं का मनोभाव बदला। नतीजतन अब संघ के स्कूली से ले कर किसान संगठन सब अपने पर आई आंच मान भाजपा को जीताने में जुटे हैं। तभी गांव-देहात से रिपोर्ट है कि संघ कार्यकर्ता कमरों में, स्कूल-मंदिर, पंच-सरपंचों की बैठके ले कर नाराज, हताश, गुस्साएं समर्थकों को मनाने में जुटे हैं।

यह बेसिक सक्रियता है। इसके आगे का चुनावी पहलू सरकार से लाभ पाए लाभार्थियों में प्रचार का है। अमित शाह और संघ की मशीनरी में बूथ लेवल के प्रबंधन में परचा प्रमुख के तहत बूथ इलाके में लाभार्थियों की लिस्ट से वोट डलवाने का पहलू बहुत बारीक है। मतलब जिन-जिन को मकान बनाने के लिए कर्ज मिला, उज्जवला में गैस सिलेंडर, फसल बोनस जैसी नकद सब्सिड़ी मिली है उन लोगों के घर जा कर आखिरी दिनों में यह याद कराना कि शिवराजसिंह ने, नरेंद्र मोदी ने आपको फंला-फंला फायदा कराया तो आपकों कमल पर वोट डालना चाहिए या नहीं?

ऐसी कनवेसिंग, ऐसा प्रचार सोशल मीडिया के नेटवर्क में भी गुंथा हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सोशल मीडिया की टीम बूथ लेवल के व्हाट्सअप ग्रुप से, नमों एप से लाभार्थियों को जोड़ने का नेटवर्क लिए हुए है। लाभार्थी से नमो एप, व्हाटसअप के जरिए अपील है तो संघ परिवार की मशीनरी के कार्यकर्ताओं से लाइव संपर्क में उसे नियोजित किया हुआ है। हां, रायपुर, भोपाल, जयपुर सब जगह प्रदेश सत्ता के अलावा मोदी-शाह की केंद्रीय सोशल मीडिया टीम ने बूथ लेवल की व्हाट्सअप  चेनलों में केपैंनिंग की हुई है तो सरकारी योजनाओं से लाभ पाएं लाभार्थियों की लिस्ट लिए कार्यकर्ताओं का अलग जनसंपर्क चल रहा है।

उस नाते मध्य प्रदेश के चुनाव मोदी-शाह के लोकसभा चुनाव का माइक्रों प्रबंधन रिहर्सल भी है। इसमें आरएसएस और संघ के संगठन अपने-अपने हिसाब से गांव-देहात में अपनी पहुंच, पकड को जांच रहे है। यों बिहार विधानसभा चुनाव के अनुभव में मैंने संघ मशीनरी का वह हल्ला फेल हुआ बूझा था जिसमें दलित वोटों को रिझाने के लिए संघ मशीनरी के बस्ती-बस्ती प्रचार की बात थी। जीतनराम मांझी को साथ लेने के बावजूद संघ मशीनरी मुषहर बस्तियों में बुरी तरह तब फ्लॉप थी।

उस नाते मध्य प्रदेश के मंदसौर, नीमच याकि किसान आंदोलन के केंद्र में संघ का किसान संगठन भावांतर, फसल बोनस के लाभ के हवाले किसानों को पहले की तरह पटा ले इसके आसार कम है। बावजूद इसके किसानों के गुस्से को शांत या नोटा में बदला जा सकता है। जाहिर है मध्य प्रदेश के हवाले संघ मशीनरी की परीक्षा यह भी है कि हिंदू के हवाले वोट पटेंगे या लाभार्थी होने के हवाले? इसी पर फिर पांच महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव का दारोमदार है!

अपना मानना है कि मध्य प्रदेश के प्रचार में अभी जो मोड़ आए और जो हो रहा है वह आम चुनाव के वक्त भी होगा। कांग्रेस, सेकुलर पार्टियां और साधू-संत हिंदू भावनाओं को तब हवा देगें तो नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों की सूची उपलब्ध करवा कर संघ सगंठनों, पार्टी संगठन और सोशल मीडिया टीम को घर-घर दौड़ाएंगे।

उस नाते मध्य प्रदेश के चुनाव में दांव पर बहुत कुछ है। अहम जनता के अनुभव का पहलू है। एक स्तर पर अपना मानना है कि चुनाव में या तो भविष्य की उम्मीद से हवा होती है या पिछले पांच सालों का जनता का अनुभव बोलता है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस या कमल नाथ से कोई उम्मीद नहीं है। लोगों का अनुभव निर्णायक होता लगता है। उस अनुभव में नरेंद्र मोदी की वजह से शहरों में गुस्सा है तो गांव-देहात में शिवराजसिंह चौहान का लिहाज है। इस हकीकत में संघ की मशीनरी या सोशल मीडिया का हल्ला बोल क्या और कितना वोट के वक्त वास्तविक प्रभाव डालेगा, इसे न तो जांचा जा सकता है और न जांचने का कोई तरीका है।

जैसा मैं पहले लिख चुका हूं। छतीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान तीनों प्रदेशों में सहज सियासी माहौल वाले चुनाव है। एक तरफ सत्ता पक्ष अपने सत्ता दमखम, लंबे अनुभव और तमाम तरह के संसाधनों से चुनाव लड़ रहा है तो उसे संघ की मशीनरी और सोशल मीडिया की नई तकनीक का भी अपूर्व सहयोग है। इसके अलावा नरेंद्र मोदी और अमित शाह की लोकसभा तैयारियों के उन माइक्रों प्रबंधनों का सहारा अलग है जिन्हे तकनीक, मेहनत, दूरद़ृष्टि और करों-मरों की धुन में बनाया हुआ है। जान ले कि मोदी-शाह की तैयारियों के आगे पूरा विपक्ष शून्य, जीरो समझ, साधन और धुन लिए हुए है। ठिक विपरित कांग्रेस में जो है वह जनता के आसरे हैं।

जो हो, इन तीन विधानसभा चुनावों में विपक्ष के लिए ले दे कर जनता का शासन अनुभव वोट की कुंजी है। उस अनुभव को भाजपा के लिए वोट अनुकूल बनाने में संघ मशीनरी ने अपने आपको जैसे झौंका है वह उसकी परीक्षा है तो नरेंद्र मोदी-अमित शाह के लिए 2019 के आम चुनाव की तैयारियों का पूर्वाभ्यास है। जाहिर है ग्यारह दिशंबर के नतीजे हिंदू भावना और संघ मशीनरी की ताकत की नब्ज लिए हुए होंगे।

(साई फीचर्स)

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