छुट्टी में टॉय-ट्रेन और शांति!

 

 

(श्रुति व्यास)

छुट्टियों का अपना मजा होता है और यह मजा तब और ज्यादा आता है जब मनपसंद जगह छुट्टियां बिताने का मौका मिले। इन जगहों में एकदम शांत, चौन की जगह का आकर्षण अलग होता है। छुट्टी के लिए शांत जगह की तलाश में यह सवाल अक्सर उठता है कि कहां जाएं? उस नाते हरियाली, बर्फ जैसे कुदरती आनंद में शांत वातावरण के लिए पहाड़ों से ज्यादा भला अच्छी जगह और क्या हो सकती है!

मैं हाल में कसौली गई। एकदम स्वच्छंद माहौल वाला ठिकाना, जहां शांति का आनंद मिला। धरमपुर और बारोग के छोटे-निराले रेलवे स्टेशन। ये दोनों स्टेशन कालका-शिमला लाईन पर ही पड़ते हैं। कालका-शिमला ट्रैक यूनेस्को की विरासत में शामिल है और टॉय-ट्रेन के लिए मशहूर है। यह टॉय-ट्रेन 880 पुलों, 919 मोड़ों और 102 सुररंगों से होकर गुजरती है। इसका मजा ही बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक को अपनी ओर खींच लाता है।

टॉय-ट्रेन इंजीनियरिंग कौशल की एक बेजोड़ मिसाल है। छोटे-छोटे चचौड़े पहियों पर धीरे-धीरे दौड़ती इस ट्रेन की खिड़कियों से आपको चारों ओर बलूत (ओक), देवदार, भिंसा (विलोज) के पेड़ देखने को मिलेंगे और साथ ही गुलाबी-लाल-बैंगनी रंग के बड़े-बड़े खिलते फूल ही फूल नजर आएंगे। भला इससे ज्यादा प्रकृति का आनंद और कहां! पर इन सबसे ज्यादा तो इसके छोटे-छोटे स्टेशनों का मजा है।

टॉय-ट्रेन में मै कोई पहली बार नहीं घूम रही थी। पहली बार गर्मियों की छुट्टियों में मैं पहाड़ घूमने गई थी। तब मैं दस साल की थी। उस वक्त की यादें अब कुछ धुंधली पड़ चुकी हैं, पर इतना तो जरूर याद है कि बहुत ही यादगार यात्रा रही थी तब। जहां तक याद पड़ता है, छोटे-छोटे केबिनों और बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाली थी वह टॉय-ट्रेन। मैं और मेरा भाई एक ऐसे गजब के उत्साह से भरे हुए थे जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी। तब हमने ट्रेन में झट-से खिड़की वाली सीट लपक ली थी और खिड़की से बाहर सिर निकाल कर देखने लगे थे। जैसे ही ट्रेन किसी सुरंग से गुजरती, हम जोर से चिल्लाते, जैसे ही ट्रेन सुरंग से बाहर आती हम फिर से सिर बाहर निकाल लेते और चेहरे पर ठंडी हवा का जो झोका लगता उसका अपना ही मजा था। वाकई गजब का आनदं आया था तब।

आज बीस साल बाद आनंद टॉय-ट्रेन के आनंद से अलग और कहीं ज्यादा था। चाहे इंजन की रफ्तार, शोर और सजे-धजे रंगों में गाड़ी हो, मशीनी इंजनों का मानवीकरण अभी भी आकर्षण का केंद्र तो बना ही हुआ है। लेकिन इससे भी कहीं ज्यादा छोटे स्टेशन हैं जो स्वर्ग से कहीं कम नहीं लगते।

अभी यहां आने का कोई तय कार्यक्रम नहीं था। कसौली से 15 किलोमीटर दूर है धरमपुर स्टेशन। यहां से सुबह साढ़े नौ बजे ट्रेन रवाना होनी थी और हमें नौ बजे पहुंचना था। पर हम नौ बज कर दस मिनट पहुंचे। हमें लग रहा था कि कालका-शिमला तो सही वक्त पर ही रवाना होती होगी, लेकिन जैसा भारतीय रेलवे की लेट-लतीफी के बारे में हम सब जानते हैं, यह गाड़ी दो घंटे लेट थी। दो घंटे बाद ही हम इसमें सवार हो पाए। मैं इस दो घंटे में धरमपुर स्टेशन पर ही इधर-उधर घूमती रही। स्टेशन पर आवाजाही एकदम शांत थी। जब हम पहुंचे, टिकट खिड़की बंद होने वाली ही थी। चाय की एक दुकान खुली हुई थी, जहां पुराने फिल्मी गाने बज रहे थे। स्टेशन हाईवे के किनारे है, इसलिए वहां लोगों का कोलाहल और गुजरती कारों, बसों और ट्रकों के हॉर्न का शोर कानों में पड़ रहा था।

पर स्टेशन पर पसरा सन्नाटा और सर्द मौसम का आकाश दूसरी दुनिया में ले जाना वाला होता है। आज के लग्जरी जमाने में जहां सब कुछ नया ही नया है- घर से लेकर मॉल तक, वहां यह स्टेशन आपको अतीत में ले जाता है। टिकट घर की छोटी-छोटी खिड़कियां, नीली चमकीली बेंचें लगे छोटे वेटिंग रूम, सब कुछ खाली-खाली सा एक रूमानी माहौल का अहसास कराता है। इसे देख कर मुझे उन छोटे स्टेशनों की याद ताजा हो आई जो स्कॉटलैंड में मैंने देखे और जहां रूकी व रही थी।

स्टेशन पर दो घंटे के इस शांत माहौल में कई दृश्यों को कैमरे में कैद किया और आखिर दो घंटे बाद ग्यारह बजे हम ट्रेन पर सवार हो पाए। बारोग तक का नौ किलोमीटर का यह सफर मेरी पहली टॉय-ट्रेन यात्रा से जरा भी अलग नहीं था। पुरानी यादें ताजा हो रही थीं। इस बार नई बात यह थी कि ट्रेन में हमारे सहयात्री ग्रामीण थे, न कि पर्यटक। इस बार खिड़की से झांकने का मजा नहीं था, बजाय इसके इस बार हम डिब्बे के दरवाजे से झांकते हुए बाहर देख रहे थे। सिर्फ बीस मिनट की इस छोटी-सी यात्रा में पहाड़ियां, गहरी खाइयां और पत्थरों को काट कर बनाए गए पुल सब दिखते गए। एक बार फिर शांत वातावरण में चेहरा ताजी हवा के झोके ले रहा था।

ग्यारह बजकर पच्चीस मिनट पर हम बारोग स्टेशन पहुंचे। इतिहास से पता चलता है कि इस स्टेशन का नाम ब्रिटिश रेलवे इंजीनियर कर्नल बारोग के नाम पर पड़ा। कर्नल बारोग की देखरेख में यहां सुरंग बनाई गई थी। 1143 मीटर लंबी यह सुरंग शिमला-कालका के बीच सबसे लंबी सुरंग है। इस सुरंग की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है जितनी कि स्टेशन की। सुरंग का काम तेजी से चले, इसके लिए कर्नल बारोग ने अपने कामगारों से पहाड़ के दोनों ओर से सुरंग खोदने का काम कराया था। लेकिन अंत में, दोनों सिरे नहीं मिले और बारोग पर एक रुपए का जुर्माना लगा। इस घटना से बारोग इतने ज्यादा शर्मिंदा हुए कि उन्होंने खुदकुशी कर ली। मिथक है कि उनकी आत्मा अभी भी इस सुरंग में है, लेकिन मेरे लिए तो यह एक ऐसी जगह थी, जहां मैं कल्पनाओं में को गई थी।

बारत के दूसरे स्टेशनों से बारोग एकदम अलग है, एकदम साफ-सुथरा, खाली-खाली-सा, नीले रंग में रंगा हुआ, खुशनुमा वातावरण और हर तरह से अनोखापन लिए हुए। जैसे ही आप ट्रेन से बाहर आते हैं, आपको लगेगा ही नहीं कि आप भारत में हैं। पहाड़ियों की गोद में देवदार और ओक के पेड़ों से घिरा स्टेशन। सवा बारह बजे धरमपुर के लिए ट्रेन की वापसी थी। इस दौरान मैं पटरी के किनारे-किनारे ही टहलती रही। मै उस वक्त की कल्पना कर रही थी जब स्टेशन पर लोगों की धक्कम-पेल होती होगी, अगर सब नहीं तो कुछ तो अपने को ऐसे कुदरती जंगलीपन में पाते ही होंगे। स्टेशन पर बना डाइनिंग हॉल आज भी अपने पुराने रूप में कायम है, यहां एकदम सन्नाटा है और इसी में मैंने कटलेट और मैंगो फ्रूटी का लुत्फ उठाया।

सवा बारह बजे हम ट्रेन में वापसी के लिए सवार हो गए। जैसे ही ट्रेन सुरंग33 में घुसी, न तो कर्नल बारोग की आत्मा की आवाज सुनी न महसूस हुई, अगर कुछ था तो वह सिर्फ शांति थी जिसमें मैं डूब चुकी थी।

(साई फीचर्स)

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *