चीनी आक्रामकता का नया प्रतीक है ओबीओआर

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(सतीश कुमार)

ओबीओआर प्रॉजेक्ट चीन के व्यापारिक नेटवर्क को विस्तार देगा। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं। व्यापारिक नेटवर्क की आड़ में सैनिक विस्तार की अलिखित योजना है

पिछले दिनों अमेरिका में पेंटागन द्वारा एक रिपोर्ट जारी की गई जिसमें इस बात की चर्चा थी कि चीन ओबीओआर के माध्यम से दुनिया की रंगत बदलने जा रहा है। इसके मुताबिक कई देशों में चीन की यह पहल उनकी संप्रभुता को भी खतरे में डाल रही है। सवाल है कि क्या सच में चीन ओबीओआर के जरिये पूरी दुनिया को अपनी फांस में लेने जा रहा है या अमेरिकी रिपोर्ट दुनिया में चीन के खिलाफ माहौल बनाने के मकसद से तैयार की गई है?

चीन का ओबीओआर नेटवर्क 2013 में शुरू हुआ। यह चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी चिनफिंग की सबसे महत्वपूर्ण योजना है जिसका मकसद है जल और सड़क के माध्यम से दुनिया को एक सूत्र में बांधना। इसकी जद में करीब 87 देश आते हैं। यह योजना सिल्क रूट की तर्ज पर तैयार की गई है। सिल्क रूट करीब 130 ईसा पूर्व में जीवंत था जो चीन के बाद भारत होते हुए एशिया माइनर, मेसोपोटामिया से मिस्र, फिर अफ्रीका से रोम और ब्रिटेन पहुंचता था। मसाले, गन पाउडर और सिल्क का व्यापार इस रूट से होता था। आज उसी रूट का विस्तार चीन द्वारा किया जा रहा है।

गौरतलब है कि चीन का निवेश पिछले 10 वर्षों में 5 गुना बढ़ा है। ओबीओआर का यह प्रॉजेक्ट चीन के व्यापारिक नेटवर्क को और ज्यादा विस्तार देगा। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है। व्यापारिक नेटवर्क की आड़ में सैनिक विस्तार की अलिखित योजना है जिसकी झलक पिछले कुछ समय में कई देशों में चीनी पहलकदमियों में मिली। मलेशिया ने तो चीन के ओबीओआर को फरेब का अड्डा माना। श्रीलंका में भी यह दर्द महसूस किया गया। कई अन्य देशों के द्वारा भी चीन के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई गई।

भारत के खास संदर्भ में बात करें तो 2017 में चीन ने हिंद महासागर में अपना पहला सैनिक अड्डा जिबोटी में बनाया जो अफ्रीका के मुहाने पर स्थित है। इसके अलावा चीन ने श्रीलंका में हंबनटोटा पोर्ट का निर्माण किया। पोर्ट के निर्माण के दौरान यह कहा गया था कि ओबीओआर योजना पूरी तरह से आर्थिक मानदंडों पर टिकी हुई है। इसका विस्तार किसी भी तरह से सैनिक रूप में नहीं किया जाएगा। लेकिन चीन ने किया वही जिस बात का डर था। पहले चीन ने आणविक पनडुब्बी की पेट्रोलिंग बढ़ा दी। इसकी शुरुआत साउथ चाइना सी के साथ भारत के उन संवेदनशील समुद्री ठिकानों से की गई जहां से होकर 2008 में भारत में आतंकी हमले हुए थे। पाकिस्तान स्थित ग्वादर पोर्ट के जरिये चीन इसी तरह का विस्तार मध्य एशिया से लेकर गल्फ के देशों के बीच भी करना चाहता है।

साफ है कि चीन को अपनी इन योजनाओं के साथ निर्बाध बढ़ते जाने की छूट नहीं दी जा सकती। भारत ही नहीं, अमेरिका और जापान भी इस मामले को लेकर काफी संवेदनशील हैं। अमेरिका के लिए ताइवान का मामला सबसे ऊपर है। मगर यह महज ताइवान का सवाल नहीं है, इस पूरे क्षेत्र को एक देश की दादागिरी से मुक्त रखने की बात है। इसे ध्यान में रखते हुए भारत जापान के साथ भी तालमेल बनाए हुए है। वियतनाम और अन्य आसियान देशों के साथ भी भारत अपनी करीबी बढ़ाने की कोशिश में है। प्रधानमंत्री मोदी समुद्री मुहानों को सुरक्षित बनाने की योजना की शुरुआत कर चुके हैं। समुद्री मुहानों पर बसे देशों के साथ भारत के बेहतर संबंधों को गति दी जा रही है। उन सैनिक ठिकानों पर सुरक्षा का बंदोबस्त किया जा रहा है जहां से भारत के मालवाहक जहाज गुजरते हैं।

लेकिन अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ तालमेल बनाते हुए भी भारत को कई स्तरों पर जूझना होगा। इन देशों के आपसी हित भी कई जगह टकराते हैं। इन सारी जटिलताओं के बीच से रास्ता निकालते हुए चीनी आक्रामकता के साझा खतरों का मुकाबला इन देशों को करना होगा जो एक दीर्घकालिक चुनौती है।

(साई फीचर्स)

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