प्रियंका के आने का असर तो होगा

 

 

(अजित द्विवेदी)

राजनीति में प्रवेश का इतना इंतजार सोनिया गांधी के लिए भी नहीं हुआ था। राजीव गांधी के निधन के सात साल बाद वे राजनीति में आईं और कांग्रेस अध्यक्ष बन गईं। राहुल गांधी बिना किसी इंतजार के 2004 में राजनीति में आए और सांसद बन गए। 1998 में जब सोनिया ने कांग्रेस की कमान संभाली तब से प्रियंका गांधी के राजनीति में आने का इंतजार हो रहा था। वह इंतजार 20 साल बाद 2019 में पूरा हुआ है। कांग्रेस के लाखों कार्यकर्ताओं की उम्मीदें पूरी हो गई हैं और करोड़ों भारतीयों का अंदाजा भी सही साबित हो गया है कि देर सबेर प्रियंका को राजनीति में आना ही था। सो, वे राजनीति में आ गई हैं। पर आकर करेंगी क्या? उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से की लोकसभा सीटों पर कांग्रेस को चुनाव लड़ाएंगी!

पहली नजर में यहीं लग रहा है कि वे पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं, जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं। पर असल में उनके राजनीति में उतरने की टाइमिंग और मकसद दोनों बड़ा अर्थ लिए हुए हैं। राहुल गांधी ने तो कह दिया कि वे बच्चों की परवरिश में व्यस्त थीं इसलिए राजनीति में आने में देरी हुई। पर असल में परिवार ने उनके राजनीति में आने का फैसला इसलिए भी रोका था क्योंकि यह अंदेशा था कि रॉबर्ट वाड्रा के बहाने उनको निशाना बनाया जाएगा। इसलिए टाइमिंग ऐसी चुनी गई, जब रॉबर्ट वाड्रा पर कार्रवाई का नुकसान होने की बजाय फायदा हो जाए। चुनाव तीन महीने रह गए हैं और केंद्र या हरियाणा की सरकार अब अगर वाड्रा के खिलाफ कुछ भी करेगी तो उसे चुनावी स्टंट समझा जाएगा और यह मैसेज होगा कि प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीति में प्रवेश से घबरा कर सरकार उनके पति पर कार्रवाई कर रही है। सो, यह मानना चाहिए कि बहुत सुनियोजित और सुविचारित तरीके से उनके राजनीति में उतरने की टाइमिंग तय की गई। पांच साल पहले जब देश में नरेंद्र मोदी की लहर थी, तब प्रियंका की एंट्री से कोई हलचल नहीं होती। अभी उनके आने से पूरे देश में हलचल मची है, भले वैसी नहीं है, जैसी मोदी की थी।

प्रियंका की राजनीति में एंट्री की टाइमिंग एक और लिहाज से भी बहुत खास है। कांग्रेस को अंदाजा हो गया था कि समाजवादी पार्टी और बसपा दोनों उसे अपने गठबंधन में नहीं शामिल करने वाले हैं। उस समय कांग्रेस प्रियंका का कार्ड चल कर सपा-बसपा को गठबंधन के लिए मजबूर कर सकती थी। पर उसने सपा-बसपा के तालमेल की घोषणा होने का इंतजार किया और तब प्रियंका की एंट्री का ऐलान किया। इस लिहाज से ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस को सिर्फ भाजपा को मैसेज नहीं देना था, बल्कि विपक्षी पार्टियों को भी मैसेज देना था कि 2019 का चुनाव कांग्रेस उनके रहमोकरम पर नहीं लड़ रही है। कांग्रेस ने यह भी बताया कि मास्टरस्ट्रोक चलने का अधिकार सिर्फ नरेंद्र मोदी-अमित शाह या अखिलेश यादव-मायावती को ही नहीं है। यह मास्टरस्ट्रोक कितना कारगर होगा, इस बारे में किसी नतीजे पर पहुंचने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए पर यह जरूर है कि कांग्रेस ने शांत पड़े तालाब में प्रियंका नाम का पत्थर फेंक कर लहर पैदा की है। कांग्रेस ने यह बता दिया है कि विपक्षी पार्टियों को उसे गंभीरता से लेना होगा। इससे अगले एक महीने में होने वाली गठबंधन की राजनीतिक गुणात्मक रूप से प्रभावित होगी।

एक सवाल यह भी है कि अगर तीन राज्यों के चुनाव में कांग्रेस नहीं जीती होती तब भी क्या प्रियंका गांधी को अभी राजनीति में उतारा जाता? शायद नहीं! तीन राज्यों की जीत से कांग्रेस ने यह मिथक टूटता महसूस किया है कि कांग्रेस किसी हाल में नरेंद्र मोदी-अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा को नहीं हरा सकती है। पिछले 17 साल की राजनीति से यह मिथक बना था। खुद मोदी ने कहा था कि वे 17 साल से कांग्रेस को हरा रहे हैं। सो, तीन राज्यों में जब कांग्रेस ने भाजपा को हराया तो यह मिथक टूटा और कांग्रेस को लगा कि यह मौका है निर्णायक लड़ाई का। भाजपा के विकल्प के तौर पर कांग्रेस को स्वीकार किए जाने का भी संदेश तीन राज्यों के चुनाव नतीजों में छिपा है। तभी राहुल की मदद के लिए प्रियंका को लाने का फैसला हुआ। अगर कांग्रेस नहीं जीतती तो उनकी एंट्री के लिए अभी और इंतजार करना होता।

अब उनके असर की बात! प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीति में आने का सबसे बड़ा असर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मनोबल पर हुआ है। कांग्रेस के ऐसे कार्यकर्ताओं की तादाद लाखों में है, जो भाजपा और मोदी-शाह की टीम के इस सोशल मीडिया प्रचार को मानते हैं कि राहुल से नहीं हो पाएगा। अब उनको उम्मीद जगी है कि राहुल से नहीं हो पाएगा तो प्रियंका करेंगी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं की यह उम्मीद उन्हें चुनावी भागदौड़ में झोंकेगी। वे जी जान से चुनाव में लगेंगे। दूसरा असर देश के आम मतदाता के मानस पर होता है। आम मतदाता किसी न किसी उम्मीद में मतदान केंद्र पर लगी कतारों में जाकर खड़ा होता है। इस बार अप्रैल-मई की चिलचिलाती धूप में जब मतदाता कतार में खड़े होंगे तो पांच साल पहले जगाई गई उम्मीदों और पांच साल की वास्तविकताओं की तुलना जरूर करेंगे और तब अगर उनके जेहन में नरेंद्र मोदी बनाम प्रियंका गांधी वाड्रा का चेहरा कौंधता है तो उसका असर बहुत बड़ा हो सकता है।

सो, प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने के असर का आकलन उनको मिले पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभार से नहीं करना चाहिए। इसका जैसा असर पूर्वी उत्तर प्रदेश के बनारस, बलिया में होगा ठीक वैसा ही असर देश के बाकी हिस्सों में भी होगा।

(साई फीचर्स)

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