सत्र को लेकर अटकलें

 

 

(शशांक राय)

संसद का अगला सत्र 31 जनवरी से शुरू हो  गया है। यह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के पांच साल के कार्यकाल का आखिरी सत्र है। अगर पिछले सत्र को आधार मानें तो यह तय मानना चाहिए कि यह सत्र भी हंगामे की भेंट चढ़ेगा। पिछले शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में बहुत खराब स्थिति रही थी। कोई कामकाज नहीं हो सका था। सवर्ण आरक्षण के बिल पर जरूर पार्टियों में सहमति बनी और बिल पास करा लिया गया था। लेकिन इसके अलावा हालात यह थे कि सुबह के सत्र की कार्यवाही शुरू होने के दस मिनट में सदन पूरे दिन के लिए स्थगित होता रहा। लोकसभा में जरूर सरकार ने कुछ कामकाज कराए पर वहां भी हंगामा जारी रहा।

तेलुगू देशम पार्टी, अन्ना डीएमके, शिव सेना आदि पार्टियों ने अलग अलग मुद्दों पर हंगामे किए और सदन को बाधित किया तो कांग्रेस ने अलग राफेल के मसले पर हंगामा जारी रखा। अब हंगामे की उससे भी ज्यादा वजहें हो गई हैं। चुनावी साल होने की वजह से सारी पार्टियों की पोजिशनिंग चल रही है। सरकार का प्रयास अपनी उपलब्धियां बताने का है तो विपक्षी पार्टियां यह बताना चाहेंगी कि सरकार ने कुछ नहीं किया। इस टकराव का अखाड़ा संसद को बनना है।

इसके अलावा बजट के प्रावधानों और भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से अहम कुछ विधेयकों को लेकर भी विपक्ष के विरोध की संभावना है।

सत्ता पक्ष और विपक्ष में टकराव का सबसे बड़ा मुद्दा बजट बनने वाला है। कहा जा रहा है कि सरकार पूर्ण बजट पेश करने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस ने मीडिया रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि सरकार पूर्ण बजट पेश करेगी तो कांग्रेस संसद से लेकर सड़क तक उसका विरोध करेगी। असल में पांच साल के कार्यकाल में कोई भी सरकार पांच ही बजट पेश कर सकती है, जो कि यह सरकार पेश कर चुकी है।

जब सरकार का कार्यकाल 26 मई से पहले खत्म हो जाना है तो वह अगले साल मार्च अंत तक के बजट का फैसला कैसे कर सकती है? इसी सवाल के आधार पर कांग्रेस विरोध कर रही है और दूसरी पार्टियां भी विरोध करेंगी। उनको लग रहा है कि पूर्ण बजट पेश किया गया तो सरकार नीतिगत फैसले करेगी। लोक लुभावन घोषणाएं और खजान लुटाने का काम होगा। कर प्रावधानों और कर ढांचे को बदला जा सकता है। इस तरह के फैसलों का बड़ा चुनावी असर होगा। तभी अगर सरकार ने लेखानुदान के बदले पूर्ण बजट के बारे में सोचा तो उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा।

टकराव का दूसरा मुद्दा नागरिकता, तीन तलाक और प्रवासी भारतीयों को प्रॉक्सी के जरिए वोटिंग अधिकार देने का होगा। ये सारे बिल लोकसभा से पास हो गए हैं। सरकार इनको राज्यसभा से पास कराने का प्रयास कर सकती है। नागरिकता के मुद्दे पर भाजपा पूर्वाेत्तर में और पश्चिम बंगाल में ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है। इसका असर पूरे देश में होगा। तीन तलाक को अपराध बनाने का बिल भी ध्रुवीकरण की राजनीति का हिस्सा लग रहा है।

तभी कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने इन विधेयकों को लटकाया है। प्रॉक्सी के जरिए प्रवासी भारतीयों को मतदान का अधिकार देने का सबसे बड़ा फायदा भाजपा होगा क्योंकि प्रवासी भारतीयों के बीच भाजपा की और खास कर नरेंद्र मोदी की जैसी लोकप्रियता है वैसी किसी दूसरी पार्टी या नेता की नहीं है। पहले वोटिंग के लिए प्रवासी भारतीयों को भारत आना पड़ता था। पर प्रॉक्सी के जरिए वोटिंग का अधिकार देने से वे अपने रिश्तेदार या दोस्त आदि को नामित करके उनके जरिए वोट डलवा सकेंगे। अगर सरकार इस सत्र में ये तीनों बिल लाकर पास कराने का प्रयास करती है तो उसका विरोध होगा।

इस समय सारी विपक्षी पार्टियां इस बात को लेकर एकजुट हैं कि सरकार केंद्रीय एजेंसियों जैसे सीबीआई, ईडी आदि का इस्तेमाल करके विपक्षी पार्टियों और नेताओं को परेशान कर रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के यहां सीबीआई का छापा पड़ा है। तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी के करीबी नेताओं पर तलवार लटकी है। एक मशहूर बांग्ला फिल्म निर्माता को सीबीआई ने चिटफंड मामले में गिरफ्तार किया है। खनन घोटाले के बहाने अखिलेश यादव को घेरने का प्रयास हो रहा है। इन सब मसलों को लेकर विपक्ष हमलावर रहेगा।

आखिरी सत्र में यह बताने का प्रयास होगा कि सरकार एजेंसियों के सहारे विपक्ष को परेशान कर रही है। दूसरी ओर सरकार राष्ट्रपति के अभिभाषण के जरिए देश के लोगों को अपनी उपलब्धियां बताएगी। वह कुछ जरूरी नीतिगत फैसलों को मंजूरी और बिल पास कराने का प्रयास भी करेगी। इस प्रयास में भी दोनों तरफ से टकराव बढ़ेगा। सो, कहा जा सकता है कि इस लोकसभा के पहले सत्र की शुरुआत सद्भाव के साथ हुई थी और आखिरी सत्र टकराव के साथ खत्म होगा।

(साई फीचर्स)

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