सड़कें बन रही हैं कब्रगाह

 

(श्रीशचन्द्र मिश्र)

देश में सड़कों पर चलना कितना खतरनाक हो गया है इसका आभास सिर्फ इन आंकड़ों से हो जाता है कि पिछले साल देश में रोज औसतन 410 लोग सड़क हादसों में मारे गए। 2015 में यह आंकड़ा करीब चार सौ था। हादसों का कारण चाहे बेलगाम रफ्तार हो या सड़कों की दुर्दशा, 2014 में हर एक घंटे में औसतन सोलह लोगों को सड़क हादसे में जान गंवानी पड़ी। इस अरसे में साढ़े चार लाख हादसे हुए जिनमें करीब एक लाख 40 हजार लोगों की जान गई और चार लाख 80 हजार जख्मी हुए।

2013 की तुलना में सड़क हादसों ने तीन फीसद ज्यादा लोगों की जान ली। तब एक लाख 37 हजार 423 मौतें हुई थी। 2014 में यह संख्या एक लाख 41 हजार 526 तक जा पहुंची। 2015 में एक लाख 46 हजार और 2016 में डेढ़ लाख से ज्यादा लोग सड़क हादसों में मरे। 2014 में जो चार लाख 77 हजार 731 सड़क हादसे हुए उनमें से 36.8 फीसद की वजह तेज रफ्तार रही। इससे 48 हजार 654 लोगों की जान गई।

ओवर टेकिंग व लापरवाही से वाहन चलाने वालों ने 42 हजार 127 लोगों को मार डाला। कुल सड़क हादसों में से करीब आधे में दुपहिया के अलावा ट्रक व लॉरी ड्राइवर दोषी रहे। इन वाहनों की चपेट में आने की वजह से 23 हजार 529 लोगों को जान गंवानी पड़ी और एक लाख 40 हजार लोग जख्मी हुए। 2014 में सड़क हादसों में मरने वाले दुपहिया चालकों की संख्या 13 हजार 787 रही। सड़क हादसों में मरने वाले लोगों में दुपहिया वाहन 23.3 फीसद, तिपहिया 4.5 फीसद, कार-जीप-टैक्सी 18.6 फीसद, ट्रक-ट्रैक्टर-टैंपो 25.6 फीसद और बस 8.7 फीसद के हिस्सेदार रहे। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में सड़क हादसों का जो आंकलन किया है, उसके और नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में थोड़ी भिन्नता है। हालांकि हादसों के कारण दोनों रिपोर्ट में एक से हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 2014 में भारत में सड़क हादसों में एक लाख 39 हजार 671 लोगों की जान गई। इनमें से 57 हजार 844 तेज रफ्तार का, 26 हजार 809 ओवर लोडिंग का और 19 हजार 569 हिट एंड रन का शिकार हुए। शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों ने 6968 लोगों की जान ली। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में यह तथ्य भी है कि मरने वालों में 75 हजार 48 पंद्रह से चौत्तीस साल की उम्र के थे। यह कुल संख्या का 53.8 फीसद है। सड़कों पर जान गंवाने वाले 35 से 65 साल के 35.7 फीसद यानी 49 हजार 840 लोग थे।

जहां तक एनसीआरबी के आंकड़ों का सवाल है तो 2013 के मुकाबले 2014 में सड़क हादसों में मौत के मामले में सबसे ज्यादा इजाफा गाजियाबाद, इलाहाबाद, भोपाल व रांची में हुआ। जिन 53 महानगरों के आंकड़े जुटाए गए उनमें 2199 मौतों से दिल्ली सबसे आगे रहा। राज्यों में उत्तर प्रदेश 11.7 फीसद मौतों का गवाह रहा। वहां 2014 में 16 हजार 284 लोगों की मौत हुई। उसके बाद तमिलनाडु (10.9 फीसद), महाराष्ट्र (9.2 फीसद), कर्नाटक (7.5 फीसद) और राजस्थान (7.4 फीसद) का नंबर है। ये पांच राज्य 40 फीसद मौतों के दोषी हैं। इन राज्यों में मध्यप्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, बिहार, पंजाब व हरियाणा को भी जोड़ लिया जाए तो सड़क हादसों में 2014 में हुई 83.2 फीसद मौतें इन्हीं राज्यों की सड़कों पर हुईं।

तमिलनाडु की स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है। आबादी व क्षेत्रफल के हिसाब से अपेक्षाकृत छोटा राज्य होने के बावजूद वहां 2014 में सड़क हादसों ने पंद्रह हजार से ज्यादा लोगों की जान ली। स्थित पिछले दो सालों में भी ज्यादा नहीं बदली है। जानलेवा राज्यों की कतार में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। 2015 में वहां सड़क हादसों में 17 हजार 666 लोग मरे तो 2016 में उनकी संख्या 19 हजार 320 हो गई। पिछले साल राज्य में रोज औसतन 53 लोगों को सड़क हादसों में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

यह तथ्य अपने आप में काफी चौंकाने वाला है कि आतंकवादियों या नक्सलियों से मुकाबला करते हुए अर्ध सैनिक बल के जितने जवान जान गंवाते हैं उससे चार गुना से ज्यादा की मौत सड़क हादसों में होती है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के जिन 1232 जवानों की अप्राकृतिक कारणों से मौत हुई उनमें से 32 फीसद यानी 396 की जान सड़क हादसों में हुई जबकि आतंकवादियों या नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए 89 (सात फीसद) जवान मारे गए। सड़क हादसों की बढ़ती संख्या ने कुछ प्रचलित धारणाओं को भी तोड़ा है।

मसलन माना जाता है कि पुराने वाहनों की वजह से ज्यादा हादसे होते हैं। आंकड़े इससे उलट हैं। परिवहन मंत्रालय के रिसर्च विंग की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में दो से चार साल पुराने वाहनों ने 86 हजार 956 हादसे किए जिनमें 24 हजार 494 लोगों की जान गई। हादसों के मामले में शहरी और ग्रामीण सड़कों का फर्क भी मिट गया है। 2014 में शहरी सड़कों पर सड़क हादसे 56 हजार 663 लोगों की मौत लेकर आए तो ग्रामीण सड़कों पर यह संख्या 83 हजार के आसपास रही। शहर हो या गांव हर छह में से एक सड़क हादसा आवसीय क्षेत्र के पास होता है। गांवों में यह 16.5 फीसद और शहरों में 16.4 फीसद है। स्कूल, कालेज या किसी शैक्षणिक संस्थान के पास 5.3 फीसद सड़क हादसे होना चिंताजनक है।

 

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