हद से पार राजनीतिक विरोध

 

 

(बलबीर पुंज)

क्या राजनीतिक, वैचारिक या फिर व्यक्तिगत विरोध की कोई सीमा हो सकती है? क्या उसके लिए देश की सामाजिक व्यवस्था, सुरक्षा और संप्रभुता से खिलवाड़ करना उचित माना जा सकता है? इन प्रश्नों के गर्भ में हाल के समय की वह घटनाएं है, जिसमें विदेशी धरती पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को क्षुद्र राजनीतिक लाभ के लिए कलंकित करने का प्रयास किया गया है। बीते साढ़े चार वर्षों में अधिकांश विपक्षी दलों की जो राजनीतिक यात्रा- विश्व में भारत की पंथनिरपेक्ष और बहुलतावादी छवि को धूमिल करने के अभियान से शुरू हुई थी, वह अब भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त की दिशा में अग्रसर हो चुकी है।

यह किसी विडंबना से कम नहीं कि जब भारत में 69वें गणतंत्र दिवस की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा था, तब देश से लगभग 7,000 किलोमीटर दूर लंदन में भारत के लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला हुआ। वहां आयोजित एक प्रायोजित प्रेस वार्ता में स्काईप के माध्यम से अपना मुंह छिपाए सैयद शुजा नामक कथित साइबर विशेषज्ञ ने दावा किया कि ई.वी.एम. में छेड़छाड़ संभव है। शुजा के अनुसार, 2014 के लोकसभा चुनाव में धांधली हुई थी और हाल में संपन्न राजस्थान, छत्तीसगढ़ और राजस्थान का चुनाव भी भाजपा जीत जाती, किंतु उसकी टीम ने हैकिंग के सभी प्रयासों को विफल कर दिया। रोचक बात तो यह है कि अपने दावे के समर्थन में शुजा ने कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं दिया। यहां तक, अपने निजी परिचय से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे दिवंगत गोपीनाथ मुंडे के मामले में जो दावे उसने लंदन में किए थे, वह विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और संबंधित सार्वजनिक ईकाइयों की जांच के बाद एक-एक करके फर्जी और झूठे सिद्ध हो चुके है। अब निर्वाचन आयोग की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने शुजा के विरूद्ध मामला दर्ज कर लिया है।

लंदन में जिन भारतीय चुनावों में ईवीएम के हैक होने का दावा किया गया था- उस पृष्ठभूमि में यह आरोप कितना हास्यास्पद है कि 2014 के लोकसभा चुनाव अर्थात कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के शासन में भाजपा ईवीएम मशीनों को हैक करवाने में सफल हो गई थी। इस आधार पर दिल्ली, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव में ईवीएम हैक होने का ढोल क्यों नहीं पीटा गया, जब मोदी सरकार शासन में थी?

विडंबना की पराकाष्ठा देखिए, जब कांग्रेस गत माह राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसढ़ में सरकार बनाने में सफल हुई (जिसमें छत्तीसगढ़ को छोड़कर बाकी दोनों राज्यों में भाजपा और कांग्रेस- दोनों का मतप्रतिशत लगभग समान था), तो कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र की विजय के रूप में प्रस्तुत कर दिया। उसी कालांतर में जब तेलंगाना विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी के महागठबंधन की हार हुई, तब उसके नेताओं ने एकाएक चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए ई.वी.एम. से छेड़छाड़ का आरोप मढ़ दिया।

आखिर सैयद शुजा और प्रेसवार्ता के आयोजक कौन है? मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार- भारतीय मूल के शुजा ने अमेरिका में राजनीतिक शरण ली हुई है। उसने लंदन के जिस कार्यक्रम में ई.वी.एम हैकिंग का दावा किया था, उसका आयोजन इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने किया था। इस कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की उपस्थिति से पहले ही इसके पीछे के राजनीतिक संकेत मिल रहे है- वहीं अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि प्रेसवार्ता के आयोजक- इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन वही संगठन है, जिसने गत वर्ष अगस्त में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लंदन दौरे के समय उनके सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। इसी संगठन के कुछ शीर्ष लोगों का संबंध उस नेशनल हेराल्ड से भी होने की चर्चा सोशल मीडिया में वायरल है, जिससे जुड़े करोड़ों रूपये के आयकर चोरी मामले में राहुल गांधी और सोनिया गांधी जमानत पर बाहर है।

भारत में विपक्षी दलों- विशेषकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के इस व्यवहार का कारण क्या है? पहला- 2014 में 30 वर्षों के अंतराल में पहली बार किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत मिला था। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण- स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी विशुद्ध गैर-कांग्रेसी राजनीतिक दल की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ बनी। देश में सर्वाधिक शासन कांग्रेस का ही रहा है, जिसमें उसने छह बार पूर्ण बहुमत तो चार बार गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया। इस दौरान कई प्रदेशों में भी उसकी ही सरकारें रही हैं।

लगभग पचास वर्ष के शासनकाल में कांग्रेस और उसके बौद्धिक समर्थकों में यह मानस घर कर गया कि हम ही देश में सर्वाेपरि हैं और हमें संवैधानिक-लोकतांत्रिक मूल्यों से निर्मित शासकीय प्रणाली का अनुसरण करने या नहीं करने या फिर उसे अपनी सुविधानुसार ढालने का विशेषाधिकार है। क्या यह सत्य नहीं कि कांग्रेसी नेता और उसके बौद्धिक समर्थक- नेहरु गांधी परिवार को भारत का प्राय मानते आए है और इस संदर्भ में 1975-77 में आपातकाल के दौरान तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ का वक्तव्य- इंदिरा भारत हैं, भारत इंदिरा है प्रासंगिक है?

बीते साढ़े चार वर्षों में विपक्षी दलों- विशेषकर कांग्रेस के उसी विशेषाधिकार को देश की जनता के साथ न्यायतंत्र और लोकतंत्र के रक्षकों से निरंतर चुनौती मिल रही है। इसी भावना से जनित बौखलाहट आज भारत-हिंदू विरोधी मानसिकता में परिवर्तित हो चुका है। इसके अनेकों उदाहरण है, जैसे- जब 29 सितंबर 2016 में भारतीय जवानों ने उरी आतंकी हमले का बदला लेते हुए गुलाम कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइल की, जिसकी जानकारी सैन्याधिकारी ने प्रेसवार्ता के माध्यम से देश को दी थी- उस पर कांग्रेस नेताओं सहित अधिकांश विपक्षी दलों ने पाकिस्तान की भाषा बोलते हुए मोदी सरकार से प्रमाण मांगा था।

जब उसी वर्ष फरवरी में दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय भारत तेरे टुकड़े होंगे…इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह जैसे राष्ट्रविरोधी नारों से गूंजा, तब संबंधित वीडियो की प्रामाणिकता सिद्ध के साथ कांग्रेस, वामपंथियों सहित अधिकांश विपक्षी दलों ने उन नारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ दिया। जब 2017 में केंद्र सरकार ने गौसंरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाया, तब विरोधस्वरूप, केरल में कांग्रेसी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से गाय के बछड़े का गला न केवल काट दिया, अपितु करोड़ों हिंदुओं की भावना को आहत करते हुए उसके मांस का सेवन भी किया। फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के माध्यम से देश में पुनः असहिष्णुता का प्रलाप शुरू हो गया है।

अब इसे पाखंड नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे कि जो दल सर्जिकल स्ट्राइक और जेएनयू में देशविरोधी नारों की सत्यता साबित करने का शोर मचाते है, वह लंदन में एक व्यक्ति द्वारा ईवीएम को संदिग्ध बताने को एकाएक अकाट्य सच मान लेते है। इसका कारण यह है कि शुजा का दावा उनके द्वारा रचित विकृत विमर्श और विशेषाधिकार वाली मानसिकता के अनुकूल है।

निर्विवाद रूप से विपक्ष के बिना भारत का लोकतंत्र अधूरा है या यूं कहे जितना सशक्त विपक्ष होगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। राजनीति में विरोध करने का अधिकार विपक्षी दलों के पास होता है, जिसका प्रयोग वह किसी भी सरकार की नीति के विरुद्ध या उसे सत्ताच्युत करने हेतु भी कर सकते है। किंतु अपने क्षुद्र राजनीतिक लाभ और महत्वकांशा के लिए भारत की सनातन संस्कृति को अपमानित, देश की अनंतकालीन बहुलतावादी-पंथनिरपेक्ष छवि और भारत के जीवंत लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ उसके जीवंत प्रतीक चिन्हों को शेष विश्व में कलंकित करना- राष्ट्रविरोध के समकक्ष खड़ा कर देता है।

(साई फीचर्स)

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