शादी, बॉयफ्रेंड, पैसा

 

(प्रणव प्रियदर्शी)

बेटी की हो, बहन की हो या किसी अन्य सगे संबंधी की, जब भी घर में ऐसी कोई बात चलती है कि फलां की शादी ठीक हो गई है या होने वाली है तो सबसे पहले इसी सवाल पर चर्चा होती है कि लड़का करता क्या है, कमाता कितना है? कुछ दूसरे सवाल भी होते हैं। मसलन, लड़का कैसे घर का है। लेकिन इन सवालों का मतलब भी यही होता है कि लड़के के परिवार के पास कितनी जायदाद है। ये सवाल हमें जरा भी अटपटे नहीं लगते। कोई लड़का ऐसे सवालों पर उखड़ जाए या कोई लड़की इन सवालों को अपने और अपने संभावित जीवनसाथी के लिए अपमानजनक करार दे तो हमें, यानी एक सामान्य मध्यमवर्गीय हिंदुस्तानी को उसका व्यवहार निहायत असामान्य लगता है। मगर इसी रविवार प्रसारित टीवी टॉक शो कॉफी विद करण में बॉलिवुड एक्टर सैफ अली खान और उनकी बेटी सारा अली खान की बातचीत एकदम अलग तस्वीर पेश कर रही थी।

होस्ट करण जौहर ने सैफ से पूछा कि बतौर पिता अगर वे सारा के बॉयफ्रेंड से मिलें तो उससे क्या पूछेंगे? सैफ ने कहा, यही कि उसके व्यूज क्या हैं? यह भी कि वह ड्रग्स तो नहीं लेता? होस्ट ने कहा, पैसों के बारे में कोई सवाल नहीं? इस पर सैफ ने आश्चर्य मिश्रित हास्य के साथ पूछा, पैसों के बारे में? हां पैसों के बारे में पूछना चाहिए ना? मजाक में शामिल होते हुए सारा बोलीं, मैं इमैजिन कर सकती हूं कि पैसों के बारे में ये कैसे पूछेंगे। उंगलियों से नोट गिनने जैसा संकेत करते हुए उसने कहा, जिसे सैफ ने भी दोहराया, पैसा-पैसा। तीनों हंस रहे थे। इसके बाद सैफ ने कहा, हां पैसों के बारे में मुझे जरूर पूछना चाहिए। कहना चाहिए, अगर पैसे हैं तो ले जाओ इसे। आगे के सवालों में भी जब भी सारा की डेटिंग या प्यार से जुड़े सवाल आए, सैफ का कॉमेंट होता, फलां? हां वह बेटर है, उसके पास ज्यादा पैसा है। और तीनों हंसते।

यह बातचीत इस बात का नमूना थी कि पटौदी परिवार के लिए शादी के संदर्भ में प्रॉपर्टी या पैसे कमाने का सवाल कितनी कम अहमियत रखता है। हालांकि यह सिर्फ एक टीवी टॉक शो पर दिखाई गई बातचीत है, फिर भी थोड़ी देर के लिए इसे सच मानते हुए इससे उभरते वैल्यू सिस्टम पर विचार करें तो कुछ तीखे सवाल अपने लिए भी बनते हैं। मसलन, एक तो यही कि अगर किसी के हाथ-पैर सही-सलामत हैं, पढ़ा-लिखा और जिम्मेदार शख्स है तो डिग्निटी के साथ जिंदगी बिताने का इंतजाम कर ही लेगा। और इतना वह कर लेता है तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि वह कितना कमाता है। हम मध्यमवर्गीय भारतीयों के लिए इस तरह से सोचना क्या सचमुच इतना मुश्किल है!

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