जुहेर कश्मीरी और एयर इंडिया फ्लाइट-18

 

 

(विवेक सक्सेना)

जब मैंने कनाड़ा में दिखाई देने वाले भारतीय चौनलो पर जानी-मानी वयोवृद्ध लेखिका कृष्णा सोबती के निधन की खबर सुनी तो मुझे लगा कि भारत और कनाड़ा के लेखक व पत्रकारों में कितना अंतर है। वजह यह थी कि इस खबर को सुनने के चंद दिन पहले ही यहां के एक अखबार में मुझे यहां के जाने-माने लेखक जुहेर कश्मीरी के निधन का समाचार पढ़ने को मिला। जबकि उनकी मृत्य महिने पहले 12 दिसंबर 2018 को हो चुकी थी। यह समाचार उनके निधन के पूरे एक माह बाद प्रकाशित हुआ। वे न केवल भारतीय मूल के थे बल्कि कुछ वर्षों पहले मैंने उनकी एक विवादास्पद पुस्तक विस्तार से पढ़ी थी जोकि एक सिख अकाली नेता अपनी कनाड़ा यात्रा के बाद वहां से खरीद कर लाए थे।

यह पुस्तक भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित घोषित की जा चुकी थी। यह इसलिए बहुत अहम थी कि दुनिया की आज तक की सबसे बड़ी विमान दुर्घटना का कनाड़ा से गहरा संबंध था। पंजाब के आतंकवाद के दौरान घटी उस दुर्घटना में कुछ खालिस्तानी आतंकवादियों ने टोरंटो से भारत आने वाली एयर इंडिया की उड़ान संख्या 182 में बम लगाकर उसे आसमान में उड़ा दिया था। उस दुर्घटना में 329 लोग मारे गए थे जिनमें 268 भारतीय मूल के कनाड़ाई नागरिक थे।

इसी दौरान जापान के नरीता एयरपोर्ट पर भी दो बम फटे जिनके कारण सामान की ढुलाई करने वाले दो कर्मचारी मारे गए। उन विस्फोटो में भी खालिस्तानी उग्रवादियों का हाथ था। इस बम कांड पर कनाड़ा में रहने वाले भारतीय मूल के पत्रकार जुहेर कुरेशी ने किताब लिखी जो कि उनके पत्रकार मित्र ब्रायन मैक इंड्रू के साथ लिखी गई थी। साफ्ट टारगेट हाउ द इंडियन इंटेलीजेंस सर्विसेज पेनीट्रेटेड कनाड़ा नाम की इस किताब में इस बात का खुलासा किया गया था कि किस तरह से भारतीय सरकारी जासूसों ने सिख आतंकवाद को बदनाम करने के लिए यह जघन्य कार्रवाई की थी।

उनके परिचित उन्हें प्यार से कश कहा करते थे। उनके पिता आगाजनी कश्मीर मुंबई में रहते थे और वे संवाद लेखक थे। कश की पढ़ाई लिखाई मुंबई के सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने लंदन से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और फिर कनाड़ा आ गए। उन्होंने यहां के जाने-माने ग्लोब एंड मेल न्यूजपेपर में नौकरी की। कनाड़ा के बड़े भाई माने-जाने वाले अमेरिका के दुश्मन फिलिस्तीन मुक्ति संघर्ष के नेता यासर अराफात का पहला इंटरव्यू करके पूरी दुनिया में शोहरत हासिल की।

उनकी किताब छपने के बाद भारतीय सरकार ने उन्हें खालिस्तानी एजेंट करार दिया। जबकि कनाड़ा में उनकी किताब को देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप बताया। उन्होंने 15 साल तक इस अखबार में नौकरी की व इस दौरान वे अपराध, व्यापार, वित्तीय धोखाधड़ी, मध्यपूर्व व भारत में सिख आतंकवाद के कारण पैदा होने वाली चुनौतियों जैसे विषय पर रिपोर्टिंग करते थे। उन्होंने जब 1985 में आतंकवाद का शिकार हुए एयर इंडिया पर किताब लिखी तो उसमें उन्होंने यह आरोप लगाया कि यह काम भारतीय खुफिया एजेंसियों का था जिन्होंने सिख आतंकवादियों के बीच घुसपैठ करके सिख समुदाय को दुनिया में अलग-थलग कर देने के लिए इस जघन्य कांड को अंजाम दिया था।

उस समय जहां ओटावा स्थित भारतीय उच्चायोग ने इस किताब को लेकर जमकर हल्ला मचाया वहीं यहां के तत्कालीन विदेश मंत्री जोई क्लार्क ने तीन भारतीय राजनयिकों को जासूसी करने के आरोप में देश से निकाल दिया। मगर कभी यह नहीं कहा कि इस किताब में किए गए खुलासे सही थे या गलत। वे अपनी किताब में अपने आरोपों को साबित तो नहीं कर पाए मगर उन्होंने भारत सरकार व उसकी खुफिया एजेंसी को शक की सुई का शिकार जरूर बना दिया। यह किताब उनके लिए बहुत बड़ा सिर दर्द साबित हुई।

भारत सरकार ने उन्हें भारत का वीजा दिए जाने पर रोक लगा दी व उनकी किताब को प्रतिबंधित घोषित कर दिया। उन्होंने तो यह आरोप तक लगाया था कि उन्हें धमकी दी गई थी कि अगर वे भारत गए तो जिंदा नहीं लौटेंगे। उनके बुजुर्ग मां-बाप को भी उनके लेखन व सरकार के गुस्से का शिकार होना पड़ा। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने मुंबई में रह रहे उनके बुजुर्ग माता-पिता से कड़ी लंबी पूछताछ की। कश ने अपनी किताब का दूसरा संस्करण द रियल स्टोरी बिहाइंड द एयर इंडिया डिसास्टर एंड ए डिटेल्ड वाच्ड इनवेस्टीगेशन 2005 में लिखी। इसमें उन्होंने दावा किया कि किस तरह से इस मामले की जांच में रायल कैनेडियन माउटेड पुलिस (आरसीएमपी) व कनाडियन सिक्योरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विस ने घपला किया था।

इस मामले में एक अन्य जांच ही असलियत का खुलासा कर सकती थी। उन्होंने अपनी किताब में जो कहा था उसमें एक साल बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जान मेजर की अध्यक्षता में इस कांड की जांच के लिए आयोग बैठाया। उसने पांच साल बाद 2010 में अपनी जो रिपोर्ट जारी की उमसें कहा गया था कि इस मामले की जांच में कनाड़ा सरकार ने अक्षरशः गलतियां की थी। आरसीएमपी व सीएसआईए इस आतंकवादी हमले को समय रहते रोक पाने में पूरी तरह से असफल रहे थे।

जब उनकी जांच चल रही थी तब विश्व सिख संगठन ने कश से अनुरोध किया कि वे अपनी दलीलो को साबित करने के लिए गवाही दने के लिए आए। मगर जान मेजर ने उन्हें बुलाने से इंकार कर दिया। इतने वीभत्स्व कांड के लिए तीन लोगों को दोषी करार दिया गया। मगर सिर्फ एक को सजा हुई थी बाकी सब सबूतों के अभाव में छोड़ दिए गए। एकमात्र इंदरजीत सिंह को भी पिछले दिनों कनाड़ा सरकार ने उसके अच्छे आचरण के कारण रिहा कर दिया। वह आजकल अपने घर पर ही नजरबंदी में रह रहा हैं।

(साई फीचर्स)

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