मध्य प्रदेश के चुनावी माहौल में वीराना!

(श्रुति व्यास)
चुनाव के साथ भला वीरानी क्योंकर? पर ऐसा अनुभव मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के राजा भोज हवाई अड्डे पर उतरते ही होगा। एयरपोर्ट से शहर जाते हुए बिना रंग, बिना नारों, बिना छप्पन इंची छाती के हार्डिंगों का जो अनुभव होता है वह बताता है कि चुनाव बिना माहौल के है। हल्ला है लेकिन बिना खम के। उम्मीदे है मगर बिना दम के। चेहरे कई है लेकिन बिना स्पष्टता के। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को लेकर जितनी बाते है उनसे मध्य प्रदेश की हकीकत कहीं अलग है। चुनावी पर्व वाला कोई माहौल नहीं मिलेगा। हवाई अड्डे से शहर की ओर जाते समय चुनाव होने का अहसास सिर्फ नुक्कड़ों में लगे चुनावी विज्ञापनों वाले होर्डिंग से होता है। सत्तापक्ष के हार्डिंग बड़े-विशाल और पंद्रह साल से वनवास भोग रही कांग्रेस की छोटी पोस्टरबाजी।
मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के होर्डिग सड़क पर कई जगह। सड़क के एक ओर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तस्वीर और उनके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशालकाय तस्वीर वाला होर्डिंग। शिवराज का चेहरा हल्की सख्त भंगिमा लिए हुए, शायद पीछे के घूरते अंहकारी नरेंद्र मोदी की चेहरे से मैच करने की कोशिश में। हार्डिंग में दोनों की इमेज इस तरह से रखी हुई कि अनुमान नहीं लगेगा कि इस चुनाव में कौन प्रमुख भूमिका में है।
इसी सड़क के मोड पर छोटे-छोटे पोस्टरों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सोनिया गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया और स्थानीय उम्मीदवारों के विज्ञापन वाले बिलबोर्ड मिले।
दोनों पार्टियों में समानता है कि जो भी इन होर्डिंगों-पोस्टरों को देखता है उसका यह ध्यान नहीं बनता कि इन पर लिखा क्या गया है! पार्टियां संदेश क्या देना चाह रही हैं! आप सड़क से गुजर जाते हैं और तस्वीर देखना ही याद रहता है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।
और यही मध्य प्रदेश के चुनावी माहौल का सत्व-तत्व है। चुनाव में मतदाताओं को क्या कहा जा रहा है, मतदाता जो सोचता है उस पर क्या कोई पोस्टर, हार्डिंग कुछ बताता है, भाषणों में, नारों में क्या मतदाताओं के मन की बात है, उसका अहसास नहीं होगा। इसलिए माहौल पार्टियों के बीच है पर मतदाताओं में चुनावी उत्सव का माहौल नहीं मिलेगा। लोग कयास लगाते मिल जाएंगे, पर इन कयासों में कोई दम नहीं है। कई तरह के चेहरों से सामना होगा, लेकिन साफ तस्वीर बताता कोई नहीं मिलेगा।
ऐसा ही कुछ भोपाल से पैंतीस किलोमीटर दूर सीहोर में भी लगा। माहौल भोपाल जैसा ही है। हवा ठहरी हुई। लोगों का मूड निराकार, अविचलित और सूरज गर्मी जैसे गरमाता हुआ। फिर भी कुछ फर्क। सड़क किनारे चाय की एक दुकान पर लोग बैठे चुनावी चर्चा कर रहे हैं लेकिन यह बकझक दिल्ली, उत्तर प्रदेश या बिहार जैसी नहीं है। दबी जुबान में चर्चाएं हो रही हैं। भाजपा के झंडे लगी मोटरसाइकिलों पर सवार कुछ लोग आते हैं और नारे लगा कर आगे चल देते हैं। हालांकि कुछ बूढ़े-बुजुर्ग उनसे अपनी व्यथा भी सुनाते मिल जाते हैं। लोग मौन और मामूली उत्साह लिए हुए। बाजार की कई दुकानों पर मौन चुनावी चर्चा होती मिलेगी। भोपाल से दूर लगा कि लोग बात करते, अपना मूड बताते हुए है।
सवाल है मध्य प्रदेश में क्या मामला है? लोगों में सुख और दुख के क्या भाव है? क्या कह रही है किसानों की आंखे, उनकी हल्की मुस्कराहट? क्या है उम्मीदों का जोशखरोस? क्या नौजवानों के मुंह से बैचेनी और भंडास में निकलने वाली बातों में कोई दो टूक राय, स्पष्टता है? नहीं, ऐसा नहीं लगा। दोनों पार्टियों के दिग्गजों के इर्द-गिर्द की चुनाव चर्चा के साथ निर्दलीयों का भी हल्ला सुनाई दिया। दूसरें, एंटी इनकंबेसी की बात कागजों पर है हकीकत में नहीं। हकीकत में लोग शिवराज उर्फ मामा की बात अभी भी करते है। पंद्रह साल के लंबे राज के बावजूद मामा को अभी भी अच्छी, संतोषजनक लोकप्रियता प्राप्त है। लोग चेहरे में परिवर्तन चाहते है लेकिन यह चाहना शिवराजसिंह चौहान के प्रति असंतुष्टी, नाराजगी से नहीं है बल्कि इस सोच में है कि रोटी को समय-समय पर पलटते रहना चाहिए।
शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता का आलम यह है कि उसके चलते कोई नरेंद्र मोदी के बारे में बात नहीं करना चाहता। मध्य प्रदेश का चुनावी मूड बिहार या उत्तर प्रदेश से अलग हकीकत लिए हुए है। मोदी को ले कर बात पर लोग 2019 के चुनाव का जिक्र कर बात टालेगे। मतदाताओं का मूड गंभीर और मौन है। बिहार और उत्तरप्रदेश की तरह लोग बांहे चढ़ा कर अपना मन, अपनी जुबान खोलते नहीं मिलेगे। सचमुच मध्य प्रदेश में चुनावी मूड को बूझने के लिए लोगों के अंतर्मन में झांकना होगा। बहुत घूमना होगा।
(साई फीचर्स)

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