हॉकीः बेखौफ खेलें तो बन सकते हैं हम चौंपियन

 

(मनोज चतुर्वेदी)

भारत में विश्व कप हॉकी का तीसरी बार आयोजन हो रहा है। 28 नवंबर से 16 दिसंबर तक भुवनेश्वर में दुनिया की 16 दिग्गज टीमें हॉकी की बादशाहत हासिल करने के लिए आपस में भिड़ेंगी। पिछले दो मौकों पर हमें मेजबानी बहुत रास नहीं आई। मुंबई में 1982 में हुए वर्ल्ड कप में भारत पांचवें स्थान पर और 2010 में नई दिल्ली में हुए विश्व कप में आठवें स्थान पर रहा था। सवाल है कि क्या भुवनेश्वर का कलिंगा स्टेडियम भारतीय प्रदर्शन सुधारेगा और पोडियम पर चढ़ने का हमारा स्वप्न पूरा करेगा? यह मैदान भारत को वर्ल्ड हॉकी लीग फाइनल्स में दो बार पोडियम पर चढ़ा चुका है। भारत ने 2014-15 और 2016-17 में यहां तीसरा स्थान प्राप्त किया है। वैसे भारत ने 1975 में अजितपाल सिंह की अगुआई में विश्व कप जीता था।

हरेंद्र सिंह के कोच पद संभालने के बाद टीम के जकार्ता एशियाई खेलों में आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाने से टीम का मनोबल थोड़ा गिरना स्वाभाविक है। हालांकि इससे पहले चौंपियंस ट्रॉफी में लगातार दूसरी बार रजत पदक हासिल कर टीम ने उम्मीदें जगा दी थीं, लेकिन एशियाड में झटका लगा। भारतीय टीम सेमीफाइनल में मलयेशिया से हारकर बहर हो गई। भारत यह मुकाबला गलत रणनीति की वजह से हारा। मैच में भारतीय टीम ने अच्छी शुरुआत की थी, लेकिन एकाएक टीम ने खेल की रफ्तार कम करने की रणनीति अपनाई। इससे मलयेशिया को हमला बोलने का मौका मिल गया और इस मौके को वह जीत में बदलने में सफल हो गई।

भुवनेश्वर में होने वाले 14वें हॉकी विश्व कप में भाग लेने वाली 16 टीमों को चार-चार के चार ग्रुपों में बांटा गया है। इसमें हर ग्रुप में टॉप पर रहने वाली टीमें सीधे क्वार्टर फाइनल में पहुंच जाएंगी। वहीं दूसरे और तीसरे स्थान पर रहने वाली टीमें क्रॉस ओवर के आधार पर खेलेंगी और इन मैचों में प्रदर्शन के आधार पर क्वार्टर फाइनल में स्थान बनाने वाली बाकी चार टीमों का चयन होगा। भारत को इस विश्व कप में ओलिंपिक उपविजेता बेल्जियम, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका के साथ ग्रुप सी में रखा गया है। ग्रुप टीमों में बेल्जियम ही भारत से बेहतर तीसरी रैंकिंग की टीम है। लेकिन दोनों के बीच चौंपियंस ट्रॉफी में आखिरी मुकाबला एक-एक से ड्रॉ रहा था। इस मुकाबले में भारत ने पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ हरमनप्रीत सिंह के दसवें मिनट में जमाए गोल से बढ़त बनाई। खेल समाप्ति से दो मिनट पहले डिफेंस की गलती से बेल्जियम बराबरी का गोल जमाने में सफल हो गई। भारत को क्वार्टर फाइनल में स्थान बनाने के लिए ग्रुप में पहला स्थान प्राप्त करना होगा। ऐसा नहीं करने पर हालात मुश्किल हो सकते हैं। भारतीय टीम ने जिस तरह आखिरी समय में बेल्जियम को बराबरी पर आने का मौका दिया, वह हमारी बड़ी कमजोरी है। इस कमजोरी की वजह से हमने तमाम मौकों पर मैच गंवाए हैं। यह दरअसल मानसिक कमजोरी की निशानी है। जब आप लगातार अच्छा बचाव करते-करते अपने ऊपर दबाव हावी होने देते हैं, तब ऐसी गलती होती है। हरेंद्र सिंह ने वैसे तो टीम को मानसिक तौर पर मजबूत बनाने का भरसक प्रयास किया है। अब खिलाड़ियों के लिए खुद को साबित करने का समय है। उनका प्रदर्शन ही बताएगा कि कौन कितने पानी में है।

वैसे भारत ने एशियाई खेलों में खराब प्रदर्शन के बाद एशियाई चौंपियंस ट्रॉफी में पाकिस्तान के साथ संयुक्त विजेता बनकर अपने को झटके से कुछ हद तक उबार लिया है, लेकिन लोगों के लिए ओलिंपिक, विश्व कप और एशियाई खेलों के परिणामों के खास मायने होते हैं। भारत यदि यहां भी एशियाई खेलों की तरह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सका तो इतना जरूर है कि कोचों को बदलने में माहिर हॉकी इंडिया कोच हरेंद्र सिंह की भी छुट्टी कर सकती है। लेकिन इसके विपरीत हरेंद्र यदि इस टीम को पोडियम पर चढ़ा सके तो टोक्यो विश्व कप तक उनकी नौकरी पक्की हो जाएगी। इस विश्व कप में भाग लेने वाली भारतीय टीम में फॉरवर्ड एसवी सुनील और डिफेंडर रूपिंदर पाल को नहीं चुना गया है। सुनील एशियाई चौंपियंस ट्रॉफी के लिए लगे शिविर में घुटने में चोट खा बैठे थे और पूरी तरह फिट नहीं होने की वजह से टीम में स्थान नहीं पा सके हैं। वहीं रूपिंदर पाल पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ तो हैं, लेकिन डिफेंस करते समय उनकी रिकवरी अच्छी नहीं होने की वजह से उन्हें शामिल नहीं किया गया है। वैसे टीम को सुनील की कमी थोड़ी खल सकती है। इस टीम में कई खिलाड़ी हरेंद्र के जूनियर टीम के कोच रहने के समय से ही उनके साथ प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इससे टीम में सीनियर और जूनियर खिलाड़ियों का अच्छा तालमेल बन गया है। टीम के खिलाड़ी काफी समय से साथ खेल रहे हैं और उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में साथ खेलने का अनुभव भी है। इसलिए बेहतर परिणाम की उम्मीद की ही जा सकती है।

अगर भारतीय टीम को 43 वर्षों के बाद विश्व कप में पोडियम पर चढ़ना है तो उसे ओलिंपिक चौंपियन अर्जेंटीना, नंबर एक रैंकिंग वाली ऑस्ट्रेलिया, चौथी रैंकिंग की नीदरलैंड और जर्मनी जैसी टीमों को हराना होगा। सबसे पहले तो अपने ग्रुप में शीर्ष पर रहने का प्रयास करना होगा। इसके बाद एक जीत सपने के करीब ले जा सकती है। पर यह तभी संभव है जब आखिरी समय में लड़खड़ाहट दिखाने से टीम बचे और पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में बदलने में महारत दिखाए। भारतीय टीम ने एशियाई चौंपियंस ट्रॉफी के ग्रुप मुकाबलों के दौरान ही 76 गोल जमा दिए थे, लेकिन वर्ल्ड कप में हल्के मैच नहीं मिलने वाले हैं। इसलिए मनप्रीत सिंह की अगुआई में टीम को बेखौफ प्रदर्शन करना होगा।

(साई फीचर्स)

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