पहाड़ी वाला गुरुद्वारा

(विवेक शुक्ला)
इंदर सिंह कोहली 1947 में रावलपिंडी से शरणार्थी के रूप में दिल्ली आए थे। यहां छोटा-मोटा कारोबार करने लगे। काम चलने लगा। कोहली जी पैसा कमाते और जोड़ते। 1960 में ग्रेटर कैलाश-पार्ट वन में प्लॉट बिक रहे थे। डीएलएफ ने प्लॉट काटे थे। उन्होंने भी एक प्लॉट लिया। पर उन्हें यहां पर गुरुद्वारे की कमी खलने लगी। तब उन्होंने जीके के पहाड़ी वाले एक प्लॉट को ही खरीद लिया। दरअसल लाजपत नगर, जीके, नेहरू प्लेस वगैरह पहाड़ियों को काट कर ही बने थे।
फिर उस पथरीली जमीन पर शुरू हो गई कारसेवा। इस तरह से जीके में गुरुद्वारा साहिब की स्थापना हो गई। इसलिए ये गुरुद्वारा कहलाने लगा पहाड़ी वाला गुरुद्वारा। हालांकि न्यू राजेंद्र नगर में भी गुरुद्वारा नानकसर पहाड़ी पर है, पर उसे पहाड़ी वाला नहीं कहा जाता। इसकी एक बड़ी विशेषता है। यहां पर संगत रोज अपने घरों से सुस्वादु भोजन लंगर के लिए लेकर आती है। उसी लंगर का दर्जनों लोग सेवन करते हैं।
बहरहाल, जीके गुरुद्वारा देखते-देखते राजधानी के महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के रूप पर विकसित हो गया। ये सिर्फ धार्मिक गतिविधियों तक ही सीमित नहीं है। यहां माता गुर्जरी देवी के नाम पर एक स्कूल और अस्पताल भी चलता है। इधर की ही कन्याएं गुरु पूरब से जुड़े कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं। कुछ समय पहले यहां पर एक आधुनिक जिम की भी स्थापना हो गई है। यानी कि पूजा के साथ सेहत भी ठीक रख ली जाए। आपको संभवतः किसी अन्य गुरुद्वारे या धार्मिक स्थल में जिम नहीं मिलेगा। निश्चित रूप से राजधानी के गुरुद्वारों में नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। उदाहरण के रूप में राजौरी गार्डन के मुख्य गुरुद्वारे में एक एज ओल्ड होम भी शुरू हो चुका है।
इस बीच, पहाड़ी वाले गुरुद्वारे के आकर्षण के चलते बहुत से सिख परिवार ग्रेटर कैलाश में अपने घर खरीदने लगे हैं। इधर आने पर पहाड़ीवाला गुरुद्वारा में मत्था टेकने के लिए जाने में सुविधा रहती है। चूंकि इसकी अपनी लगभग 400 कारों की पार्किंग भी है, इसलिए साउथ दिल्ली के अनेक सिख परिवार यहां पर ही भोग के कार्यक्रम भी आयोजित करने लगे हैं। गुरुपूरब का नगर कीर्तन सीसगंज गुरुद्वारे से, गुरुद्वारा नानक प्याऊ से निकलता है। उससे कोई छोटा नहीं होता पहाड़ी वाले गुरुद्वारे का नगर कीर्तन। ये जीके के आसपास से गुजरता है। कदम-कदम पर राजमा-चावल, छोले-कुल्चे, फ्रूटी, मिल्क शेक आदि की व्यवस्था रहती है। नगर कीर्तन में सारा वातावरण भक्तिमय रहता है। गुरुवाणी का पाठ चलता रहता है।
(साई फीचर्स)

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