आतंकवाद पर चिंता और रपट

 

 

(विवेक सक्सेना)

इन दिनों कनाड़ा में सिख संगठन के लोग एक रिपोर्ट को लेकर बेहद परेशान हैं। पिछले दिनों कनाड़ा के प्रधानमंत्री के दफ्तर द्वारा एक अहम रिपोर्ट जारी की गई। यह सिखों के बारे में थी। इसके तमाम हिस्सो को राष्ट्रीय सुरक्षा व अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए खतरा बताते हुए हटा दिया गया था। इस रिपोर्ट में तीन अहम मुद्दों पर विचार किया गया था। वहां के प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के दौरान विदेशी हस्तक्षेप के आरोप, भारत में कनाड़ियन प्रधानमंत्री की भारत यात्रा की घटनाओं के दौरान सुरक्षा संबंधी मामले व देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार द्वारा पत्रकारों से बातचीत के दौरान दी गई जानकारी पर विचार था।

ध्यान रहे इस साल के आरंभ में कनाड़ा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की भारत यात्रा के बाद उससे जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय सुरक्षा व संसद की इंटेलीजेंस संबंधी कमेटी द्वारा एक विशेष सुरक्षा रिपोर्ट तैयार की गई थी। यह रिपोर्ट कनाड़ा के सिख समुदाय की गरिमा तथा उसकी चिंता के बारे में थी। इस बारे में लगाए जा रहे आतंकवाद संबंधी आरोपों के बारे में कनाड़ा के विश्व सिख संगठन का आरोप है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस रिपोर्ट के तमाम अहम पहलुओं को छिपा दिया। इसमें उन छह समितियों की रिपोर्टें भी शामिल थी जोकि विदेशी हस्तक्षेप के बारे में थी।

यह सब करने के बावजूद रिपोर्ट पढ़ कर पता चलता है कि कनाड़ा में सिख आतंकवाद बढ़ रहा है जोकि इस देश को शर्मिंदा करने के लिए पर्याप्त है। इसके मुताबिक जनवरी व फरवरी 2018 में देश के सुरक्षा व इंटेलीजेंस एडवाइजर व यहां की जानी-मानी पुलिस रायल कनाड़ियन माउंटेड पुलिस के प्रतिनिधिमंडलों ने भारत की यात्राएं की। इनका उद्देश्य भारत की उन चिंताओं को समाप्त करना था जोकि उसने कनाड़ा में बढ़ रहे सिख आतंकवाद से निपटने के संबंध में जताई थी।

रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत व कनाड़ा के बीच समय-समय पर होने वाली तमाम स्तरों की द्विपक्षीय वार्ता में नियमित रूप से यहां बढ़ रहे सिख आतंकवाद पर चिंता जताई गई है। कनाड़ा का विश्व सिख संगठन इस हिस्से का विरोध करते हुए दलील देता है कि भारत ने इस संबंध में एक भी ठोस उदाहरण नहीं दिया। उसका आरोप है कि खुद पर लगाए जा रहे मानवाधिकारों के आरोप से निजात पाने के लिए भारत ने इस तरह के खोखले आरोप लगाएं।

कनाड़ा के प्रधानमंत्री एक हफ्ते की राजकीय यात्रा पर भारत आए थे। उन्होंने इसे बहुत महत्व देते हुए यात्रा के दौरान न केवल भारीय पोशाक कुरता- पायजामा पहना बल्कि उनके साथ आए पूरे परिवार ने भी भारतीय दिखने का प्रयास किया। वे दिल्ली में बंगलासाहिब भी गए। उनके साथ देश के चार सिख मंत्री भी थे। उनके साथ देश के व्यापारियों व उद्योगपतियों का लंबा चौड़ा प्रतिनिधिमंडल भी आया था। भारत सरकार की ओर से प्रधानमंत्री या किसी अहम मंत्री ने उनका स्वागत नहीं किया व उन पर अपने एक भोज में किसी खालिस्तानी को आमंत्रित करने का विवाद हुआ।

मालूम हो कि नरेंद्र मोदी विदेशी नेताओं को लेकर खुद बहुत सक्रिय रहते हैं। फिर कनाड़ा में बड़ी तादाद में सिख रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि कनाड़ा के प्रधानमंत्री व उनकी पार्टी के मतदाता काफी बड़ी संख्या में सिख है। उन लोगों को वहां चल रहे सिख आतंकवाद का परोक्ष में समर्थक माना जाता है। विदेश मंत्रालय के किसी आला अफसर तक ने उन्हें अहमियत नहीं दी थी। विश्व सिख संगठन के अध्यक्ष मुखबिर सिंह ने बताया कि हालांकि इस रिपोर्ट के तमाम अहम पहलुओं को गायब कर दिया गया है मगर सच्चाई यह है कि इस सबका उद्देश्य कनाड़ा की सरकार व वहां रहने वाले सिखों पर सिख आतंकवाद का आरोप लगा कर बेवजह बदनाम करना है।

उनके अनुसार हमारे अधिकारियों व मीडिया को इस मुद्दे पर और ज्यादा आलोचनात्मक होने की जरूरत है। भारत सरकार ने आधारहीन आरोप लगा कर यहां के सिखों व सरकार को बदनाम किया है। दुख तो इस बात का है कि आरोपों की जांच बिना ही मीडिया ने रिपोर्ट को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर दिया। उनका आरोप है कि प्रधानमंत्री की यात्रा के पहले कनाड़ा में सिखों पर घृणा संबंधी दो हमले हुए ताकि उन्हें आतंकवाद के आरोप में बदनाम किया जा सके। इससे पहले भी भारत ने यहां के सिख आतंकवाद और उनके प्रधानमंत्री से संबंधों को लेकर रिपोर्ट जारी की थी।

इस रिपोर्ट में जस्टिन ट्रूडो की भारत यात्रा के दौरान आतंकवाद के समर्थक माने जाने वाले जसपाल अटवाल को उनके द्वारा चाणक्यपुरी स्थित कनाड़ा दूतावास में दिए गए सरकारी भोज में न्यौतने का जिक्र है। उसकी तस्वीर तब भारतीय अखबारों में प्रकाशित हुई थी। इस बारे में कनाड़ा के सुरक्षा सलाहकार का कहना था कि यह संभव है कि भारतीय मीडिया ने इस मुद्दे को गरमा कर उसे आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाला साबित करने की कोशिश की हो। कमेटी का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने समय रहते विदेशी हस्तक्षेप सरीखे अहम आरोपों को शांत करने के लिए ही पत्रकारों से इस मुद्दे पर बात की थी। मगर जसपाल अटवाल को आमंत्रित किए जाने से सारे प्रयासों पर मानों पानी फिर गया।

मालूम हो कि कनाड़ा में अगले साल आम चुनाव होने हैं। इस देश की संसद के दो सदन है। हाऊस ऑफ कामंस व सीनेट। इसमें हाउस आफ कामंस में 338 व सीनेट में 175 सदस्य होते हैं। सीनेट के सदस्यों को गवर्नर-जनरल मनोनीत करते हैं और वे अपने पद पर 75 साल तक रहते हैं। मौजूदा प्रधानमंत्री 2015 में हुए आम चुनाव में 184 सीटे हासिल कर इस पद पर आए थे। यों तो वहां तमाम राजनीतिक दल है मगर अहम दल दो ही हैं। कंजरवेटिव व लिबरल।

सन् 2015 में हुए आम चुनाव में भारतीय मूल के 19 सांसद चुनाव जीते थे। इनमें से चार केंद्र में मंत्री है। इनमें हरजीत सिंह सज्जन भी शामिल है जो कि कनाड़ा के इतिहास में रक्षा मंत्री बनने वाले पहले सिख हैं। उन्होंने विपक्षी लिबरल पार्टी के उम्मीदवार के रूप में कंजरवेटिव पार्टी के वाइ यंग को हराया था। उन्होंने अफगानिस्तान के कांधार में कनाड़ा की सेना में तैनात होकर एक गुप्तचर अधिकारी के रूप में काफी नाम कमाया था। उन्हें खालिस्तान समर्थक माना जाता हे। वे पहले विश्व सिख संगठन में थे। उन्होंने अपनी नियुक्ति को प्रधानमंत्री का एक सकारात्मक कदम बताते हुए कहा था कि सैनिक सब ही होते हैं। वैसे भी हम तो प्रवासी हैं। वे महज पांच साल की उम्र में यहां आए थे।

(साई फीचर्स)

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